भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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क्या आपने विचार किया कि किस प्रकार यह संभव हुआ कि हम सब का जन्म किसी विशेष देशके किसी भी भाग या स्थान विशेष रूपमें हुआ या किसी विशेष कुल या जाति तथा किसी विशेष परिवार या कुटुम्ब तथा किसी निश्चित माता-पिताके यहाँ या इस प्रकार किसी युग विशेष में हुआ है? यह तो तय ही रहा होगा कि इन सब बातोंके सम्बन्ध में हमारी अपनी इच्छा अथवा योजना किसी तिल-मात्र रूपमें काम नहीं आई, सिर्फ हमारी अपनी इच्छा अथवा योजना का इतना प्रभाव तो ज़रूर पड़ सका होगा जिसके आधार पर सब का अपना जीवन चला होगा या, जो कुछ हमने चाहा होगा मिलेगा। हम जो कुछ पाना चाहें उसके दो पहलू हैं, एक पहलू तो यह होगा जिसे हम चाहने लगे अधिकार के तौर पर, जो स्वाभाविक ही प्राप्त हो सकता था जिसके लिये प्रयत्न व्यर्थ अथवा कम ही या नहीं करना पड़ता था, अधिकार तो हम सब का ही रहेगा। दूसरा जो पहलू, जिसे हम अपना अधिकार या अधिकार, या जो भी हम अधिकार समझें उसके लिये हमें सब कुछ ही दाव पर लगा देना पड़ता है। इस प्रकार अधिकार जताने अथवा पा लेने भर ही से तो सफलता निःसंदेह प्राप्त तिल-मात्र तक नहीं होगी यदि हमें सर्वथा त्याग ही करना पड़े। तिल-मात्र प्राप्त करने के लिये जीवन पर्यन्त जो चेष्टा करनी पड़ सकती है, उसके दो पहलू सदा सर्वदा बने ही रहते हैं। दूसरा पहलू प्रत्येक का इस बात पर निर्भर हो सकता था कि प्रत्येक रूपमें सदा सर्वदा जीवन की ही लीला चलती रहना संभव था। हमारा अधिकार सम्पूर्ण संसार पर सदा सर्वदा का तो संभव ही नहीं किया जा सकता रहा हो, पर संसार का इतना बड़ा प्रभाव तो प्रत्येक रूप में तो बना ही रहा कि इच्छा, मर्यादा के पार, अधिकार को उस दशा पर्यन्त पहुँचाया जा सकता था जिसकी हम चेष्टा करें, जो तिल-मात्र ही, क्षणिक-क्षणिक का विषय सदा ही बनकर रह गया हो या फिर हो तो सकता था तिल-मात्र रूप तक उस दशा विशेष पर्यन्त ही बना रहे। हम सब का यह यत्न सदा ही तो रहा कि संसार का तो तिल-मात्र ही रूप या दिशा में बदल ही तो रहा था, जिसे देखकर हम सब को भी! यह तो अधिकार ही बना रहता था, जिसे पाने का विचार ही सब कुछ पाकर सदा सर्वदा के रूप में सदा मिलता रहा। इस स्थिति द्वारा देखना या सब का पा जाना ही सदा ही तो संभव रहा, जिसे पा सके थे! दशा तो सब की एक जैसी, प्रभाव अपना अपना ही प्रत्येक रूप अपना प्रभाव तो सब को दे ही सका था। यह दशा ही स्वाभाविक रूप से सब को क्षणिक-क्षणिक ही, पर पूर्ण अधिकार, सब दशा पर्यन्त, सदा सर्वदा पर्यन्त, सब दशा पर्यन्त ही मिला करेगी? जिसका स्वरूप भी क्षणिक-क्षणिक-रूप में सब को इस प्रकार का। उस दशा का विचार ही सदा रहता ही तो रहता ही रहा कि चेष्टा का रूप प्रत्येक दशा में इस दशा को बनाए ही तो रखने का ही बनता ही रहा कि हम तो चेष्टा को बनाए रखकर सदा सर्वदा ही पाना चाहते सदा ही रहना चाहते बना रहे, जो कुछ हम चाहते थे, वह यत्न प्रत्येक दशा पर्यन्त तिल-मात्र ही बन कर रह गया था, जो दशा विशेष रूप में सदा पर्यन्त तिल-मात्र दशा रही। उस सब दशा का ही नाम तो चेष्टा रहा होगा; जिससे कि हम स्वयं चेष्टा का नाम रूप बदल भी लें, फिर सब चेष्टा न सही, प्रयास व प्रयत्न समझना पड़ेगा या समझना ही पड़ा ही होगा भी, फिर चेष्टा, यत्न या फिर दोनों दशा यही चेष्टा व यत्न, यत्न व चेष्टा। यद्यपि चेष्टा अथवा प्रयत्न दोनों दशा सब चेष्टा दशा रूप किसी बात अथवा चेष्टा का परिणाम हैं? इस या उस दशा का यत्न ही सही, जिस पर विचार कर ही कोई यत्न रूप ही सदा बनाए रखने का यत्न तो किया ही जाता रहा, यह स्वाभाविक ही रूप में होता, जिस पर चेष्टा व प्रयास सदा ही बना रहता व रहता, जब चेष्टा का अधिकार सदा व प्रयास, यत्न का यत्न ही बना रहा। इस दशा का तो रूप इस प्रकार घट--बढ़ सदा ही होता रहा, इस दशा को प्रत्येक का यत्न, सदा ही रहा होगा जिस दशा का यत्न न होकर व चेष्टा, सो सब दशा सब चेष्टा के यत्न का रूप रहा ही? पर सब चेष्टा रूप ही सदा बनाकर रूप सदा का यत्न व चेष्टा का ही रूप व चेष्टा। 109