भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

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करो, उनका उद्धार करिये। मैं आपके शरण होऊँ या अन्य किसी अन्यका आश्रय लूँ? प्रभु सब कुछ देखते हुएभी मौनभाव को क्यों भज रहे हैं? दीनको शरण देनेमें समर्थ प्रभु तो केवल आप ही हो, कृपामयके सिवा, दूसरा या और कौन दूसरा ऐसा समर्थवान् दयालु हो सकता है? हे दयानिधे दयाकरके अपने इस अकिंचन सेवकपर दया, कृपा कीजिये। अथवा आपके स्वभावके प्रतिकूल सेवक अकृतज्ञ अपराधी जानकर त्यागे या त्यागा भी जा सके। सेवकके गुण-दोषको प्रभु अपने मनमें नहीं विचारते। प्रभु तो दीन-बन्धु हैं! आप ऐसा नहीं विचारते कि मैं अमुक गुणवाला हूँ। इसलिए प्रभु दया- दृष्टि करो ही, या फिर यह समझ लो प्रभु कि मैं आपका ही हूँ। मुझे प्रभु तारो, या न तारो पर शरण त्यागी तो, पर हे नाथ प्रभु तो अपने भक्तको त्याग नहीं करते। ऐसा जानकर अपराधको क्षमाकर प्रभु शरणमें आए हुएको तो पार ही करते हैं। अब मेरा अपराध तो क्षम्य हो गया, पश्चात्ताप मुझे हुआ! दोनों हाथोंको प्रभु शरणमें उठा दिया, अब कैसा संशय? इसके आगे प्रभुके प्रति समर्पण का, जिसके आगे प्रभु भी भक्तके वशीभूत होते। भाव यहकि जिस बातको प्रभुने दृढ़ कर लिया कि प्रभु अपने भक्तको बचाएँगे, चाहे भक्त कहे प्रभु न बचाओ, भक्त चाहे प्रभुके प्रति ऐसा भाव भी करे, पर भक्तका उद्धार प्रभु जरूर कर देंगे। प्रभुको यह स्मरण दिला दिया गयाकि प्रभु तो किसीके भी अवगुण नहीं देखते, जिस प्रकार पिता अपने पुत्रके दुर्गुणों अथवा अवगुणोंपर ध्यान न देकर सदा प्रेमही करता है, उसका ही कल्याण चाहता हुआ हितके साधन करता है। प्रभु, पिता भी हैं और माता भी। प्रभु तो सर्वस्व सबके हैं। इसलिए प्रभुका यह काम अर्थात् भक्तको तारनेका ही हुआ, जिसके विषयमें कहा गया कि प्रभु, न तारनेपर भी प्रभु शरणागत भक्तके दुर्गुणों पर ध्यान नहीं देंगे, सब प्रभु क्षमा करते हुए, प्रभु अपने स्वभावके अनुसार भक्तको सब संकटोंसे मुक्त कर देंगे। प्रभुने वैसा किया भी था, जिसके कई उदाहरण, प्रभुने गिद्धके देह छोड़ देनेपर उसे सद्गति दी, जिसके लिए प्रभुने यह भी नहीं कहा, प्रभु तो विश्वामित्र-महामुनिको फल ही देते, जिन्होंने प्रभुकी सेवा की। प्रभुका स्वभाव है दयालु, कृपा करना। वे ऐसा विचार कभी नहीं करते कि जिसने मेरी शरण ली उसका क्या पूर्व इतिहास था। प्रभु तो भक्तके गुण देखते हैं। भक्त चाहे प्रभुसे मुँह भी फेरना चाहे किन्तु प्रभु भक्तको शरणमें लिए हुएका त्याग नहीं कर सकते। प्रभु शरणार्थीको तो तारते, जिसके लिए प्रभुने ही घोषणा की कि शरणागत प्रभुको सब संकटोंसे मुक्त करा देते हैं, चाहे किसीका भी कैसा स्वभाव हो। भक्तको उद्धार प्रभु ही शरणागत पाकर, भक्तको यह कह कर प्रभु सन्मुख कर लिया कि प्रभु अब भक्तका गुण अथवा अवगुण नहीं विचारते। प्रभु तो सब प्रकारसे अपने शरणार्थीका काम करते हुए सदा सर्वदा उसका रक्षण करते हैं। वह सब प्रकारसे भक्तको मुक्त कराते हुए उसे शांति देते, जिसके कारण प्रभुकी भक्ति करनेवाला भक्त प्रभुको ही स्मरण करता है। इसलिए कहा कि भक्तको प्रभु पार नहीं करेंगे? यह प्रश्न स्वाभाविक, ही भक्त विचारता। प्रभु तो भक्त को शरणागत देखकर न पार करें यह कैसे संभव होसकता है? भक्त सब कुछ प्रभु पर छोड़ दे! प्रभुने उसका जिम्मा लिया! तो फिर भक्त चिंता क्योंकरेगा? भक्त ऐसा सोचते हुए, स्वाभाविक प्रभु, गुण वर्णन कर प्रभु सन्मुख अपना भाव रखता हुआ, प्रभुके सम्मुख होकर अपने अंतरके भावको प्रभु पर ही छोड़ता हुआ कहता कि प्रभु तो सब प्रकारसे प्रभुकी महिमा गाकर प्रभुको शरणमें प्रभु दयाकी प्रार्थना करता है। भक्तका स्वभाव प्रभु सम्मुख होकर प्रभुके यशके गीत गाकर ही अपने दिन बीत रहे हैं, प्रभुकी ही शरणमें सब संकटों से मुक्त करनेके लिए, शरणागत भक्त विनीतभाव से प्रार्थना प्रभुसे करता हुआ स्वयंको भूलकर प्रभु चरणोंमें बैठ जाता है, जिसके लिए प्रभु स्वयं चिंता करेंगे। भक्तके लिए प्रभुने ऐसा कब नहीं किया? प्रभु सब कुछ, सब समय करते ही रहतेहैं। भक्त शरणार्थीका यह भाव देखकर प्रभु बहुत प्रसन्न होते और भक्तका सब प्रकारसे कल्याण करते हुए भक्तको अपनी भक्ति प्रदान करके प्रभु स्वयं प्रसन्न होते हैं। ऐसा विचारकर प्रभुके भक्त प्रभुकी शरणमें जाकर दीन-हीन होकर प्रभुसे उद्धारकी प्रार्थना करते हैं। भक्तको इस प्रकार प्रभुपर पूर्ण निष्ठा हो, प्रभु दयानिधान अपने भक्तकी पुकार सुनकर स्वयं भक्तके सन्मुख पहुँचकर उसका उद्धार करते हैं। 108