भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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विचार यह देखकर कि अधिकांश मानव जाग्रत होकर रहने का दम तो भरते हैं पर अपनी जीवनचर्या पर एक बार भी नजर डालने अथवा खुद का ही सच से मुंह न मोड़े तो उन्हें खुद समझ आ जाए कि जिस जाग्रत जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह तो मात्र भ्रम या धोखा भर सिद्ध होकर रह जाता बिना जागे ही हम मर रहे हैं और बिना ही जाने हमारा जीवन का सिलसिला समाप्त हुआ, व्यर्थ ही जीवन समय बिताया हे! साधक! जागो! जागो जो कुछ घट रहा उसे जानो इसके पहले कि मृत्यु आ जाए, अपने जागने रूपी प्रकाश अथवा साधना के-को पहचानो कि इसके बिना जीवन का कोई भी अर्थ नहीं या ऐसा जाग्रत जीवन ही व्यर्थ जीवन कहलाने के काबिल समझा जाता है। जो व्यर्थ जीवनशैली पर विचार करने अथवा सोचने का कोई दृष्टिकोण या नजरिया अपना ही नहीं सकते हैं। सच तो यह, कि जो भी हम कर्म करते हैं, या बातें करते हैं वह सब तो भ्रम या धोखा सिद्ध... जीवन का उद्देश्य तो मात्र यही समझना था, जिससे बच कर आज जाग्रत भ्रम जीवन रहे! अधिकांश मानव इस भ्रम भरे मन द्वारा संचालित या निर्देशित या आयोजित भ्रम भरे जाल तथा भ्रम से प्रभावित कार्यप्रणाली अपना कर ही जीता रहा! अधिकांश मानव उस भ्रम या भुलावे का शिकार बन बैठा कि जो भी घटित हो रहा है सही! जिस कारण से प्रत्येक बात का वह अपने आपको सच मान बैठा या उस भ्रमित सच को सच मान कर भ्रम जीवनशैली पर गर्व (अभिमान) करता, अपनी ही बात (मानसिकता) को सच साबित करने पर, व्यक्तिगत तौर तरीके से व्यवस्था या कार्यप्रणाली पर निर्भर बन बैठा या यह भी कह लें ऐसा समझा गया; कि व्यक्तिगत ही नजरिया ही सही रूप सच का या सच जीवन शैली है सच; कि व्यक्तिगत ही विचार ही विचार रूप सच का सच माना गया, जिस रूप सच का वह रूप मान बैठा जिसके प्रभाव में भ्रमित ही दृष्टिकोण या नजरिया अपना लिया जिसका वह संचालन व्यवस्था या कार्य कर बैठा--तो क्या ऐसा जाग्रत हुआ? जिसे वह भ्रम पूर्वक अपना सच, जिस भ्रम को सच मान कर कार्य किया था? इसलिए हर व्यक्ति को अपने मन-मस्तिष्क द्वारा जीवन के सच को जानना था, जो कि वह कभी जान पाया ही न कभी समझ पाया जिस कारण से वह खुद को ही भ्रम के आगोश में अपने आप छिपा बैठा तथा भ्रम आधारित जीवन संचालित कर ही, अपने आपको जाग्रत मान बैठा मन-के प्रभाव विचार द्वारा उस जीवन यात्रा पर विचार या ज्ञान पा सका, जिस पर स्वयं व्यक्तिगत या समाज द्वारा जीवन का आधार, या सच मान बैठा क्योंकि उसने कभी सच तथा उसके आधार को तलाशने अथवा खोजने का प्रयास कभी किया ही जिससे कि स्वयं को, अपने आप विचार शैली, कार्यप्रणाली तथा व्यवस्था द्वारा वह सब कुछ जान पाता भ्रम का शिकार ही बना रहा? सच यह तो नहीं जिसका वह तो शिकार बना बैठा जिसे उसने अपने द्वारा विचार कर सच मान लिया था क्योंकि वह स्वयं भ्रमित मन द्वारा, बिना ही ज्ञान बिना विवेक के ही जो विचार, कार्य रूप ज्ञान, कभी विचारों का, कभी या विचारों, कभी के रूप, कभी उस विचार, का रूप देकर अपने आप ही भ्रम के सच पर ही आधारित सच मान लिया हर सांस व्यक्तिगत ही रूप में प्रभावित एक विचार को जन्म दे रही थी रूप पर, उसने जिस व्यवस्था को, अपने विचार को सच मान कर जो रूप दिया उस रूप में वह यह भूल गया कि, उसके जिस भ्रम विचार रूप को सच माना गया था वह कभी विचार का रूप लेकर सच साबित हो रहा भ्रमित विचार ही तो था जिस रूप द्वारा सच के रूप, जिस रूप में मन, विचार के रूप में स्वयं भ्रमित सोच को जन्म दे विचार का रूप बनाकर प्रतिष्ठित, स्थापित, स्थिर कर, अपने मन के प्रभाव का रूप सच के रूप में माना एक शांत या शून्य का रूप अपना प्रभाव या प्रभाव के रूप में सामने उस तक विचार के रूप अनुसार ही रहा था, जिसे मानव विचार का एक रूप व रूप का नाम दे, न ही तो अपने शून्य रूपी स्वभाव अथवा शांत रूप को पाया, जिस कारण वह शांत रूप अथवा शून्य रूप के प्रभाव अथवा स्वभाव को पहचान नहीं पाया हर सांस का उपयोग मन व विचार के सच जानने तथा शांत या शून्य रूप रहा! पर या ऐसा कह लें इसके प्रभाव में या इसके लिए, शांत भाव, शांत स्वभाव या शून्य स्वभाव को न पहचान कर सांस-सांस पर ही सच माना, शांत व शांत, शांत भाव, शांत व शून्य इस वास्तविकता द्वारा शून्य ही प्रकाश रूपी ज्ञान के प्रकाश रूप ज्ञान से अनभिज्ञ, मात्र ही उस सच को सच मान कर भ्रम भरा ही जीवन जी रहा था कि 135