माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगयी कि वह सब कुछ जान कर भी अनजान बनता जा रहा था और वह भी अपनी माता जैसी माता के इस लज्जित व्यवहार स्वरुप स्थिति से अनभिज्ञ बन अनजान ही हो कर इस प्रकार चुप बैठनेवाले पर धिक्कार कर दिया या नहीं, सत्यकाम अपनी माता जैसे माता पिता का आदर करें, अथवा जिस का विरोध किया गया वैसा! सत्यकाम ने जब माँ से पूछा होगा तो माता पिता-संबन्ध का रहस्य भली भाँति तो होगा अर्थात् यह निश्चय रहा ही होगाकि, या तो विवाह रूप पिता-संबन्ध--नियम का लोप होगा? अथवा उस से जो सन्तान हुआ होगा वह न हुआ? अथवा उस समय वह न था? जिस बात का ज्ञान न रहा? जिस में न तो लज्जित होनेका था, ओर न ही लज्जा युक्त बात थी। यदि उस के विचार माता प्रति लज्जा से भरे न होते तो पिता की ही बात को पिता सम्बन्धी ही न कह देता, बल्कि इस प्रकार दोनों सम्बन्ध लज्जा जनक हुए, जिससे सत्यता ही कह दी, जिससे सब संशय मिट गया। हे आर्य जनो, इस प्रकार असभ्यता को सत्य कह कर प्रचार तो न कर कर संसार को ठगते? यह सत्यता का स्वरूप? इस सत्यता को धिक्? हे आर्य जनो, यह बात सत्य सिद्ध हो तो इस विचार द्वारा कि असभ्यता संसार में सब रूप सत्य ही हो जाय, सब संसार को ठगते, सब जग को ठग कर सत्य का नाम दिया जाय महा अनर्थ! दो चार जन ऐसे होवें! इस के द्वारा जो चाहे सो कह कर ठग लो, पर ऐसा सत्य जो जगत वासियों को भ्रष्ट करने वाला, सज्जनों द्वारा स्थापित धर्म को बिगाड़ ही देगा, सब संसार को दुख देगा ही; उस समय में सत्यकाम ने, अपने माता सम्बन्धी को; जिस प्रकार से, माता सम्बन्धी था, यथावत स्वरूप दर्शाया कि पिता जी के नाम-धाम का निश्चय न रहा, माता का नाम ही केवल था उस समय के लोग माता के नाम से जानते इस विचार से स्पष्ट पता लग रहा कि जाबालि गोत्र वंश परम्परागत चला रहा जिससे कि उस समय प्रत्येक पुरुष अपने नामके साथ व वंश का नाम लेता, न माता, न पिता, जिस से स्पष्ट ही होता कि जाबालि नाम कुलका था अथवा उन का नाम, जिस से सम्भव है कि गौ नाम जाति वाचक संज्ञा से उस का परिचय हो गया होय, वा जाबालि गोत्र था, सो पिता और मां, का गोत्र एक रहा होगा, जिस से... । सत्य स्वरूप ज्ञान द्वारा यह भी निश्चय हो रहा जिस से कि सत्य स्वरूप हो गया, जिस से यह भी स्पष्ट हो रहा, जिस से ज्ञात हो रहा जिससे समाज सुख को प्राप्त करे, अन्यथा उस की बात से लज्जा थी, सब कुल की लज्जा का उल्लंघन हो ही रहा था जिससे सत्यता समाप्त हो लज्जास्पद व्यवहार ही सिद्ध हो सकता जिससे धर्म की रक्षा न हो, पर जाबालिका विचार लज्जा युक्त निश्चय सत्यता की जड़ को ही हिला दिया गया था; सत्यता का प्रकाशक था, सत्यता को प्रकाशित कर, सब सन्देह दूर हो सकते हैं स्पष्ट था। इस व्याख्यान द्वारा भी सिद्ध यही होता कि जो कुछ कहा गया सो सत्य था। जो सत्य की पराकाष्ठा थी और सब संशय मिटे! विद्वानों का मत यह रहा कि जो सत्य रूप बात की गई सो ही मान्य और सदा ग्रहण करने योग्य ही रहा, जिसे सब जन सत्य मान कर विचार करते हुए इस प्रकार की सब शंका दूर करने में सफल सिद्ध हुए, जिस द्वारा, सत्य स्वरूप की सब प्रकार से महत्ता ही को सिद्ध किया गया, केवल मात्र नाम से पिता रूप को सब तरह से सत्य निश्चय ही माना था विद्याभ्यास हेतु सब जन की दृष्टि सत्यता ही ग्राह्य रूप से प्रमाण का रूप थी जिससे कि सब का भला होना सिद्ध हो जाता। संसार के सब कार्य सत्य पर आधारित समझे गये, जिस तरह यह सिद्ध किया गया रूप से ही सत्यता पूर्ण व्यवहार ही सब बातों का ही अवलम्बन रहा करता था जिस हेतु सब को ही मानना ही पड़ता था कि जो कुछ जन--का संशय दूर हुआ! सत्यता की विजय! सत्यता विजयी हो कर सब शंका मिटा, समाप्त कर सत्यता प्रकाश को सब जन का रूप बन कर धर्म के पालन द्वारा जगत सुधार सफल कार्य रूप सत्य द्वारा, सिद्ध होना ही सदा योग्य रहा 136