भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 154 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

समाज कोई एक प्रकार विशेष का स्वरूप नहीं, बल्कि सभी प्रकार विशेषों द्वारा अपने को पूर्ण पाता जा रहा, समझता जा रहा? सो तो सब कुछ भीतर ही भीतर घटित होकर वैज्ञानिक विधि से समय आने पर प्रत्यक्ष दीखा करता और तात्कालिक दृष्टि से जो भी विकट दिखता सो केवल तात्कालिक रूप में ही उपस्थित हुआ करता अथवा नष्ट भी हो जाता और समाज का जो स्वरूप बना, बनता जा रहा स्वरूप था, बढ़ता जा रहा स्वरूप था, उन्नत हो रहा स्वरूप बना वैज्ञानिक रूप में बढ़ रहा था, विकृत होने वाले स्वरूप वाले केवल विकृति देखकर विह्वल होकर चकरा रहेगे, वास्तविकता से दूर-दूर होकर केवल व्यर्थ का प्रलाप--सा करके, अनियन्त्रितों की श्रृंखला में पड़ अपने समय विशेष को ही नष्ट कर रहेगे, केवल दूसरों पर ही दोष न मढ़ समय चक्र को समझने का यत्न करे! इस दृष्टि से सोच प्रत्येक व्यक्ति को ही ऐसा यत्न कर लेना, सब प्रकार से श्रेष्ठ है! सो जब भी ऐसा समाज इस दृष्टि को खो बैठ कर ही सब तरह नष्ट हुआ करता केवल तब ही सब कुछ नष्ट हो कर नए से प्रारम्भ होकर विस्तृत हो जाया करता, समाज का रूप तो सदा बना रहा, बना हुआ प्रत्येक ही सम्प्रदाय के मत को इस दृष्टि द्वारा परख, जो भी अच्छाई मिले समाज रूप में उस को ग्रहण कर, जो भी दोष हो, उस को प्रत्येक प्रकार ही से नष्ट करने का यत्न कर, हर एक द्वारा प्रत्येक मत को एक ही दृष्टि द्वारा परखने का यत्न किया जाता और इस प्रकार केवल, मत विशेष-विशेष की ओर ही दृष्टि न रख कर सब कुछ समझा, देखा जा कर यदि हर प्रकार रूप व भाव का विस्तार ही दिखाई देता प्रत्येक मत द्वारा अपने स्थान पर सब प्रकार सब ओर से ही सत्यता को सब ओर से ही एक ओर सम्मुख कर ही सब कुछ बढ़ाया, उस रूप द्वारा जन-मन जागता तो, हर भी व्यक्ति सब को सब कुछ सही रूप समझ, सब कुछ सहज अपना सकता मगर, दुर्भाग्य वश, उस समय केवल एक दृष्टि द्वारा सब को नहीं जा परखा गया, केवल सम्प्रदाय व मत को ही महत्व दिया गया, जो समय विशेष रूप से केवल सत्य था, उस समय के लिए केवल उपयोगी सिद्ध हुआ आवश्यकतानुसार, केवल उसी सम्प्रदाय विशेष द्वारा, जो केवल प्रचारित रूप द्वारा फैला दिया गया था, सो केवल व्यापक रूप रूप में ही केवल विस्तृत रूप होकर ही सत्य सिद्ध समझा जाने लगा था, केवल प्रचार! जिस का ही रूप विस्तृत होकर बढ़ रहा था, प्रचारक द्वारा, केवल अपने मत को! जिस कारण ही सब प्रकार समाज का स्वरूप नष्ट सा होकर रह गया अनगिनत सम्प्रदायों द्वारा केवल यह प्रचार ही अधिक बढ़ जाने से केवल व केवल सत्य व्यापक का रूप सब प्रकार नष्ट सा होकर केवल अपने प्रचार का ही प्रचार होकर रह गया था सब प्रकार, तो न तो वह, न वैचारिक ही रहा! सो व्यापक मत द्वारा रूप बना जो सदा व्याप्त होकर सब को--प्रोत्साहित करता था, सम्प्रदायों द्वारा वह, सम्प्रदायों द्वारा रूप ही संकुचित होकर रह गया, केवल प्रचारित रूप ही रह गया, जिसका स्वरूप ही बदल गया जब जन को, हर एक को अपने स्थान द्वारा ही सबलताओं सहित समर्थ न कर सब ओर प्रचारक स्वरूप द्वारा ही हर प्रकार केवल अपने सम्प्रदाय विशेष का रूप व्यापक होकर विस्तृत कराया जाने लगा तब, जो स्वरूप बना व बढ़ा जन का स्वरूप न होकर, प्रचारक रूप केवल रहा केवल उसी जन को दो--विचारों--का प्रचार करके फैला दिया तो वह केवल अपने भावों स्वरूप का प्रचार दो--विचारों का, केवल दो--विचारों का स्वरूप होकर, दो ही रूपी दायरा बन कर रह, हर एक प्रकार व भावों, रूपों को भूल व भुला! जो भी रूप अपने मन में सब ओर देख सकता, उस प्रकार के भावों स्वरूपों को जन मन से सब प्रकार निकाल कर केवल प्रचार का रूप बना कर, हर एक का रूप व भाव सीमित कर सब प्रकार संकीर्ण बना दिया केवल दो भागों का दृष्टिकोण फैला सब सम्प्रदायों का रूप ही नष्ट कर दिया समाज विस्तृत स्वरूप को सब प्रकार सीमित कर जन--मन को ऐसा बना दिया कि केवल दो प्रकार सोचा जा सके, केवल सोच तक केवल सीमित कर सब ओर का रूप स्वयं ही नष्ट कर, हर एक दिशा को अवरुद्ध कर जन, हर को केवल दो ही ओर सोचने योग्य छोड़ कर सब कुछ नष्ट कर... । केवल दो ही प्रकार क्यों? इस का भी रूप तो प्रत्येक सम्प्रदाय--मत द्वारा ही, प्रचार द्वारा ही, हर पर लादा गया केवल था, जन जन केवल उस ओर ही सोच सके और जन को इस तरह सब ओर, 14