माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान् हमारे मन जानता, वचन को मन अनुसार करता? पर ऐसा होता नहीं तब सब लोग अपने मन अनुसार वरदान लेते ही रहते, क्यों, किसलिए तपस्यादि कर्मफल भोगना पड़ता! केवल मनोमय वाणी सत्य तब सर्व लोग वाणी द्वारा सब काम करते; केवल कर्ममय वाणी द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त कभी नहीं हो सकता जिससे निश्चय हुआ कि मन का मन पर कोई वश नहीं रहता, इसलिए जो मन का निग्रह करे, सो महाबली वा धीर वा तपस्वी होगा जो इस पर विचारवान् पुरुष होगा, सोचेगा कि, तपस्या करो, वा तीर्थ करो, दान पुण्य करो वा जो कुछ करो सो सब मन स्वाधीन वा वश किए बिना निष्फल वा व्यर्थ होता वा हो गया वा होगा, इसलिए मन तपस्या, दान वा तीर्थादिकों को सब लोग व्यर्थ समझ मन स्वाधीन वा, निर्मल करने यत्न करो, तब निश्चय जानो कि जो मनुष्य वा पुरुष, तपस्वी, निर्मल आत्मा, परमात्मा का दर्शन पावेगा निर्मल करे, मन न रोके, निर्मल न करे वा निष्काम तपस्या, दान तीर्थादिक, तीर्थादि स्नान, दान करके निष्फल, पाखण्डी हो लोक को ठगने वाले सब लोग पापी वा नरकगामी वा दुराचारी कहलाते, फिर उनका वा उस पाखण्ड का संशय वा भ्रम दूर किए बिना काम कभी नहीं, तब, जब तक अविद्यादिकों को दूर कर वा अपने को अविद्या से छुड़ाएगा नहीं, वा निष्काम वा निष्कपट हो भक्ति वा सब काम वा विद्या वा अविद्या--भ्रम जाल को काटे, अविद्यादि जाल को अविद्या--भ्रम जाल को काटे वा सब काम वा विद्या किंवा सब काम वा उस अविद्या भ्रम, पाखण्ड जाल, तथा विद्या ज्ञान करके नष्ट वा दूर करे, तब ज्ञानपूर्वक सब काम सदा ही बन पावे इस प्रकार मन को वश करने से सब प्रकार का संशय तथा अविद्यादि संशय आदि नाश होकर, आत्मा विशुद्ध हो जाता है। जो अविद्यावान्, कामी, क्रोधी, लोभी मनुष्य मन के वश में होकर सब कर्म करता, फिर उसी फल भोगता, इसलिए मन को वश करके सब काम करें। जब तक मन वश नहीं तब तक कोई कर्म सिद्ध नहीं होता, संशय भी बना ही रहता? इस बात से यह भी जाना गया कि कर्म पहले होता है वा ज्ञान अथवा कर्म से ज्ञान होता अथवा ज्ञान से कर्म-उपासना का फल ज्ञान, ज्ञान का कर्म--उपासना फल प्राप्त होता वा नहीं होता, यदि कहो कि दोनों का एक साथ; दोनों परस्पर एक साथ, तो नहीं; कभी कर्म पहले हो गया, तो कर्म निष्फल हो; कभी जो ज्ञानाभ्यासपूर्वक सब कर्म, उपासना बिना निष्फल सिद्ध होगी; कर्म का फल सब लोग चाहते, किन्तु अविद्या रूपी अविद्या का नाश हो कर ज्ञान, तब जो कर्म वा उपासना किया फल-दायक हो जाता वा निष्फल नहीं, जिससे कि दोनों का परस्पर विरोध वा एक साथ दोनों परस्पर वा इनका संयोग होना सिद्ध हुआ कि नहीं हुआ वा हुआ सिद्ध? हुआ सिद्ध? सिद्ध हुआ? तो इसका उत्तर यह जानना, संशय तब दूर हो सके, जिससे सब भ्रम दूर हो जावे, जिससे सब लोग एक दूसरेको समझा कर बोलें, जिस प्रकार विचारवान् निष्पक्ष हो, सच्चा न्याय करता है, वैसा न्याय करना चाहिए संशय का यह अभिप्राय कि सब पदार्थों का एक रूप ज्ञान निश्चय रूप नहीं होता वा संशय से विपरीतज्ञान बने, सो संशय को इस रूप में जानना चाहिए कि एक तो संशय का विपरीतज्ञान रूप वा अज्ञान ज्ञान वा संशय रूप इन दो दो प्रकार का ज्ञान बने, संशय का प्रकार सब पर विदित ही रहता हुआ, ज्ञान वा अज्ञानपूर्वक वा ज्ञान किए बिना वा अज्ञान जानकर वा भ्रम से ज्ञान संशय का, यथार्थ ज्ञान बने, संशय ज्ञान बना, संशय ज्ञान अज्ञान का प्रयोजक रूप न बन सके, न ज्ञान अज्ञान का, न ज्ञान अज्ञान का, न उस संशय रूप अज्ञान का प्रयोजक ज्ञान स्वरूप बने, ज्ञान अज्ञान रूप न, ज्ञान अज्ञान दोनों स्वरूप तो बने, किन्तु दो पदार्थों का ज्ञान यथार्थ वा अयथार्थ रूप से जाना जाय तब संशय का नाश रूप जो स्वरूप वह एक ज्ञान वा विद्या रूप में संशय का फल दूर हो ज्ञानरूप ही बन जाता इस प्रकार से संशय अविद्या का नाश ज्ञान से हो कर सब काम वा विद्या की यथार्थता को जान सकता अविद्यादिकों को दूर वा नष्ट कर मुक्ति को पावेगा, परमात्मा केवल वा अद्वितीय अविद्यारहित सब जीवों का स्वामी--हे सब मन के, हे सब जीवों के, हे सब जीवों तथा अविद्यावान् सब जीवों के मन स्वामी--हे सब प्राणों के, हे सब जगत् तथा अविद्यावान् संसारी जीवों सब अविद्यादिकों सहित संशय भ्रम सब दूर करो, सब ज्ञान रूप विद्या के प्रकाश से सब को ज्ञान रूप रस पिलाओ 151