भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 154 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

इस लिए भगवान् का धन्यवाद कर, यह कि प्रभु का नियम यह बतलाता कि निष्कामता किसे कहते और उसका फल क्या होता और यह भी कि पाप पुण्य दोनों के बन्धन क्यों दोनों एक रूप कहे गये, भला सोच तो सही, क्या तू भी पापी की नाईं संशय युक्त अथवा उस पर जो पूर्ण ज्ञान-वान् सर्वज्ञ सर्व--ज्ञ हो कर शिक्षा देता, उस पर तू संशय करे, ऐसा विचार अत्यन्त--ही तो पापो का फल-रूप होना योग्य कहा जावेगा सो भगवान् के नियम रूप पर ध्यान कर, इस से तो मन ज्ञान रूप होगा अज्ञान के प्रकाश के स्थान ज्ञान रूप का उदय उस के भाव को नाश कर देगा, जिस लिए भगवान् कह कि, निष्कामता रूप जो कर्मयोग सर्व-प्रकारक सब पापों को, जिनको कि अज्ञान के आश्रय से कहा, प्रकाश से नाश कर देता है, फिर तू संशय के विचार में क्यों उलझ रहा क्या तुझे ज्ञान प्राप्त निष्कामता रूप से नहीं हुआ जो तू संशय निष्कामता कर्म में ही मन द्वारा लगा रक्खे हुए है कि पाप, वा पुण्य का फल क्यों होता जिस से तू, क्या तू ही ? सब ज्ञान प्राप्तों को संशय हो? सो यह सिद्ध हुआ, कि तू, शास्त्र के मत अनुसार फल पावे; फलदाता को अन्यथा विचारना कि यह फल ऐसा क्यों हुआ और निष्काम कर्म संन्यास के समान क्यों हुआ संशय तो यह, फलदाता के भावों को तूने जाना ही नहीं! तो ज्ञान कहा रहा? संशय तब होता जब, शास्त्र से ही ज्ञान को प्राप्त निष्काम भावों द्वारा हो फल पाता और फल-त्याग भी, फल रूप पाया जाता तब तो यह, संशय होता? सो भगवान् ने कह, अर्जुन सुनो, शास्त्र के भाव को त्याग कर जो संशय अज्ञानी उत्पन्न हो निष्काम कर्म के स्वरूप को अशुद्ध विचार ज्ञान लाभ लाभ न हो कर ज्ञान नाश को प्राप्त होता, सोई पुरुष इस लोक में--परलोक, दोनों से रहित हो कर नष्ट होवेगा! सो हे अर्जुन ऐसा भाव तू त्याग कर, कर्म-योग निष्काम कर, जिस ज्ञान से ही तू सब प्रकार द्वारा सुखी होने का अधिकारी होने के योग्य, सुख का ज्ञान प्राप्त हो, शास्त्र अनुसार विचार कर जो ज्ञान स्वरूप कर्म-योग ज्ञान को संशयवान् पुरुष ज्ञान से प्राप्त नहीं कर सकता जिस से कि वह संशय में ही विचारवान् रहता कि फल देने वाले परमेश्वर ने कैसा ज्ञान रूप फल या पाप पुण्य के बन्धन रूप फल-त्याग से समान ज्ञान दिया वा फल किस प्रकार का? सो फल के ज्ञान, रूप को प्राप्त होता, जो ज्ञान से परे ऐसा निष्ठा युक्त विचार रूप में संशय रूप फल को प्राप्त कर देता, जिस से ज्ञान फल युक्त संशयवान् ज्ञान से रहित हो अज्ञान रूप फल को भोगता सो निष्काम कर्म के फलवान् विचार ज्ञान द्वारा प्राप्त हुए को, उस फल को प्राप्त निष्ठा, ज्ञान युक्त ही परम निष्ठा युक्त सुख प्राप्त होता अथवा संशय रूप को नाश निष्काम के द्वारा किए बिना ज्ञान की निष्ठा होना, निष्काम फल रूप फल से रहित-किए रूप फल निष्ठा को पा निष्काम के स्वरूप ज्ञान रूप संशय से परे नहीं हुआ क्योंकि अज्ञानी ज्ञान द्वारा निष्काम फल योग को संशयवान् त्याग ज्ञान द्वारा फल को निष्काम तो कह रहा, परन्तु फल त्याग द्वारा ही, जो ज्ञान रूप फल प्राप्त हो रहा था सो फल तो संशय युक्त, त्याग के फल निष्ठा को प्राप्त किए ही रहा तो फल, त्याग से फल रूप निष्ठा स्वरूप हुआ सो केवल फल रूप, जो ज्ञान द्वारा निष्ठा को त्याग कर केवल फल निष्ठावान् बना रहा, फल-त्याग रूप फल को प्राप्त न कर सका सो संशय के रूप रहा, जिस फलवान् से ही फल द्वारा फल का त्याग हो कर ज्ञान फल रूप, सो संशय के वश हुआ सो ज्ञान द्वारा संशय को नाश कर, हे अर्जुन निष्काम १ हो, हे अर्जुन तू अब सब संशय रूपी शंका त्याग कर संशय, वश से हट जा, चित्त-वृत्त को ज्ञान युक्त 152