माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रार्थना पत्र लिखनें वाले जितने समझदार या योग्य या बड़े थे, वह समझ सकते थेकि श्री स्वामी जी महाराज वैदिक धर्म प्रचारार्थ समस्त भारत वर्ष का भ्रमणकर रहे थेऔर जहांभी, जबभी, उनको इस कार्यके विस्तार निमित्त या प्रचारार्थ या धर्मार्थ जहाँपर जाना पड़ जाय वहाँही आवश्यक समझकर अवश्य जाते थे। इसलिए यह उचित थाकि, वह स्वामी जी की हर बातको वा धर्म प्रचार के कार्य को समझबूझ कर काम लें, उचित समय देखकर ही श्री स्वामीजी को आमंत्रण के पत्र भेजें जिससे श्री स्वामीजी के प्रचार कार्य में रूकावट न पड़कर विशेष लाभ पहुंचे। यह स्वामी जी स्वयं ही तय कर लेते थेकि किस कार्य को प्रथम करें; अथवा किस बात को किस समय करें, जिस समय जिसे जैसा समझा उन्होंने वैसा ही कार्य को किया या किया था, इसलिए यह तो उचित बात थी परंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिये थाकि स्वामीजी अहंकारी थे। उस समय भी प्रत्येक स्थान पर दो प्रकारके विचारके लोग विद्यमान थे। कुछ स्वामी जी, उनके मत विचार, वैदिक धर्म मत, स्वामी जी विचार और आदेश! को सर्वथा श्रेष्ठ मानकर उनके आदेश अनुसार अपने कार्यों को करते थेतथा वैदिक प्रचार कार्य में हर प्रकार से तन मनधन द्वारा सहायता कर स्वामीजी के कार्यको आगे बढाने का यत्न करते थे। परंतु, इसके विपरीत जो स्वामी जी, उनके मत तथा वैदिक विचार प्रचार के पक्ष में नहीं थेवे प्रत्येक बात में उनका विरोध ही करते! उस समय में कुछ ऐसे आर्यसमाजी विद्वान भी थेजो स्वयं को बहुत बडा विद्वान मानते, दूसरों को मूर्ख, स्वयं को धनी, श्री स्वामी जी तथा अन्य लोगों को निर्धन तथा हीन समझ कर बात करते, या व्यवहार करते तथा यह यत्न करते कि किसी प्रकार, स्वामीजी के प्रचार कार्य को हानि पहुंचे, ताकि, उस स्थान पर उन लोगों का! दबदबा या प्रभाव बना रहे। इस कारण ऐसे लोग प्रचार कार्य में बहुत बाधाएं उत्पन्न करते तथा स्वामी जी केविरुद्ध षड्यंत्र भीरचते, यह बात सर्वथा सत्य थी! इन कारणों केहोते, स्वामी जी महाराज को उस समय हर स्थान पर बाधाएं तथा कठिनाइयां झेलनी पड़तीं व कार्य में तरह तरह की बाधा उत्पन्न की जातीं। परंतु, वे अपने निश्चय पर अडिग रहे, वे अपने धर्मप्रचार कार्य को कभी न रोकते या बदलते थे। इस प्रकार दोनों दलों के होने से, यह स्पष्ट होता गयाकि उस समय भी, समाज में परस्पर विरोधी मत फैल रहे थे। इससे स्पष्ट होता थाकि स्वामी महाराज किस प्रकार निर्भय होकर धर्म का प्रचार कररहे थे। स्वामी जी प्रचार का कार्य कर रहेथेऔर वह प्रचारक रूप मेंआदर पा रहेथे। परंतु समाज में अन्य व्यक्ति ऐसे भी थेजो केवल स्वामीजी का सत्कार करके ही रुक जाते, कार्यकर्ताओं के समान वह देश भर में प्रचार कार्य को आगे बढाने में रुचि न लेतेथे। इस प्रकार स्वामी जी को ही अधिक कष्ट उठाने पड़ रहेथे। श्रीस्वामीजी के मन में यह अभिलाषा थी किउनका प्रचार स्थायी होवे, जिससे कि देश का उद्धार हो। वे यह चाहते थेकि लोग केवल उन तक ही सीमित न रहें, अपितु स्वयं भी हर कार्य को करने में समर्थ हों, वे इस बातके विरोधी थे, कि कोई मनुष्य केवल अपने कोही ईश्वर का दूत समझे अथवा उन पर विश्वास न करे। वे तो यह भी कह चुके थेकि वे भी, स्वयं को ईश्वर--दूत न मानकर केवल एक साधारण मनुष्य ही मानते--उन का उद्देश्य समाज को वैदिक धर्म की ओर ले जाने का था। स्वामी जी, इस बातके समर्थक कभी नहीं हो सकते थेकि जो स्वामी जी कहें! केवल उसी बात को धर्म का अंग माना जाय और अन्य प्रत्येक मनुष्य को इस बात की छूट नहोकि वह स्वयं धर्म की व्याख्या कर सके सके; इसलिए जब भी कोई बात या विषय ऐसा आता जिससे यह शंका उत्पन्न होती-- स्वामी जी अपने विचार को सब पर थोप रहेहैं तो स्वामी जी इसका विरोध करते थे तथापि स्वामी जी का, प्रत्येक स्थान पर यही यत्न होता थाकि वैदिक धर्म की सत्य व्याख्या सबके सम्मुख हो, जिससे प्रत्येक व्यक्ति धर्म के सत्य स्वरूप को समझ सकेऔर पाखण्ड तथा रूढियों का अंत हो सके। इन घटनाओं का सार यही निकलता हैकि स्वामीजी के व्यक्तित्व को लेकर उस समय समाज में तरह तरह के विचार काम कररहे थे। वैदिक प्रचार को उस समय केवल स्वामी जी ही आगे बढा रहेथे। प्रश्न उठता हैकि यदि स्वामी जी ऐसा न करते तो क्या आज वैदिक धर्म जीवित रहपाता अथवा स्वामी जी के प्रचार का कोई स्थायी प्रभाव न हुआ होता? इस प्रश्नपर विचार करने से स्वामी जी के जीवन का महत्त्व स्वतः ही स्पष्ट होजाता है... वे युग-युग तक याद किये जाते रहेंगेऔर उनका कार्य सदा अमर रहेगा। 19