भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

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करें, वह उनका सब काम ऐसा समझ कर ही करेगा जैसे अपना काम करता अथवा किसी स्वामी भक्त सेवक या दास अपने मालिक अथवा स्वामी का करता है, सो भला ऐसा कौन सा धन या लाभ ऐसा होगा, जो ऐसे स्वामी भक्त को वह प्रभु न देवे, सदा निष्काम भाव रख कर ही--या यों कहिये निष्काम भक्ति का? सो वास्तव विचारने की बात है निष्काम भक्ति का फल ऐसा नहीं कि कुछ न होवे, किन्तु सकामी भक्ति से, निष्काम भक्ति अधिक श्रेष्ठ और उत्तम फल देने वाली होती है। इस वास्ते भक्ति के पक्ष में मन को दृढ़ कर सब कर्मों को छोड़ कर सर्वदा भगवान् नाम का कीर्त्तन करते ही रहना चाहिये ! संसार के सब काम काज परमार्थ निमित्त नहीं होते किन्तु केवल पेट पालने के ही यह सब धन्धे हैं। और यह बात तो प्रख्यात ही, कि जिसका पेट संसार भरके जीवों को अन्न देकर पालता है, भला उस पेट भरने वाले परमात्मा दाता का जो ध्यान जप तथा भक्ति करेगा उसका परमात्मा क्या, पेट न भरेगा; वरन् जब मनुष्य सब की आशा छोड़ केवल भगवान् का, ही विश्वासी बन जाता है, उसकी चिन्ता प्रभु को आप होती है। जब वह न किसी से कुछ याचना वा आशा रखता तब जगदीश्वर आप उस पर कृपा कर सब प्रकार से निर्वाह कर देते हैं। क्या जो माता के गर्भ में? कि जहाँ नख, केश सब से युक्त, वा हाथ पांव कान से युक्त, उस मांस के लोथ को बना कर सब का खान पान का प्रबन्ध कराता? जब उस ने बालक का सब प्रकार से निर्वाह कराया? अब इस समय संसार में आके वह उसका प्रबन्ध नहीं कर सकता क्या? इस वास्ते सब बातों को छोड़ भगवान् की ओर चित्त देना, व्यर्थ की तृष्णा को? वा आशा को छोड़, केवल नामस्मरण! ही परम धर्म समझ कर चित्त को दृढ़ करो! देखो जब कभी कोई जीव विपत्--सागर में पड़ता है, जगदीश्वर की शरण ही, लेता वा शरण लेने पर कभी कोई ऐसा विपत्‌ग्रस्त नहीं रहा कि जिसका संकट दूर न किया हो, नाम का जब ऐसा प्रभाव है, भला जब संसार भरके जीवों को उस ही संकट मोचन के ही, सहारे पर यह सारा संसार चल रहा है। तब यह जीव क्यों व्यर्थ चिन्ता में पड़ कर, उस को भूल जाता वा उस का ध्यान छोड़ता, क्योंकि जो दयालुता कृपा वा क्षमा का, समुद्र दाता, जगदीश्वर में सब जीवों पर समता भाव भरी है, उस को जीव भूल कर विपदा ग्रस्त हो रोता है। क्या उस की शरण में न जाने का यह फल नहीं मिलता है, जो जीव इस भाँति इस संसार में दुखी रहता है। इस वास्ते इस संसार रूपी बन्धन को काटने को और सब--प्रकार के कष्ट निवारण, महाकष्टों निवारण का उपाय नाम का जप तथा नाम का अभ्यास ही एकमात्र साधन है? फिर क्यों नहीं जपते? जो नर भी इस नाम, रूपी मन्त्र को गुरुमुख अथवा निष्काम हो कर जप करेगा वा ध्यान धारेगा, निश्चय जान लो संसार बन्धन से छूट, मुक्ति को, वा परम् धाम को वह प्राप्त होगा। बहुत मनुष्य यह भी तो कहते, अमुक, अमुक विद्या अभ्यास करके क्या फल हुआ जब कि अपना निर्वाह ही न कर सके। और बहुत से ऐसा विचार कर चिन्तातुर रहते हैं। इस वास्ते विद्या का भी यह फल नहीं हुआ जिस से सन्तोष वा आनन्द हो। सो इसका क्या फल हुआ? इस प्रकार के सन्देह का उत्तर ऐसा समझना कि भाई जो, विद्या के द्वारा परमार्थ को न समझा वा ईश्वर के गुण को न जाना, सो उस विद्या अभ्यास का क्या प्रयोजन वा लाभ? विद्या नाम ज्ञान स्वरूप? विद्या से अज्ञान का नाश होना? विद्या का परम तात्पर्य यही है, अज्ञानता को दूर करके भ्रम मन के नष्ट करके जो, मन के सन्देह को निवारण करे और जो अज्ञानता को बढ़ावे सो! तो वह विद्या अपने को और औरों को बन्धन वा क्लेश ही देगी, सो तो अविद्या का रूप जानना तथा सो विचार कर सब भ्रम को निवृत्त ही करना सब का धर्म है। जो विद्या स्वाध्याय करके, सन्देह ही बना रहा अथवा जो सन्देह को न निवारण कर सकी, सो अविद्या रूप ही हुई वा सो अज्ञानता ही की जड़ हुई। इस वास्ते भ्रम संशयों को निवारण कर संशय विहीन, संशय से रहित होकर उस नाम को, ध्यान को, जप को विचारना ही श्रेष्ठ व कर्त्तव्य; यही विद्या का फल समझना कि जो सत्य विद्या पढ़ी है, सो सन्देहों के छुड़ाने वाली होती वा अज्ञानता को भगाने वाली होती है। सो विचार कर, विद्या प्राप्ति कर के यही करें, विद्या द्वारा यही ध्यान ज्ञान करें कि जिस का स्मरण से ही सब काम सिद्ध हो जाते हैं। उस निष्काम दाता प्रभु जिसे संसार की सब माया रूप सामग्री समर्पित हो रही है। सर्व शक्तिमान् सर्व 22

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