भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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ब्राह्मण लोग बहुत चंचल स्वभावके तो होते ही हैं। यदि उनपर दया न की जाय तो उनका पेट कैसे भरेगा, इसी से बड़े बड़े विद्वान राजा युधिष्ठिर सरीखे इनके चरण छूकर पूजा करते हैं। अब तुमको भी तो यह उचित था, जो तुम इनको एक लाख मोहरें दे देते? इसमें तुम्हारा क्या बिगड़ जाता? यह सुनकर राजा हँसा, और दो लाख मोहरें उन दोनों को दीं, पश्चात् राजाने पूछा पहिले तो आवश्यकतानुसार मांगने पर भी तुमने एक दम कुछ नहीं दिया था, पश्चात् दो लाख दे दिया इसका क्या कारण था? तब उसने उत्तर दिया, हे राजन् पहिले तो आपने अपना बल विक्रम देख कर मांगा था, सो तो कोई किसीके देने योग्य नहीं था पश्चात् जो मांगा वह उस विद्या रूप पराक्रम का फल था, सो मैने दे दिया। सो सुमति सेठ, तू भी तो ऐसा काम कर जिससे कोई विद्या आवे। विद्या रूपी धन की प्राप्ति बिना उद्योग के नहीं हो सकती। व्यर्थ का हठ छोड़ दे। इस संसार में विद्या ही सार वस्तु है, जिसके पास विद्या नहीं वह पशु के समान है, सो तू भी विद्या का उपार्जन कर। सुमति सेठ के उस मित्रने उसे इस प्रकार बहुत कुछ समझाया। तब सेठ ने अपने मित्र से, हे मित्र! आपकी कृपा से आज मुझे ज्ञान हुआ, अन्यथा अज्ञान रूपी अन्धकार सुमति सेठ ने अपने घर पर जाकर बहुत विचार किया और निश्चय किया कि विद्या प्राप्त करना चाहिये। तब वह उस पंडित के पास गया और प्रार्थना करने लगा कि महाराज मुझे भी विद्या दीजिये, जिससे मेरा अज्ञान दूर हो। उस पंडित ने कहा, विद्या तो तुझे दे दूंगा, परन्तु तू दक्षिणा क्या देगा? सुमति ने कहा जैसी आपकी आज्ञा होगी वैसी दूंगा, सो महाराज, मुझे कोई ऐसा श्लोक सिखा दीजिये जिसका अर्थ अच्छा हो? तब उस पंडित ने कहा, सहसा विदधीत न क्रियां... इस प्रकार एक श्लोक सिखाया और उसका अर्थ भी बताया। सुमति उस श्लोक का अर्थ समझकर घर आया, श्लोक का अर्थ यह था कि बिना विचारे एक दिन राजा, दो-चार आदमियों को साथ लेकर शिकार को गया, दिन-भर शिकार खेलकर जब लौटा और अपनी रानी के महल में गया, देखा नाई... ने सोचा कि युवराज तो छोटा है, युवराज को मारकर, महारानी को मारकर मैं राजपाट पर अधिकार कर लूंगा और राजा बनूंगा, यह विचारकर नाईने जहर मिला दिया और मालिश करने लगा। नाईने मालिश करना प्रारम्भ कर दिया। राजाने मालिश कराते कराते दीवार पर देखा। दीवारमें सोने के दो शब्द लिखे हुए थे—सहसा न क्रियां विदधीत अर्थात् बिना विचारे कोई काम न करो, इसका भाव नाईने राजा से पूछा तो राजाने कहा बिना विचारे काम करने से हानि होती है, पश्चात् पछताना पड़ता है। राजा ने नाई से कहा तूने यह बात क्यों पूछी? नाई डर गया, उसने हाथ जोड़कर कहा क्षमा हो महाराज, मुझसे बड़ा अपराध हुआ। राजा ने पूछा क्या? नाईने सब बात कह दी और कहा कि यह सब मन्त्री ने सिखाया था। राजा ने मन्त्री को बुलाया और पूछा तूने ऐसा काम क्यों कराया? मन्त्री डर गया और उसने सब बात सच-सच कह दी। राजा ने मन्त्री को बहुत डांटा और नाई को छोड़ दिया और मन्त्री को देश निकाला दे दिया। इस प्रकार राजा ने मन्त्र का चमत्कार इस प्रकार उस, एक श्लोक द्वारा राजा अपनी जान बचा सका। जिस प्रकार राजा विचारशील था उसी प्रकार उस सुमति सेठ ने भी उस मन्त्र का अर्थ विचार कर बड़ा लाभ उठाया। सेठ के पास एक सेवक था जो बहुत ईमानदार था, परन्तु उस सेवक की स्त्री बहुत चंचल थी, उसने सेठानी से कहा तू अपने पति को विष देकर मार डाल और राजा से विवाह कर ले, राजा तुझको पटरानी बनावेगा। सेठानी मूर्ख थी, उसने इस बात को स्वीकार कर लिया, और एक दिन भोजन में विष मिला दिया। जब सेठ भोजन करने बैठा तब उस श्लोक का स्मरण आया कि बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिये? तब उसने भोजन की परीक्षा की तो देखा कि भोजन में विष मिला हुआ था। तब सेठ ने अपनी स्त्री से पूछा, तूने यह क्या किया? तब स्त्री रोने लगी और बोली मुझे क्षमा कीजिये। सेठ ने उस श्लोक का धन्यवाद किया। सुमति सेठ उस श्लोक के बल से बच गया, सो हे राजन्! बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिये। जो काम बिना विचारे किया जाता है उसका फल बुरा ही होता है, इसलिये सदा सोच-समझ कर काम करना चाहिये। जो मनुष्य बिना विचारे काम करते हैं, वे अन्त में पछताते हैं। अतएव हमें भी कोई काम बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिये। इस प्रकार विद्याधरने सुमति सेठ की कथा राजा को सुनाई और कहा कि हे राजन्! तू क्यों व्यर्थ चिन्ता करता है? विद्या से सब कुछ सिद्ध होता है। 25