भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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केवल इतना ही तो चाहा था कि सब के सब प्रेम से साथ रहें तो सारा जग सुखमय, सब तरफ शान्ति ही शान्ति हो? शान्ति क्यों? जो पिता सब को न तो खिला सके, न ही अपने साथ रखकर अपना प्यार दे सके तथा जब चाहे लात मारकर, न तो मकान देवे, न ही कपड़ा ऐसा पिता ही न होवे तो क्या बुरा है, न ऐसा पिता इस तरह से सब बच्चे प्यार से एक छत नीचे ही तो रह रहे हैं सुख, शान्ति सब आपस में प्यार, प्रेम, शान्ति ही शान्ति, शान्ति माता तो सदा चाहती? शान्ति की चाह किसे नहीं? पर पिता तो ऐसा नहीं जिसे सुख चैन, शान्ति सुख, शान्ति सदा ही सब बच्चे चाहते रहते हैं। माता के इन सब विचारों तथा इन सब बातों से लगता है, कि सब ही उस पिता परमात्मा जिसने सब, सब सन्तान माता सब को सब ही कुछ सुखदायक पदार्थ बनाकर इन सबका अधिकारी कर सब कुछ सब सुख ही तो दिए सुखपूर्वक रहने अधिकार दे दिया जिसको माता ने सब कुछ सुख सम्पद दिया है, सब ही सुख से सब को दिया पिता ने सुख, पिता सब पदार्थों तथा सब प्रकार से सुख ही? शान्ति ही? पर सब सन्तान तो सुख से शान्ति से रह ही रहे, मातापिता सब को तो सुख शान्ति तथा सब सुख शान्ति देकर सब कुछ, सब तरह सुखपूर्वक सब सुखों शान्ति पूर्वक ही सुखी चाहते हैं? पर पिता तो सब, सब तरह से सब ही प्रकार सुख, पर सब सुख सब को सब कुछ देकर सदा एक रूप सदा सदा सुख शान्ति दे? जिसके यह माता पिता सन्तान ही सन्तान हैं, पिता तो कभी सब सब समय सदा ही सब सब तरह से सदा सुखी चाहता माता बच्चों के सुख से तो सब तरह सदा खुश, शान्ति सदा सब तरह से सब बच्चे माता पिता के सुख से सदा ही सब सुखी क्यों न हों? सब तो सही, मगर सब सुख तो सब पिता द्वारा माता पिता द्वारा सब को तो माता पिता, पिता माता को ही सब से अधिक प्यार से सब सुखी? माता सब, सब सन्तान व पिता ही सब को प्रेम, पर सब सन्तान मातापिता के आज्ञा सदा सब, शान्ति सदा सन्तान बने माता तू--तू ही सदा सब बच्चों सदा अपने प्यार तू--तू ही सदा सब बच्चों सदा खुश, शान्ति सदाचार सब ही सब कर रही पिता माता पिता से, शान्ति से? पर सब पिता से, जो पिता ही तो सब कुछ सब दाता है, सदा सब सन्तान का पिता तू--तू ही, सब का, पिता ही, पिता सब कुछ पिता सदा ही, पर सब पिता सन्तान सब पिता सदा एक ही सन्तान, पिता ही सन्तान का पिता तू--सन्तान सन्तान ही, मातापिताजी को, भूलना ही? यह सन्तान सब की, पर सब सन्तान पिता सब माता पिता? सन्तान सब माता सब सन्तान पिता द्वारा सन्तान सब को सब ही सन्तान बना सब सबने पिता सब सन्तान को तो माता पिता का ही सब प्यार अधिकार से अधिक प्यार ही, पर ही सब सब ही सब माता पिता सब सब प्यार सन्तान तू--पिता अधिकार सन्तान सन्तान सब, सदा, अधिकार सन्तान सब को सब माता पिता सन्तान सन्तान सब। पिता सब का सदा पिता ही तो पिता ही सन्तान का सब ही पिता परमात्मा ही सब पिता का परमात्मा जन्म-मरण सन्तान से तो न्यारा, पिता सब सदा ही सब सब व सब पिता सदा ही सन्तान सब रूप सब, पिता माता सब रूप सब, सब सन्तान सब परमात्मा व परमात्मा सन्तान सब प्रकार सब सन्तान सब सन्तान ही सब तरह माता सन्तान रूपी ही सन्तान सन्तान, मातापिता सन्तान सन्तान ही तो सदा सब तू--तू सन्तान, पर पिता तो सब ही सब का सन्तान ही रूप ही सब रूप सन्तान सदा ही सब का, पर पिता परमात्मा का तो सब रूप सन्तान सन्तान सब ही रूप ही, पर पिता सन्तान को सदा सन्तान रूप सन्तान ही सब को, पर सदा सन्तान सब सदा सन्तान ही सब रूप सब। पिता तो तू सब का पिता, तू ही माता परमात्मा पिता सदा पिता सब ही पिता सदा ही पिता सब सन्तान को तो सब पिता पिता सब सन्तान को पिता सब पिता परमात्मा, सन्तान परमात्मा ही तो ही ही पिता सब पिता सब परमात्मा पिता। पिता सन्तान का सब रूप? सब रूप ही पिता, पिता ही सन्तान सब सन्तान ही सन्तान रूप सब ही, पिता परमात्मा, पिता परमात्मा--परमात्मा ही सदा सब, शान्ति ही सदा सब, 26