भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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विचार करके देख लो संसार का इतिहास उठाकर, जिसने माता--पिता का तिरस्कार या अनादर अथवा उनकी बात नहीं मानी और उनका दिल दुखाया हो, तो कभी शान्ति पूर्वक रह नहीं सकेगा या उसका वंश अथवा वह कभी भी सुखी रह सके यह नहीं कह सके, लेकिन जो कोई हृदय रूपी गुरु आज्ञा धारण करके माता पिता की सेवा और आज्ञा का पालन करते हैं वह सुख का आनन्द हमेशा पाते रहते हैं और सदा उन पर भगवान की कृपा भी बनी ही रहती व यश पाते, और अन्त में उस परम आनन्द धाम को पाते, राम का उदाहरण प्रत्यक्ष पर आज तो संसार स्वार्थी, कपटी व पाखण्डी बनता, विचार ही बिल्कुल विपरीतार्थ दिशा में बदल व विपरीत दिशा में सोचने लग पड़े जिसका नतीजा है, कि वह कभी सुखपूर्वक शान्ति से रह तो ही नहीं सकता है, बल्कि अशान्ति से भरा रहता व दुःख भोग रहा क्योंकि सच्चाई के पथ से भटक ही गया, हर एक इन्सान पर आज माया ऐसी सवार हो रही व ऐसा प्रभाव डाल रखा कि कोई भी सच, शान्ति का दम नहीं भर रहा बल्कि स्वार्थ के वशीभूत होकर, चाहे सन्तान, चाहे कोई अपना सम्बन्धी अपने स्वार्थ के वश होकर ही आज माता पिता को अपने घर अपने पास रख या सेवा कर या फिर अपने से पृथक करके दुःखी कर रहे कई सन्तान तो केवल व सोचे कि माता पिता अपनी सारी जिन्दगी की कमाई मुझे, या जो कुछ भी उनके पास जायदाद पैसा रुपया हो वह सब ही मुझे दे दिया जाये चाहे, मेरे ही भाई और बहन को न मिले और उनका कोई भी हिस्सा न रहे जो केवल मैं अपने पास रखूँ जिससे मैं अपना गुजारा चलाता रहूँ व, तो सन्तान केवल अपने स्वार्थ खातिर बाप से प्यार तो जताती या कहती कि पिताजी आप हमारे साथ रहिये ताकि जायदाद अपने ही हाथ में आ सके; जब देखा या बाप, तो फिर उनका आदर भाव खत्म हो गया या छोड़ दी उनकी सेवा या दूर भगा दिया जायदाद ले, फिर क्या रहा आज तो सारा संसार ही ऐसा स्वार्थी बन, फिर शान्ति का पाठ कहाँ मिलेगा माता पिता को देखना भी कई सन्तान नहीं पसन्द करती व जब माँ बाप वृद्ध होकर किसी सहारे या भोजन के मोहताज हो जाते तब--तो उन्हें या छोड़ दिया जाता बाहर या फिर, वृद्धा आश्रम भेज कर छुटकारा पा लिया लो! लेकिन यदि वे खुद भी विचार करके देखें कि कल हम भी तो माता पिता की श्रेणी में ही आ गये हैं सन्तान के, कल को जब हम बूढ़े होंगे? तो क्या वह भी ऐसा बर्ताव हमारे साथ करेगी तब क्या शान्ति मिलेगी? विचार करो इन्सानों विचार जो भी संसार में आया है उसको यह शरीर छोड़ कर एक दिन जाना अवश्य ही पड़ेगा! तो फिर यह दुनिया दो--दिनों, थोड़ी देरकी खातिर क्यों पाप के भारी कर्म कर अपना ही बुरा कर रहे इस सच को समझो जी, इन्सानों, सच्चाई के पथ पर चल कर सच्चाई--धर्म, दया, नम्रतापूर्वक व्यवहार करो हर इन्सान से तभी सुख, ही सुख सब जगह ही पाओगे आज हर घर परिवार में एक दूसरे पर ईर्ष्या क्रोध जलने की अग्नि सुलगाये, एक दूसरे को न देख कर खुश बल्कि ईर्ष्या जलते ही हैं, हर एक घर आज नरक बना हुआ है भाई, नरक कहाँ मिलेगा! स्वर्ग तो शान्ति में, तो शान्ति का मूल क्या है? आज भाई--भाई की जान का बैरी बना हुआ या भाई भाई को आपस में दो--फाड़ कर रहे, एक ही माँ का सन्तान भाई ही भाई--परिवार को उजाड़ने, मारने में, अपना बड़प्पन रूप पाखण्ड को ही अपना मान--शान समझ मनुष्य ही तो इन्सान का ही गला घोंट या तो इन्सान उस रब को केवल मात्र परमात्मा जानकर ही सब कुछ समझ कर निर्वाह करता या तो यह सोच समझ कर त्याग करता, दयावान् बनता, परोपकारी बन, अपना जीवन, तो सब सम्भव निर्वाह हो ही जाता जिस पर सदा उस दाता की कृपा बनी रहती पर आज उल्टा पाठ ही, इन्सान पढ़ रहा जिससे इन्सानियत इन्सान रूप में है? आज इन्सान पाश्विक, रूप धारण करता जा रहा, जिस सच इन्सान को पहचानना है, उस सच्चाई को भूल बैठा मनुष्य, जिस के लिए बार बार यह दुनिया में ही इन्सान का जन्म दिया है परमात्मा ने जिस से हर एक मुक्ति पा, उस का ध्यान लगा मुक्ति रूप जन्म--मरण बन्धन से ही सदा--सदा छूट--कर छुटकारा 30