भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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लेकिन विस्मय केवल इसी पर निर्भर न था कि संन्यासी सब का सब भोजन कर गया जिस भोजन करने वाले में साधारण व्यक्ति पचास मिनट लगाता उसे संन्यासी ने दस मिनट में, उस सब भोजन को इस प्रकार समाप्त कर दिया था कि जैसे भोजन था, ही नहीं या फिर न जाने सब का सब भोजन कहाँ समा गया, पर सब लोग इस देखकर यह निश्चय करने लगे थे, यह भी, न तो संन्यासी का यह पहला काम पहले कभी का किया हुआ संन्यासी का खेल था। वह खेल केवल था, जिसे दिखलाकर सब संन्यासी का विश्वास कर रहे थे, सब का ध्यान अपनी तरफ कर लिया। वह संन्यासी यह विश्वास सब लोगों अथवा एकत्र जन पर इस प्रकार जम, जमने जा रहा था! केवल इतना नहीं, जो कुछ भी वह संन्यासी अपने मुख से कह रहा था, एकत्र जन पर उस एकत्र जन समुदाय पर उसका ही प्रभाव पड़ना! जमना! सब लोग जो संन्यासी के पास एकत्र थे, वह सब इस प्रकार उस ओर जा रहे थे मानों उनका, जो कुछ सोच विचार उस बात अथवा इस ओर उस समय हो रहा था, केवल वह समाप्त हो रहा था और जो कुछ वह सब संन्यासी कह रहा था, सब एकत्र जन उस पर ही विश्वास न केवल, बल्कि सब उस प्रकार केवल उस पर विश्वास करने अथवा करने के ही योग्य थे, जो वह संन्यासी कह दिया करता था। इस ओर सब एकत्र न केवल थे, पर उन एकत्र अथवा संन्यासी के बीच में यह अंतर पड़ता जा रहा था कि वह सब संन्यासी को देख-देखकर प्रसन्न केवल होते ही न रह जाते थे बल्कि संन्यासी के उस खेल-तमाशे अथवा खेल पर विश्वास करके संन्यासी पर अपना विश्वास इस प्रकार से कर रहे थे कि वह संन्यासी को केवल एक ऐसा व्यक्ति ही मानकर न रह रहे थे, जो केवल पेट भरने के ही लिए संन्यासी बनकर घूमता फिर रहा हो अथवा जिसे केवल भोजन से, या सब प्रकार की सांसारिक सुख-भोग से मोह वह केवल यह देख प्रसन्न थे, जो वह संन्यासी भोजन कर रहा था, जिसे वह न केवल एक साधारण जन से अधिक खा रहा था बल्कि साधारण व्यक्ति से अधिक? उस सब पर अविश्वास तो, था ही नहीं सब लोगों को उस समय जो एकत्र थे, पर वे सब जो कुछ भी अविश्वास इस बात पर कर रहे थे अथवा कर रहे थे कि क्या वह संन्यासी सच, में भोजन था, या भोजन से, या केवल पेट, में भोजन न--था सब का सब ही! जिसे सब एकत्र लोग समाप्त हुआ देख रहे थे, केवल विस्मय ही सब को हो रहा था। संन्यासी के मुख पर वह तेज चमक रहा था, जिस मुख-तेज पर एकत्र जन सब प्रकार मुग्ध होकर उस ओर देख रहे थे और संन्यासी की बात शांत होकर सुन रहे थे। जिसे संन्यासी केवल एक खेल समझ रहा था! संन्यासी जिसे सब कुछ न समझकर केवल एक खेल समझ रहा था! पर जो सब एकत्र लोग वहां संन्यासी को, उस संन्यासी को सब कुछ जानकर मान रहे थे। केवल इतना ही नहीं संन्यासी सब लोगों को वह सब सुना रहा था जिसे वह उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर न केवल न केवल कह रहा था, बल्कि जो कुछ सब उस उत्तर-पश्चिम की ओर देख रहे थे अथवा संन्यासी को उस दिशा की ओर मुंह किए हुए सब लोग एकत्रित थे, जिसे संन्यासी सब प्रकार से कह रहा। संन्यासी को भोजन सब लोग अब तक साधारण भोजन मात्र कहते आ रहे थे। केवल यह ही, साधारण भोजन संन्यासी को केवल पेट भरने वाला कहा गया था, अथवा लोग, जिसे भोजन कह रहे थे वह केवल पेट भरने वाला भोजन था उत्तर- पश्चिम दिशा की ओर संन्यासी उस उत्तर-दिशा की ओर देख रहा था। संन्यासी का भोजन सब ने न केवल देखा, न सब लोगों को उस प्रकार का भोजन ही समझा जा रहा था अथवा, भोजन सब ने देखा, पर संन्यासी केवल पेट का भोजन ही न समझा जा रहा था। पर आश्चर्य, इस बात का था कि वह सब भोजन पेट का ही भोजन था! वह भोजन सब लोग जिसे, पेट का भोजन ? कह रहे थे कि वह संन्यासी केवल, पेट भरने भर को भोजन कर ही रहा था? क्या वास्तव में, वह भोजन था? क्या संन्यासी का, वह भोजन था? इस ओर का भोजन सब को समझ में आ रहा था कि भोजन था, भोजन सब को पेट भरने का भोजन लग रहा था, पर वह भोजन संन्यासी का था, संन्यासी के ही उस भोजन को स्वीकार कर रहा, पर वह स्वयं पेट से भोजन कर रहा था या पेट को भोजन दिया जा रहा था! सब लोग देख रहे थे, केवल 35