माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस बात का फैसला, स्वामी राम और राम महाराज ने, दोनों संप्रदायों की उपस्थिति निर्णय पत्र लिख लिखा करके कर न्यायालय से भी प्रमाणित करवा कर ही तय कर दिया गया, जिससे कि भविष्य कभी कोई विवाद या द्वन्द न खड़ा हो सके, पर हां जी, यह तय हो जाने पश्चात् भी श्री स्वामी जी के शिष्य, इन को अपना गुरू ही मानते व पूजते महाराज श्री मंगल-दास जी स्वयं जीवन पर्यन्त नित्य प्रति प्रात स्नान करने जाते, तब सर्वप्रथम् स्वामी शरण देवाचार्य महाराज की समाधि पर प्रणाम अवश्य ही किया करते और हर समय समाज में इन तीनो संतो व गुरु जी, का सम्मान समाज में ऐसा दिलाते कि जिससे किसीको संकोच या सन्देह न रहे, इसलिये संत, भक्तगण सब दोनों संतों सामान आदर देते, किन्तु अपनी निजी निष्ठा केवल महाराज श्री मंगल दासजी में, ही मानते कि जिनका शिष्यत्व उन लोगों ने स्वच्छा से स्वीकर व धारण किया था। पश्चात् स्वामी जी ने जो जो वचन ले या फरमा दिये थे, उनको हमेशा निभाते रहे। और अपनी निजी शक्ति व योग्यता के अनुसार हमेशा समाज हित का कार्य करते रहे। संतो भक्तों को नाम दान उपदेश दिया सो अलग रहा पर समाज कल्याण के हित में कार्य और बढ़ कर किया जिसके विषय में आगे हम पाठक को अवगत करा यहां पर हम जन साधारण पाठकों की समझ में आने हेतु यह भी व्यक्त कर देना उचित समझते हैं। कि जिस समय स्वामी शरण देवाचार्य जी महाराज नित्य लीला में लीन हुए उस समय समाधि पर जो जो सामान दिया गया था उस समय का, किसी कारण वश फोटो नहीं खींचा गया था। अतः यह सब सामान स्वामी जी को भेंट किया! ऐसा फोटो स्वामी शरणदेवा समाधि गद्दी व श्री संत! से भेट करा दिया गया व कैसा? अज्ञानता वश गलत प्रचार किया गया जिस पर पाठक ध्यान नदेवे। अब केवल आप को इस बात का पूर्ण निश्चय कर लेना चाहिये! स्वामी राम जी द्वारा जो कुछ किया गया सो केवल श्री राम द्वारा रचित विधान स्वरूप हुआ यह सब प्रभु की ही लीला थी सो सो ही सब हुआ स्वामी भगवान स्वरूप पूज्यपाद स्वामी शरण देवाचार्य जी महाराज का किसी भक्त विशेष से कोई द्वेष भाव? कभी नहीं हो सका न होना ही संभव रहा, क्योंकि उस समय सारा जगत ही, उनके लिये तो सिर्फ परमात्मा का ही रूप रहा, सिर्फ उस ही समय स्थिति को सम्भालने के लिये ही जो जो विधान हुआ होगा वही सबको मान्य रहा पर स्वामी श्री मंगल दास जी महाराज के हृदय में जो आदर, व सत्कार गुरु चरणो भगवान देवाचार्य महाराज प्रति सदैव रहा व उस पर अमल भी किया, तथा सत्कार स्वरूप अपने गद्दी पर हमेशा श्री स्वामी जी, महाराज की फोटोयुक्त तस्वीर रखी तथा उसे साक्षात स्वरूप समझ कर ही, रोज उस पर हार, धूप दीप व भोग नैवेद्य लगा कर सब को चरणामृत रूप में तो दिया, सो वर्तमान तक भी यह क्रम सब तरफ चालू चला आया देखा गया पर इसके विपरित भी क्या ऐसा सम्भव? हो सका यदि हम ऐसा कहे कि स्वामी मंगल दास जी को इस बात का तो पश्चाताप रहा होगा और प्रायश्चित रूप उन्होंने यह सब कुछ किया तो ऐसा सोचना कदापि भी सत्य रूप को नहीं प्रकट कर रहा बल्कि यह तो उनका हृदय स्वरूप भाव स्वतः प्रभु भक्ति रूपी उदार हृदय था! जो केवल आत्मिकभाव लिये ही था निष्ठा मन भाव स्वयं उनका अपना कर्तव्य समझ कर कर रहे थे न कि किसी के दबाव में अथवा किसी लोभ लालच में आकर ऐसा कर रहे थे; क्योंकि ऐसा करने से उनका जो लक्ष्य सदा निष्काम सेवा स्वरूप था, जिसे समाज के लिये आदर्श उप--देश, मिला यह बात भी निर्विवाद, सत्य है कि जो मनुष्य जैसा कार्य करेगा व पायेगा, जो जैसा बोयेगा वही फल पायेगा, दूसरा उस को नहीं ले जा सकता, यह बात तो केवल ही नहीं अपितु पूर्ण सत्य रूप में हम सब,मानव जाति पर लागू होती देखी जाती, जिसे कर्मफल कहा जाता है। इसलिए भी, यह तो तय रहा कि जन-हित में किया गया कार्य कभी निष्फल या अकारथ ही सिद्ध नहीं होता, देर भले ही लग जाय पर परिणाम तो रूप व अच्छा फल ही प्राप्त होता है जो समाज को देखकर सुखी हो, यह वास्तविकता ही सच है जो सदैव अमर रहने का रूप इस नश्वर जगत छोड़ स्वामी मंगल जी ने जो भी कुछ किया उसका भी फल उनको सुयश रूप में प्राप्त हुआ जिसका ही फल, आज सारा संसार देख रहा है, कि आज कोई ऐसा संत समाज या स्थान होगा जहां मंगल धाम, मंगल निकेतन, मंगल चिकित्सालय न बना देखा गया हो, जहां मरीजों को लाभ मिल रहा, असहाय जन लाभ उठा रहे हैं तो उन को, मंगल स्वरूप ही नजर आ रहा है। मानव के तन भगवान द्वारा दिये जाते, व मनुष्य को जन-कल्याण रूपी इस तन से व साधन का सद-उपयोग करके संत, भक्त जन, अपने नाम रोशन कर
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