भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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सुनो ! हम विश्वास पूर्वक कहते कहते थक गये कि भगवान सदा प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ रहते तथा हमारी सहायता तो करो, पर सम्भवतः विश्वास नहीं होता। जरा सोचो हमारे जीवन निर्वाह की चिन्ता स्वयं भगवान को ही करनी पड़ती है। अन्यथा हम असहाय होकर क्या कर सकते हैं। हमारा जन्म, पालन-पोषण भी एक ऐसा कार्य है, जिससे यह स्पष्ट पता लग जाता है कि ईश्वर ही प्रत्यक्ष होकर यह सब कार्य करते हैं। अतः अविश्वास का प्रश्न केवल एक बात बता दीजिये कि जब आपका जन्म हुआ तो क्या आप स्वयं ही उपस्थित हो गये, या आपके लिए भोजन पानी हवा आदि की सब प्रकार पहले प्रबंध था। अथवा किसी बात की कमी थी। यदि यह सब कुछ सत्य है, और निश्चित सत्य है। भगवान का यह सब प्रत्यक्ष रूप से आपके जीवन निर्वाह में सहयोग था तो क्या अब उन्होंने अपना सहयोग देना बन्द कर दिया, जो इस तरह भयभीत रहते हो? वास्तव में यह केवल आपकी अज्ञानता का ही प्रमाण है, जो अपने भगवान सम्बन्धी विचार, ज्ञान को विकसित करने की चेष्टा नहीं करते। जीवन व्यतीत करते-करते भी, यदि हम प्रभु की ओर अपनी दृष्टि रखें, भगवान्‌ सदा ही हमारे साथ हैं। वे हमारे लिए सब कुछ करते हुए भी कभी अहङ्कार नहीं करते। बस, यह देखना है कि प्रभु का ही आधार है। यह भाव मन में बैठाने का प्रयत्न करना ही जीवन का ध्येय है। भगवान पर विश्वास न रहने का फल ही यह है कि मनुष्य अपनी भलाई ! अपने विचार भगवान्‌ ओर ही समर्पित कर नियमित रूप से ध्यान करें। तब उस समय का वातावरण स्वयं ही पवित्र हो जायेगा, सो भी ऐसा जिसका प्रभाव कभी नष्ट होनेवाला नहीं होता। इस प्रकार जब हम प्रभु के प्रति अपनी लगन को बढ़ाते रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे प्रति अपनी कृपा को बढ़ाते रहेंगे। अतः प्रभु का स्मरण सदा करना चाहिये। जिस प्रकार एक पतङ्गा अग्नि को देखकर, उसमें कूद पड़ता है। इस प्रकार की लगन यदि ईश्वर के साथ रखी जाये तो अवश्य ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। संसार के माया-जाल में फंसकर मनुष्य प्रभु से विमुख हो जाता है। जो कि ईश्वर के प्रति किये गये उपकार का फल उलटा देना है। ईश्वर ने यदि संसार बनाया तो हमें सहयोग देने के लिए, न कि अपने स्वरूप को भूल जाने के लिए। अतएव, भगवान्‌ सदा हमारे साथ रहते हैं, इस पर विश्वास न होना ही मनुष्य की भारी भूल है। जब कभी भी संकट आये, तब यही समझें, 'भगवान्‌ ही परीक्षा ले रहे हैं।' प्रभु की लगन ही ईश्वर से मिला सकती है। इस प्रकार प्रभु से सम्बन्धित हो कर विचार करने पर मालूम होगा कि भगवान्‌ से तो हमारा नित्य का नाता है, जिस का कभी वियोग नहीं हो सकता। इस प्रकार यदि प्रभु का चिन्तन किया जाये तो हम निश्चय ही पाप-कर्मों से छूट सकते हैं। जब प्रभु हमारे साथ हर समय है तो परमात्मा का ध्यान सदा बना रहना चाहिये। ईश्वर सर्वव्यापी है। यह जानकर जब इस बात का निश्चय हो जाता है तो प्रभु के प्रति लगन बढ़ती है। जो कुछ इस संसार में दिखाई देता है, वस्तुतः वह सब उस शक्ति-सम्पन्न का चमत्कार मात्र ही तो है। प्रभु की कृपा से ही ज्ञान का प्रकाश होता है। यदि प्रभु की कृपा न होती, तो हम अज्ञान के अन्धकार में भटकते रहते। अतः प्रभु के प्रति लगन ही हमारा जीवन ध्येय होना चाहिये। हमें सदा इस बात का विचार रखना चाहिये, कि यह संसार नाशवान्‌ है। प्रभु ही नित्य- स्वरूप है। जो सदा हमारे कल्याण के लिए तत्पर रहता है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के पश्चात् मनुष्य के मन में शंकायें उत्पन्न नहीं होतीं। ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान्‌ है। ईश्वर सब जगह व्याप्त है, उसका न आदि है न अन्त, परमात्मा सदैव ही विद्यमान रहता है। प्रभु के दर्शन करने का साधन केवल प्रेम है। ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना होना ही प्रभु-दर्शन का कारण बनता है। मनुष्य केवल प्रभु की शरण में जाने पर, प्रभु के प्रति समर्पित होकर ही प्रभु को पा सकता है। इस प्रकार जब भगवान्‌ की कृपा से मनुष्य का संशय दूर हो जाता है, तो फिर शंका कैसी? वह तो प्रेम में डूब जाता है। प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम का फल यह होता है कि प्रभु को कभी भी नहीं भूला जा सकता। प्रभु-दर्शन से बढ़कर संसार में और कोई आनन्द नहीं हो सकता। प्रभु-दर्शन पाकर मनुष्य कृत-कृत्य हो जाता है। ईश्वर के प्रति इस प्रकार की निष्ठा रखने वाले भक्त का जीवन ही सफल है। भक्त, भगवान्‌ का दास बन जाता है।

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