माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकहना पड़ा होगा, हाँ, न्याय संगत अधिकार देने की बात कही जाय अथवा किया जाय तो वह बात सुन कर हँसेगा, सिर धुनने लगेगा या कान बन्द कर लेगा। जो प्रत्येक को रूप, रस, गन्ध स्पर्श! का ज्ञान, वाणी शक्ति से मुक्त कर दे? उसके बाद भी हम यह न सोच सकें तो, सो तो सो ही गये होंगे? हम तो सो गये, मगर वो जागा ही, जिस ने प्रत्येक को ज्ञान से भी वंचित कर डाला तथा यह न सोचे कि हम भी कभी जागेंगे? उठ कर खड़े तो नहीं होंगे? जब से उठ कर वो सब कुछ कर डाला जिसका परिणाम हम भोगते रहे, फिर भी हमारी अक्ल पर तो ताला लगा रहा, न तो हम ने अपने अस्तित्व को, न ही उस की राह को जाना जो समाज को, देश को आगे लेकर जाती है? वो लोग अधिकार दे या न दे मगर उनका तो फर्ज बनता था सो उन्होंने किया, हम लोग अपना फर्ज भूलते जीवन तो समाज का था, उस वक्त जिस प्रकार से अन्धविश्वास बढ़ ही गया था कि लोग या तो वो सब जानते नहीं थे, जिस कारण समाज से बहिष्कार या समाज निष्कासित कर दिये जाने का भय बना रहता, क्योंकि बहुत सारे अत्याचार तो केवल इसी, से डर कर लोग सहन कर रहे थे, उस वक्त उन लोगों क्या वो अधिकार था? क्या वो समाज से बहिष्कृत नहीं हो रहे? वो अकेले पड़ गये थे मगर वो, उस वक्त वो समाज से बहिष्कार को नहीं, अपने विचार प्रवाह को ज्यादा महत्व दे रहे थे? हालांकि समाज से ही तो वो सब डर रहे थे, सो जन-जागृति का बिगुल, समाज को ही जगा कर तथा समाज के ही लोगों को जगाकर बताया गया कि वो जो कर रहे हैं, वो सब सो रहे हैं! जब जगाया जा रहा, उनकी राह सरल की जाती हो तो, वो सो ही रहे हैं! जाग जाओ, इस प्रकार के संदेश जन तक लोग पहुंचाते रहे, मगर उस अन्धविश्वास को, उस वक्त समाप्त कर पाना बड़ा कठिन दायित्व! उस वक्त निर्वहन किया गया! जो प्रकाश उन के द्वारा इन लोगों को मिला वो लोग प्रकाश को प्रकाशित तो कर सके, पर अन्धकारमय उस राह को जिसे समाज पर थोपकर यह दिखाया जा रहा था सब कुछ, अन्धविश्वास से ग्रसित हो समाज के ही लोग कर रहे थे। इस से बड़ा क्या होगा, कि लोग अपने हक अधिकार को पहचान नहीं, उस वक्त पा रहे! वो प्रकाश उन के ही अन्धकारमय के उस स्वरूप को सामने लाया, जो केवल अपने लाभ के लिये ऐसा किया जा रहा था अथवा सो सोचा जा रहा था! वो लोग समाज सुधारक बन कर सामने तो आये, समाज की बहुत सारी ऐसी प्रथाओं को तो दूर कर सके! उस काल में भी लोग, सब के अन्धविश्वास से मुक्त तो नहीं मगर कुछ तो थे जो उन सब बातों को जान चुके थे, इस लिये समाज को एक रोशनी मिली तो प्रकाश फैलता गया, जब रोशनी से राह को देखा गया, तो लोगों समझ कर उस राह को अपनाया जिस कारण आज हम सब कुछ बन सके हैं। यदि हम समाज के लिये कुछ-कुछ भी कर पाते हैं तो उस विचार को तो माना ही जा रहा है। जिसकी शुरुआत उन लोगों ने की, क्या विचार वो सब था? हालांकि! उस का स्वरूप, वो आज तो नहीं? जो सब हम देख रहे हैं, वो स्वरूप तो आज का नहीं? वक्त के साथ बदल गया सब। मगर सच, क्या हमारा समाज आज-कल सही की तरफ जा रहा है? कुछ लोग आज भी तो अन्धविश्वास अथवा अंध विश्वास फैलाकर, तथा अंधविश्वासी बनाकर ही समाज को दिशा-हीन तो नहीं कर रहे? कुछ लोग तो ऐसा कर ही रहे हैं, अन्धविश्वास को अपनाकर हम उन लोगों को बढ़ावा दे सकते हैं अन्यथा नहीं! उस वक्त के, स्वरूप से तो वर्तमान का रूप सही नहीं, अंधविश्वास केवल रूप तो बदल गया मगर उस स्वरूप को सब लोग आज भी नहीं समझ पा रहे हैं कि क्या है और क्या नहीं! हालांकि वो ही, इस बात को नहीं मान कर अपनी राह बना रहे होंगे। वो, उन बातों को छोड़ कर आगे बढ़ रहे तो उनका तो कल्याण हो ही गया, पर जो अन्धविश्वास के साथ आगे बढ़ा होगा, 43