माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिए तुम सब उस प्रभु का भजन करो। परमात्मा दयालु, कृपालु, सब जीवोंपर उसका बड़ा भारी उपकार है! उस उपकार को जो मनुष्य भूल जाता है—कृतघ्नताका वह पाप सिरपर बाँधता है। अरे भाइयो, उठो सचेत, उस परमात्मा की शरण गहो! यह विचार कर किसी वृद्ध ने कहा—हे भाई! मुझे तो अब तक मालूम ही नहीं हुआ था कि माता- पिताका हमारे ऊपर इतना उपकार है। आज प्रभु की कृपा से सब ज्ञात हुआ, जो उपदेश तूने दिया, बड़ा उत्तम उपकार का रूप हमारे मन में दृढ़ किया। सो अब ऐसा उपाय बता कि जिससे हमारा उद्धार कैसे हो। सब दुःखों से छूटने का उपाय क्या है! तब सब को ऐसा समझा उपदेश दिया—हे भाई! जो माता का भजन न करे—जो पिता की सेवा पूजा मन से न करे—जो बड़े भाई का आदर न करे, जो स्वामी अर्थात् जिससे आजीविका पाता है उसका उपकार न माने—जो माता-पिता अपने बच्चों का उपकार भूल जावें अर्थात् उनका आदर न करें, ऐसा नर घोर नरक में जायगा! ऐसा वचन सुनकर लज्जित, भयभीत होकर बोले, हे हमारे भाई, अब कोई ऐसा उपाय हम लोगों द्वारा होना तो बड़ा ही कठिन जान पड़ता है! तब उस पुरुष ने सब को समझाकर कहा परस्पर प्रीति का, सत्यताका मार्ग धारण करना चाहिए जिससे सबका उपकार हो सके। ऐसा धर्म धारण करो! तब सबलोग उठ कर, विचार करके सब जन घर को आये। आपस में परस्पर मिलकर ऐसा निश्चय कर अपने घर-गृहस्थ का काम करने लगे। जो माता-पिता थे, सो बच्चों की भलाई का विचार करने लगे। जो बच्चे थे सो माता-पिता, बड़े भाई आदिकों की आज्ञा मानने लगे। माता-पिता की सेवा-पूजा करें! सब का मन आनन्द में मग्न हो गया। जिस घर में सब पुत्र आज्ञाकारी हों उस घर में सर्व सम्पदा वास करती है। अतः हे शिष्य, ऐसा विचार कर सेवा-भक्ति का आदर करो! सो भी निश्छलभाव, निष्कपट होकर। सो अपने धर्म का आचरण करनेवाला हो। गुरु से कपट भाव न रखे। जो गुरु से कपट भाव रखेगा सो नरक में जायगा। शिष्य का धर्म है कि सत्यवादी, सेवापरायण, गुरु के चरणों में लीन रहे। इसलिए जो शिष्य गुरु का आदर न करे, कपट भाव रखे... तो वह गुरुद्रोही कहलावेगा। जो गुरुद्रोही होगा वह नरक में जायगा। शिष्य को चाहिए कि गुरु आज्ञाकारी हो। गुरु सेवा से कल्याण होगा। गुरु की सेवा करे, गुरु की आज्ञा में सदा रहे। यदि ऐसा न करेगा तो नरकगामी होगा। माता-पिता की सेवा न करेगा, तो वह अवश्य नरक जायगा, चौरासी-लाख में भटकेगा। इस बात का विचार करो! शिष्य ने यह वचन सुनकर हाथ जोड़े, और कहा—हे महाराज! जो आपने माता-पिता का उपकार कहा सो सच-सच है। उन जैसा उपकारी कोई संसार में नहीं। माता का उपकार बड़ा, पिता का आदर बड़ा, इन दोनों का आदर-सम्मान करना सब का मुख्य धर्म है। जो माता-पिता का आदर नहीं करता वह नरक का भागी होता है। अब कहिये—संसार में बड़ा कौन है? बड़ा भाई या छोटा भाई? इस बात का विचार करके आप मुझे समझाइये। तब गुरु ने कहा—बड़ा भाई पिता के समान है, सो उसका आदर करना, उस का सत्कार करना, उस का हुक्म मानना, उस की आज्ञा में रहना, गुरु के समान उस का आदर करना, उस की सेवा करना सब जीवों का धर्म है। बड़ा भाई, जो अपनी पत्नी का आदर न करे, उस का आदर न करे, उस के साथ प्रीति न रखे, उसको भी नरक में जाना पड़ता है। इस प्रकार भाई-भाई आपस में प्रेम रखें। जो भाई अपने भाई से कपट भाव रखेगा, उस को नरक में जाना पड़ेगा, बड़ा भाई पिता समान है, उस का अनादर करने से भारी पाप होता है। छोटा भाई पुत्र के समान है। जो माता-पिता अपने बालकों को मारते हैं या उनको दुःख देते हैं अथवा अपने धर्म से पतित होते हैं, सो भी नरक के भागी होते हैं, इस बात का विचार करना चाहिए? शिष्य बोला—हे महाराज! यह सब बात सत्य है। इस संसार में कोई किसी का नहीं सहायता करता। सब अपने-अपने स्वार्थ के सम्बन्धी हैं, कोई किसी का उपकार नहीं मानता। कोई किसी का आदर नहीं करता। कोई किसी के धर्म को नहीं मानता। तब गुरु ने कहा—संसार असार है, माया-मोह में फंसा हुआ है! अतः इस संसार का मोह छोड़कर उस जगदीश्वर का भजन करो जिससे मोक्ष प्राप्त हो। इस संसार में आकर जो मनुष्य हरिभजन नहीं करता, उस का जन्म व्यर्थ है। इस शरीर का कोई भरोसा नहीं। यह शरीर पानी के बुलबुले के समान नष्ट होनेवाला है। अंत में केवल हरि का नाम ही काम आता है, सो हरि का भजन करो और गुरु की सेवा में रत रहो। गुरु की शरण में जाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सद्गति प्राप्त होती है। जो मनुष्य गुरु की आज्ञा का पालन करता है वह भवसागर से पार हो जाता है। इसलिए गुरु की सेवा करो, हरिभजन करो जिससे तुम्हारा उद्धार हो। 44