माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्यास का विचार छोड़कर वह उठ कर खड़ा होकर भगवान् शंकर का स्मरण करता हुआ वहीं बैठ विचारने का करने लगा, कि यह तो सो विचारणीय कि हमारे आचार्य इस वन बीच घर का विचार या किसी आश्रम किंवा गो--शाला आदि को तो पहचान अवश्य ही कर सकते बिना इस पहिचान के वह इस आश्रम में उपस्थित हो सकते नहीं इस लिये मुझ को जिस बात विचारणीय या उपहासिक का डर पड़ा था, आचार्य जन का विचार इसके विपरीत ही था सो मैं व्यर्थ ही डर रहा था, इस लिये भगवान् शंकर सदा ही कल्याण को देने, विघ्न--बाधा निवारक सो उन्होंने ही आज रक्षा करके मुझ अज्ञानी अज्ञानता रूप से बचाकर यह जो कि आचार्य महाराज मुझ पर दया या कृपा रूप से उपदेश दे आधि-व्याधि रूप संकट निवारण से सत्य पथ ज्ञान मार्ग दिखलाया जिस पर चल कर कल्याण लाभ प्राप्त करूं, यह तो मुझे बड़ा उपकार ही हो गया। ऐसी ही विचार में वह लगा, थोड़ी ही आवृति में भोजन आदि से तृप्त तथा वन के मार्ग द्वारा कष्ट पाकर थका हुआ शिष्य निद्रा वश को प्राप्त हो गया। उधर राजा, जो कि वह वन में गायें चरा रहा था प्रातः ही उठ कर प्रातः कर्म से निवृत्त हो गाय के मुखों रूप से जो फेन गिर रहा था तथा काष्ठ तृणों द्वारा जो, पसीने से, श्रम से उत्पन्न हो रहा पसीना उस को हाथ लगा कर साफ करता हुआ अहो? हमारे जन के तन का कष्ट इन गायों के खाने के पश्चात मन शांत होने लगा है? इतने जन के तन का--दुःख इस प्रकार जन का शांत होगा क्या? यह सब मेरा भ्रम है! सो तो भ्रम ही कहा जावेगा? हे भगवान्, जिसे पिता ने, या माता ने तथा किसी जन ने, या सब प्रजा जनों ने इस प्रकार वन रूपी वनवास देकर यहां भेज दिया तथा यहां भी कष्ट ही हो, ऐसा कष्ट अब और किसी को भोगना पड़ा न, पिता के तन पर तो सुख मात्र का राज्य ही प्राप्त था। पिता के तन द्वारा जो, माता के तन विलासिता का राज्य तो सब राज परिकर ऐश्वर्य भोग रहा है? विधाता ने ऐसी कैसी यह कर्म-रेखा विधाता ने इस विधि बना दी या माता, या पिता, या माता, जो कि आज स्वरूप गो--सेवा के रूप में तन को कष्ट हो प्राप्त हो विधाता यह तो बता, अब तो दया कर जन पर यह दुख रूपी का कष्ट दूर कर अब हमारे कष्ट निवारण कर, भगवान् के आगे रोता, भगवान् के आगे नम्र, यह सब विधि क्या है? मेरा किस बात का दोष है, पिता द्वारा किसका दोष है? मुझे पिता ने त्याग दिया, या प्रजा त्याग दिया इस बात का ज्ञान करा, या विधाता कृपा करके मुझ पर दया कर दयामय हो? ऐसी ही जन सोच रहा तथा उधर शिष्य जहां पर था वहां से उठा, प्रातः काल हो कर वह संध्या वन्दनादि कर्म से निवृत्त होकर, जल का पान करके तथा गाय के पावन हो कर दूध से तृप्त होकर, पश्चात्, आगे चलता, चला गया, आगे जाकर, गाय को चरते देखकर, वह बोला? हे भगवन् यह तो संसार में सब से अलग ही गाय चारण करने का नियम हो रहा है, जहां न जन वास या ग्राम का वास हो, या भगवान् शिव का वास हो, तथा इसके ऊपर एक जन, जो कि एक मात्र अकेला ही, सब दिन इस प्रकार यहां रहता है, या कोई जन ऐसा भी हो कि जिस को विधि-विधाता ने त्याग दिया हो तथा या संसार से विरक्त हो कर इस वन बीच अपना जीवन व्यतीत कर रहा हो तथा इस बात का विचार यह भी किया जा रहा था कि इस प्रकार विचार किया जाय, तो जो गाय का विचार यह गाय सब प्रकार से तो उत्तम से ही उत्तम प्रकार का काम करती, इसके ऊपर जो एक बालक स्वरूप रूप से दिखाई रहा सो कोई जन का, इसके मुख को देख कर ही यह ज्ञान होता कि मुख की कांति तो सूर्य रूप में प्रकाशित तथा मुख की कांति तो पूर्ण चन्द्र के समान, विशाल रूप नेत्र तथा नैनों से प्रकाशित तेज तथा रूप ऐसा प्रतीत होता कि साक्षात रूपी कामदेव प्रकट होकर प्रकट होकर सब काम को परास्त कर इस बालक के रूप में समा गया है। क्या भगवान् की ऐसी लीला है? हे प्रभु परमात्मा, आपकी जो सब कृपा रूप बन कर 8