भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

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इस बात सम्बन्धी प्रमाण सब वेद और पुराणोंमें मिलते हैं, विशेष कर राम चरित मानस को देखना जी, जिसमें लिखाएव प्रमाण दिया गया है। प्रमाण यहहै त्रिलोकीनाथ भगवान् को राम रूप बनाया जी, सब कोई उन चरणों का आराधकहै, ब्रह्मा, विश्वामित्रजी जी, कश्यपऋषिजी इन सबने जन्म लिया राम को देखने केलिए, कश्यप, वशिष्ठ कहलाए और उनके कुलगुरु जी, इस प्रकार प्रमाण सब वेद शास्त्र कहैं। पर देखने की बात यह विचारने की यहहै रामके समान शक्ति तो किसी को प्राप्त नहीं होसक्ती जी, राम-अवतार प्रभु जी, सो दशरथ के महलों प्रकाश पाया सब सुख सम्पदा पाई कंचन महल कंचन छत्र कंचन रथ, सब सुख भोगने लायक सुख पाए राम को अभाव था, जो राम-रूप होकर सुख भोगते भोगना था संसार का सुख। तो जो सुख भोगने लायक सुख सामग्री थी राम रूप बन कर पाए प्रभु सो त्यागकर जंगल गमन क्यों? जो विचार करे मन, सोचेगा अवश्य, त्याग से आनन्द प्राप्त हो गया, पर सोचे! राम-रूप धरकर भी! जिसने जंगल जंगल भ्रमण किया दशरथ नन्दन सो भी सुख विलास छोड़ कर जंगल का दुःख कष्ट उठाने केलिए? काहे दुख का कष्ट सो स्वयं लिया? किस सुख प्राप्ति वास्ते दशरथ को त्यागा वा कौशल्या? जनक नन्दिनी? जो स्वयं आनन्द रूप सो दुःख कष्ट का भोक्ता, जिसका जो नाम लेता सो, भव बन्धनों पार कर जाता सो खुद जंगल मेंकष्ट पाए, इसका कारण यह, विवश होकर सुख ऐश्वर्य का त्याग कर जंगल का कष्ट ले कर दिखाया कि सुख ऐश्वर्य भोगने में नहीं जी, सुख त्याग में त्यागने से आनन्द है। किस बात का त्याग संसार का! विषय वासना त्यागने का! राम-रूप होकर यह दिखाया त्याग कर! जो पर सत्य त्यागने का काम किया! कि सब सुख विलास सम्बन्धी पर त्याग कर दिया राम नेमों, अपने मत पर अटल रहा सुख सम्पदा का त्याग करके जंगल जंगल वास कर सत्यकी मर्यादाको पूरा किया। सब पर प्रेम किया राम नेमों का पालन करते मर्यादाको पूरा करने पर त्याग दिया सब ऐश्वर्य सुख सम्बन्धी को त्याग कर कष्ट सहन किया! हे जीव! विचार करके देख त्याग से आनन्द प्राप्त होता वा सांसारिकता भोग पर जो आसक्त रहा सुख भोग उस आत्माको दुख भोगना पड़ा संसार त्यागने से, सब कष्ट दूर हुए सुख मिला। पर कशमीर-गद्दी त्याग त्यागी बना, तो सब का सब प्राप्त हो संसारिक सुख क्या था! जिसके त्याग कर मन-अन्त का सुख प्राप्त होगया, त्याग ही सब सुख का मूलहै, त्याग ही सब का सार, त्याग ही सब का शिरोमणि! पर त्याग किस बात का करना त्याग विषय भोग-राग द्वेष छल कपटका जो मन वासना का घर बना है। इस मन को साफ़ बनाना जो सब पर त्याग से होगा पर सत्य धर्म निष्ठा से मन निर्मल हो सत्य कर्म का धारण कर संसार को त्यागना ही त्याग का फल सत्य स्वरूप होगा त्याग किए पश्चात् मन का जो रूप बन जाता सो सब निष्काम कर्म का रूप होता पर विचार करना त्यागने से मन का रूप सब विकार त्याग कर प्रभुके चरणकमल रूप ध्यान का ही धारण स्वरूप धारण कर मन केवल आनन्द स्वरूप रूप बन स्वरूप भी सत्-चित्-आनन्द हो जाता जब विकार रहित त्याग रूप बना तो वासना का सम्बन्ध भी सब छूट गया सो सत्-चित्-आनन्द स्वरूप ही हो कर रहा फिर विचार रूप क्या रहा पर केवल त्याग स्वरूप ही बन कर सो संसार के कल्याण निमित्त ही सब कर्म स्वरूप बन जाता है। इस प्रकार से जो जो त्याग के रूप को प्राप्त हो गया उसका रूप संसार के पर उपकार हेतु निमित्त ही रहता है। ऐसा त्याग केवल रूप बन गया जो! संसार का त्याग क्या होता? त्याग रूप का स्वरूप क्या? त्याग केवल सो त्याग का निमित्त ही होता? सुनो सन्तो, सब त्याग निष्काम रूप! त्याग केवल मन, स्वरूप रूप बन! सब विषय वास त्यागना रूप! त्याग मन रूप सब त्याग त्याग कर सब त्याग स्वरूप ही बन गया रूप! पर त्याग का स्वरूप जो निष्काम स्वरूप, जो रूप बन गया उस रूप से जो जो कर्म, सो सब त्याग रूप ही त्याग रूप जो जो त्याग निष्काम कर्म सो निष्काम ही पर उपकार स्वरूप हो जाता सो त्याग रूप का त्याग फल सब का सार सो ही निष्कामता का स्वरूप त्याग रूप धारण करना है, निष्काम त्याग के त्याग रूप को निष्काम ही कहा है, त्याग निष्काम कर्म किस का त्याग? सब वासना का सार है? त्यागी केवल निष्काम स्वरूप रूप बन, निष्काम त्याग के त्याग रूप त्याग को सब त्याग संसार त्याग निष्काम ही स्वरूप बन जाता जिस त्याग से सब जग का भला रूप 7

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