पद्म पुराण

पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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[ १० ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| पाताल-खण्ड | |
| ९८-शेषजीका वात्स्यायन मुनिसे रामाश्वमेधकी कथा आरम्भ करना, श्रीरामचन्द्रजीका लङ्कासे अयोध्याके लिये विदा होना ......... | ४१० |
| ९९-भरतसे मिलकर भगवान् श्रीरामका अयोध्याके निकट आगमन ......... | ४१२ |
| १००-श्रीरामका नगर-प्रवेश, माताओंसे मिलना, राज्य ग्रहण करना तथा रामराज्यकी सुव्यवस्था | ४१४ |
| १०१-देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका उन्हें वरदान देना तथा रामराज्यका वर्णन | ४१७ |
| १०२-श्रीरामके दरबारमें अगस्त्यजीका आगमन, उनके द्वारा रावण आदिके जन्म तथा तपस्याका वर्णन और देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान्का अवतार लेना ......... | ४२० |
| १०३-अगस्त्यका अश्वमेध यज्ञकी सलाह देकर अश्वकी परीक्षा करना तथा यज्ञके लिये आये हुए ऋषियोंद्वारा धर्मकी चर्चा ......... | ४२४ |
| १०४-यज्ञसम्बन्धी अश्वका छोड़ा जाना और श्रीरामका उसकी रक्षाके लिये शत्रुघ्नको उपदेश करना | ४२७ |
| १०५-शत्रुघ्न और पुष्कल आदिका सबसे मिलकर सेनासहित घोड़ेके साथ जाना, राजा सुमंदकी कथा तथा सुमंदके द्वारा शत्रुघ्नका सत्कार .. | ४३० |
| १०६-शत्रुघ्नका राजा सुमंदको साथ लेकर आगे जाना और च्यवनमुनिके आश्रमपर पहुँचकर सुमतिके मुखसे उनकी कथा सुनना—च्यवनका सुकन्यासे ब्याह ......... | ४३७ |
| १०७-सुकन्याके द्वारा पतिकी सेवा, च्यवनको यौवन-प्राप्ति, उनके द्वारा अश्विनीकुमारोंको यज्ञभाग-अर्पण तथा च्यवनका अयोध्या-गमन | ४४० |
| १०८-सुमतिका शत्रुघ्नसे नीलाचलनिवासी भगवान् पुरुषोत्तमकी महिमाका वर्णन करते हुए एक इतिहास सुनाना ......... | ४४४ |
| १०९-तीर्थयात्राकी विधि, राजा रत्नग्रीवकी यात्रा तथा गण्डकी नदी एवं शालग्रामशिलाकी महिमाके प्रसंगमें एक पुष्कसकी कथा ......... | ४४९ |
| ११०-राजा रत्नग्रीवका नीलपर्वतपर भगवान्का दर्शन करके रानी आदिके साथ वैकुण्ठको जाना तथा शत्रुघ्नका नीलपर्वतपर पहुँचना | ४५५ |
| १११-चक्राङ्गा नगरीके राजकुमार दमनद्वारा घोड़ेका पकड़ा जाना तथा राजकुमारका प्रतापाग्र्यको युद्धमें परास्त करके स्वयं पुष्कलके द्वारा पराजित होना ......... | ४६० |
| ११२-राजा सुबाहुका भाई और पुत्रोंसहित युद्धमें आना तथा सेनाका क्रौञ्च-व्यूहनिर्माण ..... | ४६३ |
| ११३-राजा सुबाहुकी प्रशंसा तथा लक्ष्मीनिधि और सुकेतुका द्वन्द्व-युद्ध ......... | ४६४ |
| ११४-पुष्कलके द्वारा चित्राङ्गका वध, हनुमान्जीके चरण-प्रहारसे सुबाहुका शापोद्धार तथा उनका आत्मसमर्पण ......... | ४६६ |
| ११५-तेजःपुरके राजा सत्यवान्की जन्मकथा—सत्यवान्का शत्रुघ्नको सर्वस्व-समर्पण | ४७० |
| ११६-शत्रुघ्नके द्वारा विद्युन्माली और उग्रदंष्ट्रका वध तथा उसके द्वारा चुराये हुए अश्वकी प्राप्ति | ४७५ |
| ११७-शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना, मुनिकी आत्म-कथामें रामायणका वर्णन और अयोध्यामें जाकर उनका श्रीरघुनाथजीके स्वरूपमें मिल जाना | ४७८ |
| ११८-देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण, दोनों ओरकी सेनाओंमें युद्ध और पुष्कलके बाणसे राजा वीरमणिका मूर्छित होना | ४८८ |
| ११९-हनुमान्जीके द्वारा वीरसिंहकी पराजय, वीरभद्रके हाथसे पुष्कलका वध, शङ्करजीके द्वारा शत्रुघ्नका मूर्छित होना, हनुमान्के पराक्रमसे शिवका सन्तोष, हनुमान्जीके उद्योगसे मरे हुए वीरोंका जीवित होना, श्रीरामका प्रादुर्भाव और वीरमणिका आत्मसमर्पण ......... | ४९३ |
| १२०-अश्वका गात्र-स्तम्भ, श्रीरामचरित्र-कीर्तनसे एक स्वर्गवासी ब्राह्मणका राक्षस्योनिसे उद्धार तथा अश्वके गात्र-स्तम्भकी निवृत्ति | ४९८ |
| १२१-राजा सुरथके द्वारा अश्वका पकड़ा जाना, राजाकी भक्ति और उनके प्रभावका वर्णन, अङ्गदका दूत बनकर राजाके यहाँ जाना और राजाका युद्धके लिये तैयार होना ........ | ५०२ |
| १२२-युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्कलका बाँधा जाना, हनुमान्जीका चम्पकको मूर्छित करके पुष्कलको छुड़ाना, सुरथका हनुमान् और शत्रुघ्न आदिको जीतकर अपने नगरमें ले जाना तथा श्रीरामके आनेसे सबका छुटकारा होना | ५०६ |