पद्म पुराण

पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ६६-सुकलाके स्वामीका तीर्थयात्रासे लौटना और धर्मकी आज्ञासे सुकलाके साथ श्राद्धादि करके देवताओंसे वरदान प्राप्त करना .... | २७९ | स्वर्ग-खण्ड | |
| ६७-पितृतीर्थके प्रसङ्गमें पिप्पलकी तपस्या और सुकर्माकी पितृभक्तिका वर्णन, सारसके कहनेसे पिप्पलका सुकर्माके पास जाना और सुकर्माका उन्हें माता-पिताकी सेवाका महत्त्व बताना | २८१ | ७७-आदि सृष्टिके क्रमका वर्णन ............ | ३३२ |
| ६८-सुकर्मद्वारा ययाति और मातलिके संवादका उल्लेख—मातलिके द्वारा देहकी उत्पत्ति, उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण और जीवनके कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन | २८६ | ७८-भारतवर्षका वर्णन और वसिष्ठजीके द्वारा पुष्कर तीर्थकी महिमाका बखान | ३३३ |
| ६९-पापों और पुण्योंके फलोंका वर्णन | २९४ | ७९-जम्बूमार्ग आदि तीर्थ, नर्मदा नदी, अमरकण्टक पर्वत तथा कावेरी-सङ्गमकी महिमा | ३३६ |
| ७०-मातलिके द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन, मातलिको विदा करके राजा ययातिका वैष्णवधर्मके प्रचारद्वारा भूलोकको वैकुण्ठतुल्य बनाना तथा ययातिके दरबारमें काम आदिका नाटक खेलना | २९८ | ८०-नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन | ३३८ |
| ७१-ययातिके शरीरमें जरावस्थाका प्रवेश, कामकन्यासे भेंट, पूरुका यौवन-दान, ययातिका कामकन्याके साथ प्रजावर्गसहित वैकुण्ठधाम-गमन | ३०२ | ८१-विविध तीर्थोंकी महिमाका वर्णन | ३४४ |
| ७२-गुरुतीर्थके प्रसङ्गमें महर्षि च्यवनकी कथा—कुञ्जल पक्षीका अपने पुत्र उज्ज्वलको ज्ञान, व्रत और स्तोत्रका उपदेश ............ | ३१० | ८२-धर्मतीर्थ आदिकी महिमा, यमुना-स्नानका माहात्म्य—हेमकुण्डल वैश्य और उसके पुत्रोंकी कथा एवं स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन | ३४९ |
| ७३-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्ज्वलको उपदेश—महर्षि जैमिनिका सुबाहुसे दानकी महिमा कहना तथा नरक और स्वर्गमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन | ३१५ | ८३-सुगन्ध आदि तीर्थोंकी महिमा तथा काशीपुरीका माहात्म्य ............ | ३५८ |
| ७४-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्ज्वलको श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्र सुनाना ............ | ३१८ | ८४-पिशाचमोचनकुण्ड एवं कपर्दीश्वरका माहात्म्य—पिशाच तथा शङ्कुकर्ण मुनिके मुक्त होनेकी कथा और गया आदि तीर्थोंकी महिमा | ३६१ |
| ७५-कुञ्जल पक्षी और उसके पुत्र कपिञ्जलका संवाद—कामोदाकी कथा और विहुण्ड दैत्यका वध ............ | ३२२ | ८५-ब्रह्मस्तूणा आदि तीर्थों तथा प्रयागकी महिमा; इस प्रसङ्गके पाठका माहात्म्य ............ | ३६६ |
| ७६-कुञ्जलका च्यवनको अपने पूर्व-जीवनका वृत्तान्त बताकर सिद्ध पुरुषके कहे हुए ज्ञानका उपदेश करना, राजा वेनका यज्ञ आदि करके विष्णुधाममें जाना तथा पद्मपुराण और भूमिखण्डका माहात्म्य ............ | ३२७ | ८६-मार्कण्डेयजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको प्रयागकी महिमा सुनाना ............ | ३६८ |
| ८७-भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा | ३७५ | ||
| ८८-ब्रह्मचारीके पालन करनेयोग्य नियम | ३७८ | ||
| ८९-ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म ............ | ३८३ | ||
| ९०-स्नातक और गृहस्थके धर्मोंका वर्णन | ३८७ | ||
| ९१-व्यावहारिक शिष्टाचारका वर्णन | ३९० | ||
| ९२-गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दानधर्मका वर्णन ............ | ३९३ | ||
| ९३-वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन ........ | ३९७ | ||
| ९४-संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन ........ | ३९९ | ||
| ९५-संन्यासीके नियम ............ | ४०० | ||
| ९६-भगवद्भक्तिकी प्रशंसा, स्त्री-सङ्गकी निन्दा, भजनकी महिमा, ब्राह्मण, पुराण और गङ्गाकी महत्ता, जन्म आदिके दुःख तथा हरिभजनकी आवश्यकता ............ | ४०३ | ||
| ९७-श्रीहरिके पुराणमय स्वरूपका वर्णन तथा पद्मपुराण और स्वर्ग-खण्डका माहात्म्य .... | ४०८ |