पद्म पुराण

पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ३४-गणेश और कार्तिकेयका जन्म तथा कार्तिकेय-द्वारा तारकासुरका वध | १४६ | ५१-सोमशर्माकी पितृभक्ति | २२१ |
| ३५-उत्तम ब्राह्मण और गायत्री-मन्त्रकी महिमा | १५० | ५२-सुव्रतकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें सुमना और शिवशर्माका संवाद—विविध प्रकारके पुत्रोंका वर्णन तथा दुर्वासाद्वारा धर्मको शाप | २२४ |
| ३६-अधम ब्राह्मणोंका वर्णन, पतित विप्रकी कथा और गरुड़कीका चरित्र | १५५ | ५३-सुमनाके द्वारा ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्ग धर्म तथा धर्मात्मा और पापियोंकी मृत्युका वर्णन | २२८ |
| ३७-ब्राह्मणोंके जीविकोपयोगी कर्म और उनका महत्त्व तथा गौओंकी महिमा और गोदानका फल | १६० | ५४-वसिष्ठजीके द्वारा सोमशर्माके पूर्वजन्म सम्बन्धी शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तथा उन्हें भगवान्के भजनका उपदेश | २३१ |
| ३८-द्विजोचित आचार, तर्पण तथा शिष्टाचारका वर्णन | १६६ | ५५-सोमशर्माके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी आराधना, भगवान्का उन्हें दर्शन देना तथा सोमशर्माका उनकी स्तुति करना | २३३ |
| ३९-पितृभक्ति, पातिव्रत्य, समता, अद्रोह और विष्णुभक्तिरूप पाँच महायज्ञोंके विषयमें ब्राह्मण नरोत्तमकी कथा | १७० | ५६-श्रीभगवान्के वरदानसे सोमशर्माको सुव्रत नामक पुत्रकी प्राप्ति तथा सुव्रतका तपस्यासे माता-पितासहित वैकुण्ठलोकमें जाना | २३६ |
| ४०-पतिव्रता ब्राह्मणीका उपाख्यान, कुलटा स्त्रियोंके सम्बन्धमें उमा-नारद-संवाद, पतिव्रताकी महिमा और कन्यादानका फल | १८२ | ५७-राजा पृथुके जन्म और चरित्रका वर्णन | २४० |
| ४१-तुलाधारके सत्य और समताकी प्रशंसा, सत्य-भाषणकी महिमा, लोभ-त्यागके विषयमें एक शूद्रकी कथा और मूक चाण्डाल आदिका परमधाम-गमन | १८९ | ५८-मृत्युकन्या सुनीथाको गन्धर्वकुमारका शाप, अङ्गकी तपस्या और भगवान्से वर-प्राप्ति | २४४ |
| ४२-पोखरे खुदाने, वृक्ष लगाने, पीपलकी पूजा करने, पौसले (प्याऊ) चलाने, गोचरभूमि छोड़ने, देवालय बनवाने और देवताओंकी पूजा करनेका माहात्म्य | १९३ | ५९-सुनीथाका तपस्याके लिये वनमें जाना, रम्भा आदि सखियोंका वहाँ पहुँचकर उसे मोहिनी विद्या सिखाना, अङ्गके साथ उसका गान्धर्व-विवाह, वेनका जन्म और उसे राज्यकी प्राप्ति | २४८ |
| ४३-रुद्राक्षकी उत्पत्ति और महिमा तथा आँवलेके फलकी महिमामें प्रेतोंकी कथा और तुलसी-दलका माहात्म्य | १९६ | ६०-छद्मवेषधारी पुरुषके द्वारा जैन-धर्मका वर्णन, उसके बहकावेमें आकर वेनकी पापमें प्रवृत्ति और सप्तर्षियोंद्वारा उसकी भुजाओंका मन्थन | २५२ |
| ४४-तुलसी-स्तोत्रका वर्णन | २०२ | ६१-वेनकी तपस्या और भगवान् श्रीविष्णुके द्वारा उसे दान-तीर्थ आदिका उपदेश | २५४ |
| ४५-श्रीगङ्गाजीकी महिमा और उनकी उत्पत्ति | २०३ | ६२-श्रीविष्णुद्वारा नैमित्तिक और आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन और पलीतीर्थके प्रसङ्गमें सती सुकलाकी कथा | २५७ |
| ४६-गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल | २०७ | ६३-सुकलाका रानी सुदेवाकी महिमा बताते हुए एक शूकर और शूकरीका उपाख्यान सुनाना, शूकरीद्वारा अपने पतिके पूर्वजन्मका वर्णन | २६१ |
| ४७-सञ्जय-व्यास-संवाद—मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हुए दैत्य और देवताओंके लक्षण | २०९ | ६४-शूकरीद्वारा अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन तथा रानी सुदेवाके दिये हुए पुण्यसे उसका उद्धार | २६७ |
| ४८-भगवान् सूर्यका तथा संक्रान्तिमें दानका माहात्म्य | २११ | ६५-सुकलाका सतीत्व नष्ट करनेके लिये इन्द्र और काम आदिकी कुचेष्टा तथा उनका असफल होकर लौट आना | २७३ |
| ४९-भगवान् सूर्यकी उपासना और उसका फल—भद्रेश्वरकी कथा | २१३ | ||
| भूमि-खण्ड | |||
| ५०-शिवशर्माके चार पुत्रोंका पितृ-भक्तिके प्रभावसे श्रीविष्णुधामको प्राप्त होना | २१७ |