भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सृष्टिखण्ड ] ** महर्षि अगस्त्यद्वारा राजा श्वेतके उद्धारकी कथा ** ११७


आभूषण विश्वकर्माका बनाया हुआ है। यह दिव्य आभरण है और अपने दिव्य रूप एवं तेजसे जगमगा रहा है। राजेन्द्र ! आप इसे स्वीकार करके मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि प्राप्त हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी गयी है।

श्रीरामने कहा—ब्रह्मन् ! आपका दिया हुआ दान लेना मेरे लिये निन्दाकी बात होगी। क्षत्रिय जान-बूझकर ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है, यह बात आप मुझे बताइये। किसी आपत्तिके कारण मुझे कष्ट हो—ऐसी बात भी नहीं है; फिर दान कैसे लूँ। इसे लेकर मुझे केवल दोषका भागी होना पड़ेगा, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।

अगस्त्यजी बोले—श्रीराम ! प्राचीन सत्ययुगमें जब अधिकांश मनुष्य ब्राह्मण ही थे, तथा समस्त प्रजा राजासे हीन थी, एक दिन सारी प्रजा पुराणपुरुष ब्रह्माजीके पास राजा प्राप्त करनेकी इच्छासे गयी और कहने लगी—'लोकेश्वर ! जैसे देवताओंके राजा देवाधिदेव इन्द्र हैं, उसी प्रकार हमारे कल्याणके लिये भी इस समय एक ऐसा राजा नियत कीजिये, जिसे पूजा और भेंट देकर सब लोग पृथ्वीका उपभोग कर सकें।' तब देवताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने इन्द्रसहित समस्त लोकपालोंको बुलाकर कहा—'तुम सब लोग अपने-अपने तेजका अंश यहाँ एकत्रित करो।' तब सम्पूर्ण लोकपालोंने मिलकर चार भाग दिये। वह भाग अक्षय था। उससे अक्षय राजाकी उत्पत्ति हुई। लोकपालोंके उस अंशको ब्रह्माजीने मनुष्योंके लिये एकत्रित किया। उसीसे राजाका प्रादुर्भाव हुआ, जो प्रजाओंके हित-साधनमें कुशल होता है। इन्द्रके भागसे राजा सबपर हुकूमत चलाता है। वरुणके अंशसे समस्त देहधारियोंका पोषण करता है। कुबेरके अंशसे वह याचकोंको धन देता है तथा राजामें जो यमराजका अंश है, उसके द्वारा वह प्रजाको दण्ड देता है। रघुश्रेष्ठ ! उसी इन्द्रके भागसे आप भी मनुष्योंके राजा हुए हैं, इसलिये प्रभो ! मेरा उद्धार करनेके लिये यह आभूषण ग्रहण कीजिये।

पुलस्त्यजी कहते हैं—राजन्! तब श्रीरघुनाथजीने महात्मा अगस्त्यके हाथसे वह दिव्य आभूषण ले लिया, जो बहुत ही विचित्र था और सूर्यकी तरह चमक रहा था। उसे लेकर वे निहारते रहे। फिर बारम्बार विचार करने लगे—'ऐसे रत्न तो मैंने विभीषणकी लङ्कामें भी नहीं देखे।' इस प्रकार मन-ही-मन सोच-विचार करनेके बाद श्रीरामचन्द्रजीने महर्षि अगस्त्यसे उस दिव्य आभूषणकी प्राप्तिका वृत्तान्त पूछना आरम्भ किया।

श्रीराम बोले—ब्रह्मन् ! यह रत्न तो बड़ा अद्भुत है। राजाओंके लिये भी यह अलभ्य ही है। आपको यह कहाँसे और कैसे मिल गया ? तथा किसने इस आभूषणको बनाया है?

अगस्त्यजीने कहा—रघुनन्दन ! पहले त्रेतायुगमें एक बहुत विशाल वन था। इसका व्यास सौ योजनका था। किन्तु उसमें न कोई पशु रहता था, न पक्षी। उस वनके मध्यभागमें चार कोस लम्बी एक झील थी, जो हंस और कारण्डव आदि पक्षियोंसे संकुल थी। वहाँ मैंने एक बड़े आश्चर्यकी बात देखी। सरोवरके पास ही एक बहुत बड़ा आश्रम था, जो बहुत पुराना होनेपर भी अत्यन्त पवित्र दिखायी देता था, किन्तु उसमें कोई तपस्वी नहीं था और न कोई और जीव भी थे। मैंने उस आश्रममें रहकर ग्रीष्मकालकी एक रात्रि व्यतीत की। सबेरे उठकर जब तालाबकी ओर चला तो रास्तेमें मुझे एक बहुत बड़ा मुर्दा दीख पड़ा, जिसका शरीर अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट था। मालूम होता था किसी तरुण पुरुषकी लाश है। उसे देखकर मैं सोचने लगा—'यह कौन है? इसकी मृत्यु कैसे हो गयी तथा यह इस महान् वनमें आया कैसे था ? इन सारी बातोंका मुझे अवश्य पता लगाना चाहिये।' मैं खड़ा-खड़ा यही सोच रहा था कि इतनेमें आकाशसे एक दिव्य एवं अद्भुत विमान उतरता दिखायी दिया। वह परम सुन्दर और मनके समान वेगशाली था। एक ही क्षणमें वह विमान सरोवरके निकट आ पहुँचा। मैंने देखा, उस विमानसे एक दिव्य मनुष्य उतरा और सरोवरमें नहाकर उस मुर्देका मांस खाने