पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
लगा। भरपेट उस मोटे-ताजे मुर्देका मांस खाकर वह फिर सरोवरमें उतरा और उसकी शोभा निहारकर फिर शीघ्र ही स्वर्गकी ओर जाने लगा। उस शोभा-सम्पन्न देवोपम पुरुषको ऊपर जाते देख मैंने कहा—'स्वर्गलोकके निवासी महाभाग ! [तनिक ठहरो]। मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ—तुम्हारी यह कैसी अवस्था है? तुम कौन हो? देखनेमें तो तुम देवताके समान जान पड़ते हो; किन्तु तुम्हारा भोजन बहुत ही घृणित है। सौम्य ! ऐसा भोजन क्यों करते हो और कहाँ रहते हो?'
रघुनन्दन ! मेरी बात सुनकर उस स्वर्गवासी पुरुषने हाथ जोड़कर कहा—'विप्रवर ! मेरा जैसा वृत्तान्त है, उसे आप सुनिये। पूर्वकालकी बात है, विदर्भदेशमें मेरे महायशस्वी पिता राज्य करते थे। वे वसुदेवके नामसे त्रिलोकीमें विख्यात और परम धार्मिक थे। उनके दो स्त्रियाँ थीं। उन दोनोंसे एक-एक करके दो पुत्र हुए। मैं उनका ज्येष्ठ पुत्र था। लोग मुझे श्वेत कहते थे। मेरे छोटे भाईका नाम सुरथ था। पिताकी मृत्युके बाद पुरवासियोंने विदर्भदेशके राज्यपर मेरा अभिषेक कर दिया। तब मैं वहाँ पूर्ण सावधानीके साथ राज्य-सञ्चालनं करने लगा। इस प्रकार राज्य और प्रजाका पालन करते मुझे कई हजार वर्ष बीत गये। एक दिन किसी निमित्तको लेकर मुझे प्रबल वैराग्य हो गया और मैं मरणपर्यन्त तपस्याका निश्चय करके इस तपोवनमें चला आया। राज्यपर मैंने अपने भाई महारथी सुरथका अभिषेक कर दिया था। फिर इस सरोवरपर आकर मैंने अत्यन्त कठोर तपस्या आरम्भ की। अस्सी हजार वर्षोंतक इस वनमें मेरी तपस्या चालू रही। उसके प्रभावसे मुझे भुवनोंमें सर्वश्रेष्ठ कल्याणमय ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई। किन्तु वहाँ पहुँचनेपर मुझे भूख और प्यास अधिक सताने लगी। मेरी इन्द्रियाँ तलमला उठीं। मैंने त्रिलोकीके सर्वश्रेष्ठ देवता ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! यह लोक तो भूख और प्याससे रहित सुना गया है; यह मुझे किस कर्मका फल प्राप्त हुआ है कि भूख और प्यास यहाँ भी मेरा पिण्ड नहीं छोड़तीं? देव ! शीघ्र बताइये, मेरा आहार क्या है?' महामुने ! इसपर ब्रह्माजीने बहुत देरतक सोचनेके बाद कहा—'तात ! पृथ्वीपर कुछ दान किये बिना यहाँ कोई वस्तु खानेको नहीं मिलती। तुमने उस जन्ममें भिखमंगेको कभी भीखतक नहीं दी। [जब तुम राजभवनमें रहकर राज्य करते थे,] उस समय भूलसे या मोहवश तुम्हारे द्वारा किसी अतिथिको भोजन नहीं मिला है। इसलिये यहाँ रहते हुए भी तुम्हें भूख-प्यासका कष्ट भोगना पड़ता है। राजेन्द्र ! भाँति-भाँतिके आहारोंसे जिसको तुमने भलीभाँति पुष्ट किया था, वह तुम्हारा उत्तम शरीर पड़ा हुआ है; उसीका मांस खाओ, उसीसे तुम्हारी तृप्ति होगी।'
"ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मैंने पुनः उनसे निवेदन किया—'प्रभो! अपने शरीरका भक्षण कर लेनेपर भी फिर मेरे लिये दूसरा कोई आहार नहीं रह जाता है। जिससे इस शरीरकी भूख मिट सके तथा जो कभी चुकनेवाला न हो, ऐसा कोई भोजन मुझे देनेकी कृपा कीजिये।' तब ब्रह्माजीने कहा—'तुम्हारा शरीर ही अक्षय बना दिया गया है। उसे प्रतिदिन खाकर तुम तृप्तिका अनुभव करते रहोगे। इस प्रकार अपने ही शरीरका मांस खाते जब तुम्हें सौ वर्ष पूरे हो जायेंगे, उस समय तुम्हारे विशाल एवं दुर्गम तपोवनमें महर्षि अगस्त्य पधारेंगे। उनके आनेपर तुम संकटसे छूट जाओगे। राजर्षे ! वे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंका भी उद्धार करनेमें समर्थ हैं, फिर तुम्हारे इस घृणित आहारको छुड़ाना उनके लिये कौन बड़ी बात है।' भगवान् ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर मैं अपने शरीरके मांसका घृणित भोजन करने लगा। विप्रवर ! यह कभी नष्ट नहीं होता तथा इससे मेरी पूर्ण तृप्ति भी हो जाती है। न जाने कब वे मुनि इस वनमें आकर मुझे दर्शन देंगे, यही सोचते हुए मुझे सौ वर्ष पूरे हो गये हैं। ब्रह्मन् ! अब अगस्त्य मुनि ही मेरे सहायक होंगे, यह बिल्कुल निश्चित बात है।'"
राजा श्वेतका यह कथन सुनकर तथा उनके उस घृणित आहारपर दृष्टि डालकर मैंने कहा—'अच्छा, तो तुम्हारे सौभाग्यसे मैं आ गया, अब निःसन्देह तुम्हारा उद्धार करूँगा।' तब वे मुझे पहचानकर दण्डकी भाँति