भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 1018 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 307

२९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


हजार पल तथा रक्त सौ पल होता है और मूत्रका कोई नियत माप नहीं है।

राजन् ! आत्मा परम शुद्ध है और उसका यह देहरूपी घर, जो कर्मोंके बन्धनसे तैयार किया गया है, नितान्त अशुद्ध है। इस बातको सदा ही याद रखना चाहिये। वीर्य और रजका संयोग होनेपर ही किसी भी योनिमें देहकी उत्पत्ति होती है तथा यह हमेशा पेशाब और पाखानेसे भरा रहता है; इसलिये इसे अपवित्र माना गया है। जैसे घड़ा बाहरसे चिकना होनेपर भी यदि विष्ठासे भरा हो तो वह अपवित्र ही समझा जाता है, उसी प्रकार यह देह ऊपरसे पञ्चभूतोंद्वारा शुद्ध किया जानेपर भी भीतरकी गंदगीके कारण अपवित्र ही माना गया है। जिसमें पहुँचकर पञ्चगव्य और हविष्य आदि अत्यन्त पवित्र पदार्थ भी तत्काल अपवित्र हो जाते हैं, उस शरीरसे बढ़कर अशुद्ध दूसरा क्या हो सकता है।* जिसके द्वारोंसे निरन्तर क्षण-क्षणमें कफ-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुएँ बहती रहती हैं, उस अत्यन्त अपावन शरीरको कैसे शुद्ध किया जा सकता है।† शरीरके छिद्रोंका स्पर्शमात्र कर लेनेपर हाथको जलसे शुद्ध किया जाता है, तथापि मनुष्य अशुद्ध ही बने रहते हैं; किन्तु फिर भी उन्हें देहसे वैराग्य नहीं होता।‡ जैसे जन्मसे ही काले रंगकी ऊन धोनेसे कभी सफेद नहीं होती, उसी प्रकार यह शरीर धोनेसे भी पवित्र नहीं हो सकता। मनुष्य अपने शरीरके मलको अपनी आँखों देखता है, उसकी दुर्गन्धका अनुभव करता है और उससे बचनेके लिये नाक भी दबाता है; किन्तु फिर भी उसके मनमें वैराग्य नहीं होता। अहो ! मोहका कैसा माहात्म्य है, जिससे सारा जगत् मोहित हो रहा है। अपने शरीरके दोषोंको देखकर और सूँघकर भी वह उससे विरक्त नहीं होता। जो मनुष्य अपने देहकी अपवित्र गन्धसे घृणा करता है, उसे वैराग्यके लिये और क्या उपदेश दिया जा सकता है।§ सारा संसार पवित्र है, केवल शरीर ही अत्यन्त अपवित्र है; क्योंकि जन्मकालमें इस शरीरके अवयवोंका स्पर्श करनेसे शुद्ध मनुष्य भी अशुद्ध हो जाता है। अपवित्र वस्तुकी गन्ध और लेपको दूर करनेके लिये शरीरको नहलाने-धोने आदिका विधान है। गन्ध और लेपकी निवृत्ति हो जानेके पश्चात् भावशुद्धिसे वस्तुतः मनुष्य शुद्ध होता है।

जिसका भीतरी भाव दूषित है, वह यदि आगमें प्रवेश कर जाय तो भी न तो उसे स्वर्ग मिलता है और न मोक्षकी ही प्राप्ति होती है; उसे सदा देहके बन्धनमें ही जकड़े रहना पड़ता है। भावकी शुद्धि ही सबसे बड़ी पवित्रता है और वही प्रत्येक कार्यमें श्रेष्ठताका हेतु है। पत्नी और पुत्री—दोनोंका ही आलिङ्गन किया जाता है; किन्तु पत्नीके आलिङ्गनमें दूसरा भाव होता है और पुत्रीके आलिङ्गनमें दूसरा। भिन्न-भिन्न वस्तुओंके प्रति मनकी वृत्तिमें भी भेद हो जाता है। नारी अपने पतिका और भावसे चिन्तन करती है और पुत्रका और भावसे।X तुम यत्नपूर्वक अपने मनको शुद्ध करो, दूसरी-दूसरी बाह्य शुद्धियोंसे क्या लेना है। जो भावसे पवित्र है, जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वही स्वर्ग तथा मोक्षको प्राप्त करता है। उत्तम वैराग्यरूपी मिट्टी तथा


* यं प्राप्यातिपवित्राणि पञ्चगव्यं हवींषि च। अशुचित्वं क्षणाद्यान्ति कोऽन्योऽस्मादशुचिस्ततः ॥ (६६।६९)
† स्रोतांसि यस्य सततं स्रवन्ति क्षणे क्षणे। कफमूत्राद्यत्यशुचिः स देहः शुध्यते कथम् ॥ (६६।७३)
‡ स्पृष्ट्वा च देहस्रोतांसि मृदादिभिः शोध्यते करः। तथाप्यशुचिभाजश्च न विरज्यन्ति ते नराः ॥ (६६।७५)
§ जिघ्रन्नपि स्वदुर्गन्धं पश्यन्नपि मलं स्वकम्। न विरज्येत लोकोऽयं पीडयन्नपि नासिकाम् ॥
अहो मोहस्य माहात्म्यं येन व्यामोहितं जगत्। जिघ्रन् पश्यन् स्वकान् दोषान् कायस्य न विरज्यते ॥
स्वदेहाशुचिगन्धेन यो विरज्येत मानवः। वैराग्यकारणं तस्य किमन्यदुपदिश्यते ॥ (६६।७८—८०)
X अन्तर्भावप्रदुष्टस्य विशतोऽपि हुताशनम्। न स्वर्गो नापवर्गश्च देहनिर्बन्धनं परम् ॥
भावशुद्धिः परं शौचं प्रमाणं सर्वकर्मसु। अन्यथाऽऽलिङ्ग्यते कान्ता भावेन दुहितान्यथा ॥
मनसो भिद्यते वृत्तिर्भिन्नेष्वपि च वस्तुषु। अन्यथैव ततः पुत्रं भावयत्यन्यथा पतिम् ॥ (६६।८५—८७)

पद्म पुराण · पृष्ठ 307, कुल 1018 में से · BharatKosha