पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* सुकर्माद्वारा ययाति और मातलिके संवादका उल्लेख *
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ज्ञानरूप निर्मल जलसे माँजने-धोनेपर पुरुषके अविद्या तथा रागरूपी मल-मूत्रका लेप नष्ट होता है। इस प्रकार इस शरीरको स्वभावतः अपवित्र माना गया है। केलेके वृक्षकी भाँति यह सर्वथा सारहीन है; अध्यात्म-ज्ञान ही इसका सार है। देहके दोषको जानकर जिसे इससे वैराग्य हो जाता है, वह विद्वान् संसार-सागरसे पार हो जाता है। इस प्रकार महान् कष्टदायक जन्मकालीन दुःखका वर्णन किया गया।
गर्भमें रहते समय जीवको जो विवेक-बुद्धि प्राप्त होती है, वह उसके अज्ञान-दोषसे या नाना प्रकारके कर्मोंकी प्रेरणासे जन्म लेनेके पश्चात् नष्ट हो जाती है। योनि-यन्त्रसे पीड़ित होनेपर जब वह दुःखसे मूर्च्छित हो जाता है और बाहर निकलकर बाहरी हवाके सम्पर्कमें आता है, उस समय उसके चित्तपर महान् मोह छा जाता है। मोहग्रस्त होनेपर उसकी स्मरणशक्तिका भी शीघ्र ही नाश हो जाता है; स्मृति नष्ट होनेसे पूर्वकर्मोंकी वासनाके कारण उस जन्ममें भी ममता और आसक्ति बढ़ जाती है। फिर संसारमें आसक्त होकर मूढ़ जीव न आत्माको जान पाता है न परमात्माको, अपितु निषिद्ध कर्ममें प्रवृत्त हो जाता है।* बाल्यकालमें इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ पूर्णतया व्यक्त नहीं होतीं; इसलिये बालक महान्-से-महान् दुःखको सहन करता है, किन्तु इच्छा होते हुए भी न तो उसे कह सकता है और न उसका कोई प्रतिकार ही कर पाता है। शैशवकालीन रोगसे उसको भारी कष्ट भोगना पड़ता है। भूख-प्यासकी पीड़ासे उसके सारे शरीरमें दर्द होता है। बालक मोहवश मल-मूत्रको भी खानेके लिये मुँहमें डाल लेता है। कुमारावस्थामें कान बिंधानेसे कष्ट होता है। समय-समयपर उसे माता-पिताकी मार भी सहनी पड़ती है। अक्षर लिखने-पढ़नेके समय गुरुका शासन दुःखद जान पड़ता है।
जवानीमें भी इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ कामना और रागकी प्रेरणासे इधर-उधर विषयोंमें भटकती हैं; फिर मनुष्य रोगोंसे आक्रान्त हो जाता है। अतः युवावस्थामें भी सुख कहाँ है। युवकको ईर्ष्या और मोहके कारण महान् दुःखका सामना करना पड़ता है। कामाग्निसे संतप्त रहनेके कारण उसे रातभर नींद नहीं आती। दिनमें भी अर्थोपार्जनकी चिन्तासे सुख कहाँ मिलता है†। कीड़ोंसे पीड़ित कोढ़ी मनुष्यको अपनी कोढ़ खुजलानेमें जो सुख
* चित्तं शोधय यत्नेन किमन्यैर्बाह्यशोधनैः । भावतः शुचिः शुद्धात्मा स्वर्गं मोक्षं च विन्दति ॥
ज्ञानामलाभसा पुंसः सद्बैराग्यमृदा पुनः । अविद्यारागविण्मूत्रलेपो नश्येद्विशोधनैः ॥
एवमेतच्छरीरं हि निसर्गादशुचि विदुः । अध्यात्मसारान्निसारं कदलीसारसंनिभम् ॥
ज्ञात्वैव देहदोषं यः प्राज्ञः स शिथिलो भवेत् । सोऽतिक्रामति संसारं .................... ॥
एवमेतन्महाकष्टं जन्मदुःखं प्रकीर्तितम् । पुंसामज्ञानदोषेण नानाकर्मवशेन च ॥
गर्भस्थस्य मतिर्याऽऽसीत् संजातस्य प्रणश्यति । सम्मूर्च्छितस्य दुःखेन योनियन्त्रप्रपीडनात् ॥
बाह्येन वायुना तस्य मोहसङ्गेन देहिनाम् । स्पृष्टमात्रेण घोरेण .................... ॥
.................... महामोहः प्रजायते । सम्मूढस्य स्मृतिभ्रंशः शीघ्रं संजायते पुनः ॥
स्मृतिभ्रंशात्तस्य पूर्वकर्मज्ञानसमुद्भवा । रतिः संजायते पूर्णा जन्तोस्तत्रैव जन्मनि ॥
रक्तो मूढश्च लोकेऽयमकार्ये सम्प्रवर्तते । न चात्मानं विजानाति न परं न च दैवतम् ॥
(६६ । ९०—९९)
† अव्यक्तेन्द्रियवृत्तित्वाद्बाल्ये दुःखं महत्पुनः । इच्छन्नपि न शक्नोति वक्तुं कर्तुं च संस्कृतम् ॥
भुङ्क्ते तेन महद्दुःखं बाल्येन व्याधिनान्यथा । बाल्यरोगैश्च विविधैः पीडा ............ ॥
तृड्बुभुक्षापरीताङ्गः क्वचिद्गच्छति तिष्ठति । विण्मूत्रभक्षणं चापि मोहाद्बालः समाचरेत् ॥
कौमारः कर्णवेधेन मात्रापित्रोश्च ताडनम् । अक्षराध्ययनाद्यैश्च दुःखं स्याद्गुरुशासनम् ॥
अन्यत्रेन्द्रियवृत्तिश्च कामरागप्रयोजनात् । रोगावृत्तस्य सततं कुतः सौख्यं च यौवने ॥
ईर्ष्या सुमहद्दुःखं मोहाद्दुःखं सुजायते । तत्र स्यात्कुपितस्यैव रागे दुःखाय केवलम् ॥
रात्रौ न कुरुते निद्रां कामाग्निपरिखेदितः । दिवा वापि कुतः सौख्यमर्थोपार्जनचिन्तया ॥
(६६ । १०४—११०)