पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वर्गखण्ड ] * भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा * ३
महाराज ! दरिद्र मनुष्य यज्ञ नहीं कर सकते। यज्ञमें बहुत सामग्रीकी आवश्यकता होती है। नाना प्रकारकी तैयारियाँ और समारोह करने पड़ते हैं। कहीं कोई धनवान् मनुष्य ही भाँति-भाँतिके द्रव्योंका उपयोग करके यज्ञ कर सकता है। नरेश्वर ! जिसे विद्वान् पुरुष दरिद्र होनेपर भी कर सकें तथा जो पुण्य और फलमें यज्ञकी समानता करता हो, वह उपाय बताता हूँ; सुनिये। भरतश्रेष्ठ ! यह ऋषियोंका गोपनीय रहस्य है; तीर्थयात्राका पुण्य यज्ञोंसे भी बढ़कर होता है। एक खरब, तीस करोड़से भी अधिक तीर्थ माघमासमें गङ्गाजीके भीतर आकर स्थित होते हैं [अतः माघमें गङ्गा-स्नान परम पुण्यका साधक होता है]* महाराज ! अब आप निश्चिन्त होकर अकण्टक राज्य भोगिये। अब फिर अश्वमेध यज्ञके समय मुझसे आपकी भेंट होगी।
भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा
ऋषय ऊचुः
भवता कथितं सर्वं यत्किञ्चित् पृष्टमेव च।
इदानीमपि पृच्छाम एकं वद महामते ॥ १॥
**ऋषियोंने कहा—**महामते ! हमलोगोंने जो कुछ पूछा था, वह सब आपने कह सुनाया। अब भी आपसे एक प्रश्न करते हैं, उसका उत्तर दीजिये।
एतेषां खलु तीर्थानां सेवनाद्यत् फलं भवेत्।
सर्वेषां किल कृत्वैकं कर्म केन च लभ्यते।
एतन्नो ब्रूहि सर्वज्ञ कर्मैवं यदि वर्तते ॥ २॥
इन सभी तीर्थोंके सेवनसे जो फल होता है, वही कौन-सा एक कर्म करनेसे प्राप्त हो सकता है ? सर्वज्ञ सूतजी ! यदि ऐसा कोई कर्म हो तो उसे हमें बताइये।
सूत उवाच
कर्मयोगः किल प्रोक्तो वर्णानां द्विजपूर्वशः।
नानाविधो महाभागास्तत्र चैकं विशिष्यते ॥ ३॥
महाभाग महर्षिगण ! [शास्त्रोंमें] ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये निश्चय ही नाना प्रकारके कर्मयोगका वर्णन किया गया है, परन्तु उसमें एक ही बात सबसे बढ़कर है।
हरिभक्तिः कृता येन मनसा कर्मणा गिरा।
जितं तेन जितं तेन जितमेव न संशयः ॥ ४॥
जिसने मन, वाणी और क्रियाद्वारा श्रीहरिकी भक्ति की है, उसने बाजी मार ली, उसने विजय प्राप्त कर ली, उसकी निश्चय ही जीत हो गयी—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
हरिरेव समाराध्यः सर्वदेवेश्वरेश्वरः।
हरिनाममहामन्त्रैर्नश्येत् पापपिशाचकम् ॥ ५॥
सम्पूर्ण देवेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् श्रीहरिकी ही भलीभाँति आराधना करनी चाहिये। हरिनामरूपी महामन्त्रोंके द्वारा पापरूपी पिशाचोंका समुदाय नष्ट हो जाता है।
हरेः प्रदक्षिणां कृत्वा सकृदप्यमलाशयाः।
सर्वतीर्थसमागाहं लभन्ते यन्न संशयः ॥ ६॥
एक बार भी श्रीहरिकी प्रदक्षिणा करके मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका जो फल होता है, उसे प्राप्त कर लेते हैं—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
प्रतिमां च हरेर्दृष्ट्वा सर्वतीर्थफलं लभेत्।
विष्णुनाम परं जप्त्वा सर्वमन्त्रफलं लभेत् ॥ ७॥
मनुष्य श्रीहरिकी प्रतिमाका दर्शन करके सब तीर्थोंका फल प्राप्त करता है तथा विष्णुके उत्तम नामका जप करके सम्पूर्ण मन्त्रोंके जपका फल पा लेता है।
विष्णुप्रसादतुलसीमाघ्राय द्विजसत्तमाः।
प्रचण्डं विकरालं तद् यमस्यास्यं न पश्यति ॥ ८॥
* ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम। तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते॥
दशकोटिसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापरे। माघमासे तु गङ्गायां गमिष्यन्ति नरर्षभ॥ (स्वर्ग० ४९। १५-१६)