पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ * अर्चयध्वं हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
द्विजवरो ! भगवान् विष्णुके प्रसादस्वरूप तुलसीदलको सूँघकर मनुष्य यमराजके प्रचण्ड एवं विकराल मुखका दर्शन नहीं करता।
सकृत्प्रणामी कृष्णस्य मातुः स्तन्यं पिबेन्न हि।
हरिपादे मनो येषां तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥ ९॥
एक बार भी श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला मनुष्य पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता—उसका दूसरा जन्म नहीं होता। जिन पुरुषोंका चित्त श्रीहरिके चरणोंमें लगा है, उन्हें प्रतिदिन मेरा बारंबार नमस्कार है।
पुल्कसः श्वपचो वापि ये चान्ये म्लेच्छजातयः ।
तेऽपि वन्द्या महाभागा हरिपादैकसेवकाः ॥ १० ॥
पुल्कस, श्वपच (चाण्डाल) तथा और भी जो म्लेच्छ जातिके मनुष्य हैं, वे भी यदि एकमात्र श्रीहरिके चरणोंकी सेवामें लगे हों तो वन्दनीय और परम सौभाग्यशाली हैं।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
हरौ भक्तिं विधायैव गर्भवासं न पश्यति ॥ ११ ॥
फिर जो पुण्यात्मा ब्राह्मण और राजर्षि भगवान्के भक्त हों, उनकी तो बात ही क्या है। भगवान् श्रीहरिकी भक्ति करके ही मनुष्य गर्भवासका दुःख नहीं देखता।
हरेरग्रे स्वनैरुच्चैर्नृत्यंस्तन्नामकृन्नरः ।
पुनाति भुवनं विप्रा गङ्गादि सलिलं यथा ॥ १२ ॥
ब्राह्मणो ! भगवान्के सामने उच्चस्वरसे उनके नामोंका कीर्तन करते हुए नृत्य करनेवाला मनुष्य गङ्गा आदि नदियोंके जलकी भाँति समस्त संसारको पवित्र कर देता है।
दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य आलापादपि भक्तितः ।
ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १३ ॥
उस भक्तके दर्शन और स्पर्शसे, उसके साथ वार्तालाप करनेसे तथा उसके प्रति भक्तिभाव रखनेसे मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
हरेः प्रदक्षिणं कुर्वन्नुच्चैस्तन्नामकृन्नरः ।
करतालादिसंधानं सुस्वरं कलशब्दितम् ।
ब्रह्महत्यादिकं पापं तेनैव करतालितम् ॥ १४ ॥
जो श्रीहरिकी प्रदक्षिणा करते हुए करताल आदि बजाकर मधुर स्वर तथा मनोहर शब्दोंमें उनके नामोंका कीर्तन करता है, उसने ब्रह्महत्या आदि पापोंको मानो ताली बजाकर भगा दिया।
हरिभक्तिकथामुक्ताख्यायिकां शृणुयाच्च यः ।
तस्य संदर्शनादेव पूतो भवति मानवः ॥ १५ ॥
जो हरिभक्ति-कथारूपी मुक्तामयी आख्यायिकाका श्रवण करता है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पवित्र हो जाता है।
किं पुनस्तस्य पापानामाशा मुनिपुङ्गवाः ।
तीर्थानां च परं तीर्थं कृष्णनाम महर्षयः ॥ १६ ॥
मुनिवरो ! फिर उसके विषयमें पापोंकी आशङ्का क्या रह सकती है। महर्षियो ! श्रीकृष्णका नाम सब तीर्थोंमें परम तीर्थ है।
तीर्थीकुर्वन्ति जगतीं गृहीतं कृष्णनाम यैः ।
तस्मान्मुनिवराः पुण्यं नातः परतरं विदुः ॥ १७ ॥
जिन्होंने श्रीकृष्ण-नामको अपनाया है, वे पृथ्वीको तीर्थ बना देते हैं। इसलिये श्रेष्ठ मुनिजन इससे बढ़कर पावन वस्तु और कुछ नहीं मानते।
विष्णुप्रसादमिनिर्माल्यं भुक्त्वा धृत्वा च मस्तके ।
विष्णुरेव भवेन्मर्त्यो यमशोकविनाशनः ।
अर्चनीयो नमस्कार्यो हरिरेव न संशयः ॥ १८ ॥
श्रीविष्णुके प्रसादभूत निर्माल्यको खाकर और मस्तकपर धारण करके मनुष्य साक्षात् विष्णु ही हो जाता है। वह यमराजसे होनेवाले शोकका नाश करनेवाला होता है; वह पूजन और नमस्कारके योग्य साक्षात् श्रीहरिका ही स्वरूप है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
ये हीमं विष्णुमव्यक्तं देवं वापि महेश्वरम् ।
एकीभावेन पश्यन्ति न तेषां पुनरुद्भवः ॥ १९ ॥
जो इन अव्यक्त विष्णु तथा भगवान् महेश्वरको एक भावसे देखते हैं, उनका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता।
तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम् ।
हरं चैकं प्रपद्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि ॥ २० ॥
अतः महर्षियो ! आप आदि-अन्तसे रहित