भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 394

स्वर्गखण्ड ]
*भगवान्‌के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा*


[ वाम स्तम्भ ]

अविनाशी परमात्मा विष्णु तथा महादेवजीको एक भावसे देखें तथा एक समझकर ही उनका पूजन करें।

येऽसमानं प्रपश्यन्ति हरिं वै देवतान्तरम्।
ते यान्ति नरकान् घोरान्न तांस्तु गणयेद्धरिः ॥ २१ ॥
जो 'हरि' और 'हर' को समान भावसे नहीं देखते, श्रीहरिको दूसरा देवता समझते हैं, वे घोर नरकमें पड़ते हैं; उन्हें श्रीहरि अपने भक्तोंमें नहीं गिनते।

मूर्खं वा पण्डितं वापि ब्राह्मणं केशवप्रियम्।
श्वपाकं वा मोचयति नारायणः स्वयं प्रभुः ॥ २२ ॥
पण्डित हो या मूर्ख, ब्राह्मण हो या चाण्डाल, यदि वह भगवान्‌का प्यारा भक्त है तो स्वयं भगवान् नारायण उसे संकटोंसे छुड़ाते हैं।

नारायणात्परो नास्ति पापराशिदवानलः।
कृत्वापि पातकं घोरं कृष्णनाम्ना विमुच्यते ॥ २३ ॥
भगवान् नारायणसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो पापपुञ्जरूपी वनको जलानेके लिये दावानलके समान हो। भयङ्कर पातक करके भी मनुष्य श्रीकृष्ण-नामके उच्चारणसे मुक्त हो जाता है।

स्वयं नारायणो देवः स्वनाम्नि जगतां गुरुः।
आत्मनोऽभ्यधिकां शक्तिं स्थापयामास सुव्रताः ॥ २४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो ! जगद्गुरु भगवान् नारायणने स्वयं ही अपने नाममें अपनेसे भी अधिक शक्ति स्थापित कर दी है।

अत्र ये विवदन्ते वा आयासलघुदर्शनात्।
फलानां गौरवाच्चापि ते यान्ति नरकं बहु ॥ २५ ॥
नाम-कीर्तनमें परिश्रम तो थोड़ा होता है, किन्तु फल भारी-से-भारी प्राप्त होता है—यह देखकर जो लोग इसकी महिमाके विषयमें तर्क उपस्थित करते हैं, वे अनेकों बार नरकमें पड़ते हैं।

तस्माद्धरौ भक्तिमान् स्याद्धरिनामपरायणः।
पूजकं पृष्ठतो रक्षेन्नामिनं वक्षसि प्रभु ॥ २६ ॥
इसलिये हरिनामकी शरण लेकर भगवान्‌की भक्ति करनी चाहिये। प्रभु अपने पुजारीको तो पीछे रखते हैं; किन्तु नाम-जप करनेवालेको छातीसे लगाये रहते हैं।


[ दक्षिण स्तम्भ ]

हरिनाममहावज्रं पापपर्वतदारणम्।
तस्य पादौ तु सफलौ तदर्थगतिशालिनौ ॥ २७ ॥
हरिनामरूपी महान् वज्र पापोंके पहाड़को विदीर्ण करनेवाला है। जो भगवान्‌की ओर आगे बढ़ते हों, मनुष्यके वे ही पैर सफल हैं।

तावेव धन्यावाख्यातौ यौ तु पूजाकरौ करौ।
उत्तमाङ्गमूत्तमाङ्गं तद्धरौ नम्रमेव यत् ॥ २८ ॥
वे ही हाथ धन्य कहे गये हैं, जो भगवान्‌की पूजामें संलग्न रहते हैं। जो मस्तक भगवान्‌के आगे झुकता हो, वही उत्तम अङ्ग है।

सा जिह्वा या हरिं स्तौति तन्मनस्तत्पदानुगम्।
तानि लोमानि चोच्यन्ते यानि तन्नाम्नि चोत्थितम् ॥ २९ ॥
कुर्वन्ति तद्य नेत्राम्बु यदच्युतप्रसङ्गतः।
जीभ वही श्रेष्ठ है, जो भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करती है। मन भी वही अच्छा है, जो उनके चरणोंका अनुगमन—चिन्तन करता है तथा रोएँ भी वे ही सार्थक कहलाते हैं, जो भगवान्‌का नाम लेनेपर खड़े हो जाते हैं। इसी प्रकार आँसू वे ही सार्थक हैं, जो भगवान्‌की चर्चाके अवसरपर निकलते हैं।

अहो लोका अतितरां दैवदोषेण वञ्चिताः ॥ ३० ॥
नामोच्चारणमात्रेण मुक्तिदं न भजन्ति वै।
अहो ! संसारके लोग भाग्यदोषसे अत्यन्त वञ्चित हो रहे हैं, क्योंकि वे नामोच्चारणमात्रसे मुक्ति देनेवाले भगवान्‌का भजन नहीं करते।

वञ्चितास्ते च कलुषाः स्त्रीणां सङ्गप्रसङ्गतः ॥ ३१ ॥
प्रतिष्ठन्ति च लोमानि येषां नो कृष्णशब्दने।
स्त्रियोंके स्पर्श एवं चर्चासे जिन्हें रोमाञ्च हो आता है, श्रीकृष्णका नाम लेनेपर नहीं, वे मलिन तथा कल्याणसे वञ्चित हैं।

ते मूर्खा ह्यकृतात्मानः पुत्रशोकादिविह्वलाः ॥ ३२ ॥
रुदन्ति बहुलालापैर्न कृष्णाक्षरकीर्तने।
जो अजितेन्द्रिय पुरुष पुत्रशोकादिसे व्याकुल होकर अत्यन्त विलाप करते हुए रोते हैं, किन्तु श्रीकृष्णनामके अक्षरोंका कीर्तन करते हुए नहीं रोते, वे मूर्ख हैं।