भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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स्वर्गखण्ड ] * भगवद्भक्तिकी प्रशंसा तथा हरिभजनकी आवश्यकता * ४०७


बैठे हुए मनुष्य पार कर जाते हैं। इसलिये लोगोंको हरिभक्तिकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। लोग बुरी-बुरी बातोंको सुननेमें क्या सुख पाते हैं, जो अद्भुत लीलाओंवाले श्रीहरिकी लीलाकथामें आसक्त नहीं होते। यदि मनुष्योंका मन विषयमें ही आसक्त हो तो लोकमें नाना प्रकारके विषयोंसे मिश्रित उनकी विचित्र कथाओंका ही श्रवण करना चाहिये। द्विजो ! यदि निर्वाणमें ही मन रमता हो, तो भी भगवत्कथाओंको सुनना उचित है; उन्हें अवहेलनापूर्वक सुननेपर भी श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं। भक्तवत्सल भगवान् हृषीकेश यद्यपि निष्क्रिय हैं, तथापि उन्होंने श्रवणकी इच्छावाले भक्तोंका हित करनेके लिये नाना प्रकारकी लीलाएँ की हैं। सौ वाजपेय आदि कर्म तथा दस हजार राजसूय यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी भगवान् उतनी सुगमतासे नहीं मिलते, जितनी सुगमतासे वे भक्तिके द्वारा प्राप्त होते हैं। जो हृदयसे सेवन करने योग्य, संतोंके द्वारा बारंबार सेवित तथा भवसागरसे पार होनेके लिये सार वस्तु हैं, श्रीहरिके उन चरणोंका आश्रय लो। रे विषयलोलुप पामरो ! अरे निष्ठुर मनुष्यो ! क्यों स्वयं अपने-आपको रौरव नरकमें गिरा रहे हो। यदि तुम अनायास ही दुःखोंके पार जाना चाहते हो तो गोविन्दके चारु चरणोंका सेवन किये बिना नहीं जा सकोगे। भगवान् श्रीकृष्णके युगल चरण मोक्षके हेतु हैं; उनका भजन करो। मनुष्य कहाँसे आया है और कहाँ पुनः उसे जाना है, इस बातका विचार करके बुद्धिमान् पुरुष धर्मका संग्रह करे।* क्योंकि नाना प्रकारके नरकोंमें गिरनेके पश्चात् यदि पुनः उत्थान होता है, तभी मनुष्यका जन्म मिलता है। वहाँ उसे गर्भवासका अत्यन्त दुःखदायी कष्ट तो भोगना ही पड़ता है। द्विजो ! फिर कर्मवश जीव यदि इस पृथ्वीपर जन्म लेता है, तो बाल्यावस्था आदिके अनेक दोषोंसे उसे पीड़ा सहनी पड़ती है। फिर युवावस्थामें पहुँचनेपर यदि दरिद्रता हुई तो उससे बहुत कष्ट होता है। भारी रोगसे तथा अनावृष्टि आदि आपत्तियोंसे भी क्लेश उठाना पड़ता है। वृद्धावस्थामें मनके इधर-उधर भटकनेसे जो कष्ट उसे प्राप्त होता है, उसका वर्णन नहीं हो सकता। तदनन्तर व्याधिके कारण समयानुसार मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। संसारमें मृत्युसे बढ़कर दूसरे किसी दुःखका अनुभव नहीं होता।

तत्पश्चात् जीव अपने कर्मवश यमलोकमें पीड़ा भोगता है; वहाँ अत्यन्त दारुण यातना भोगकर फिर संसारमें जन्म लेता है। इस प्रकार वह बारंबार जन्मता और मरता तथा मरता और जन्मता रहता है। जिसने भगवान् गोविन्दके चरणोंकी आराधना नहीं की है, उसीकी ऐसी दशा होती है। 'गोविन्दके चरणोंकी आराधना न करनेवाले मनुष्यकी बिना कष्टके मृत्यु नहीं होती तथा बिना कष्टके उसे जीवन भी नहीं मिलता। यदि घरमें धन हो तो उसे रखनेसे क्या फल हुआ। जिस समय यमराजके दूत आकर जीवको खींचते हैं, उस समय धन क्या उसके पीछे-पीछे जाता है? अतः ब्राह्मणोंके सत्कारमें लगाया हुआ धन ही सब प्रकारके


* किं सुखं लभते जन्तुरसद्वार्ताविधारणे। हरेरद्भुतलीलस्य लीलाख्याने न सज्जते ॥
तद्विचित्रकथा लोके नाना विषयमिश्रिताः। श्रोतव्या यदि वै नृणां विषये सज्जते मनः ॥
निर्वाणे यदि वा चित्तं श्रोतव्या तदपि द्विजाः। हेलया श्रवणाद्यापि तस्य तुष्टो भवेद्धरिः ॥
निष्क्रियोऽपि हृषीकेशो नाना कर्म चकार सः। शुश्रूषूणां हितार्थाय भक्तानां भक्तवत्सलः ॥
न लभ्यते कर्मणापि वाजपेयशतादिना। राजसूयायुतेनापि यथा भक्त्या स लभ्यते ॥
यत्पदं चेतसा सेव्यं सद्भिराचरितं मुहुः। भवाब्धितरणे सारमाश्रयध्वं हरेः पदम् ॥
रे रे विषयसंलुब्धाः पामरा निष्ठुरा नराः। रौरवे हि किमात्मानमात्मना पातयिष्यथ ॥
विना गोविन्दसौम्याङ्घ्रिसेवनं मा गमिष्यथ। अनायासेन दुःखानां तरणं यदि वाञ्छथ ॥
भजध्वं कृष्णचरणमपुनर्भवकारणे। कुत एवागतो मर्त्यः कुत एव पुनर्व्रजेत् ॥
एतद्विचार्य मतिमानाश्रयेद् धर्मसंग्रहम्। (६१।७५–८४)