पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
सुख देनेवाला है। दान स्वर्गकी सीढ़ी है, दान सब पापोंका नाश करनेवाला है। गोविन्दका भक्तिपूर्वक किया हुआ भजन महान् पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। यदि मनुष्यमें बल हो तो उसे व्यर्थ ही नष्ट न करे। आलस्य छोड़कर भगवान्के सामने नृत्य करे और गीत गाये। मनुष्यके पास जो कुछ हो, उसे भगवान् श्रीकृष्णको समर्पित कर दे। श्रीकृष्णको समर्पित की हुई वस्तु कल्याणदायिनी होती है और किसीको दी हुई वस्तु केवल दुःख देनेवाली होती है। नेत्रोंसे श्रीहरिकी ही प्रतिमा आदिका दर्शन तथा कानोंसे श्रीकृष्णके गुण और नामोंका ही अहर्निश श्रवण करे। विद्वान् पुरुषोंको अपनी जिह्वासे श्रीहरिके चरणोदकका आस्वादन करना चाहिये। नासिकासे श्रीगोविन्दके चरणारविन्दोंपर चढ़े हुए श्रीतुलसीदलको सूँघकर, त्वचासे हरिभक्तका स्पर्श कर तथा मनसे भगवान्के चरणोंका ध्यान करके जीव कृतार्थ हो जाता है- इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। विद्वान् पुरुष भगवान्में ही मन लगाये और हृदयमें उन्हींकी भावना करे; ऐसा करनेवाला मनुष्य अन्तमें भगवान्को ही प्राप्त होता है - इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो मनसे भी निरन्तर चिन्तन करनेपर भक्तको अपना पद प्रदान कर देते हैं, उन आदि-अन्तरहित भगवान् नारायणका कौन मनुष्य सेवन नहीं करेगा। जो श्रीविष्णुके चरणारविन्दोंमें निरन्तर चित्त लगाये रहता है, भगवान्की प्रसन्नताके लिये अपनी शक्तिके अनुसार दान किया करता है तथा उन्हींके युगल चरणोंमें प्रणाम करता, मन लगाता और अनुराग रखता है, वह इस मनुष्यलोकमें निश्चय ही पूज्यभावको प्राप्त होता है।*
श्रीहरिके पुराणमय स्वरूपका वर्णन तथा पद्मपुराण और स्वर्गखण्डका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं- ब्राह्मणो! इस प्रकार संसारमें जिनकी महिमा समस्त लोकोंका उद्धार करनेवाली है, उन नानारूपधारी परमेश्वर विष्णुका एक विग्रह पुराण भी है। पुराणोंमें पद्मपुराणका बहुत बड़ा महत्त्व है। (१) ब्रह्मपुराण श्रीहरिका मस्तक है। (२) पद्मपुराण हृदय है। (३) विष्णुपुराण उनकी दाहिनी भुजा है। (४) शिवपुराण उन महेश्वरकी बायीं भुजा है। (५) श्रीमद्भागवतको भगवान्का ऊरुयुगल कहा गया है। (६) नारदीय पुराण नाभि है। (७) मार्कण्डेयपुराण दाहिना तथा (८) अग्निपुराण बायाँ चरण है। (९) भविष्यपुराण महात्मा श्रीविष्णुका दाहिना घुटना है। (१०) ब्रह्मवैवर्तपुराणको बायाँ घुटना बताया गया है। (११) लिङ्गपुराण दाहिना और (१२) वाराहपुराण बायाँ गुल्फ (घुट्टी) है। (१३) स्कन्दपुराण रोएँ तथा
* यदासौ कृष्यते याम्यैर्दुतैः किं धनमन्वि यात् । तस्माद् द्विजातिसत्कार्य द्रविणं सर्वसौख्यदम् ॥
दानं स्वर्गस्य सोपानं दानं किल्बिषनाशनम् । गोविन्दभक्तिभजनं महापुण्यविवर्धनम् ॥
बलं यदि भवेन्मर्त्ये न वृथा तद्व्ययं चरेत् । हरेरग्रे नृत्यगीतं कुर्यादिवमतन्द्रितः ॥
यत्किञ्चिद् विद्यते पुंसां तच्च कृष्णे समर्पयेत् । कृष्णार्पितं कुशलदमन्यार्पितमसौख्यदम् ॥
चक्षुर्भ्यां श्रीहरेरेव प्रतिमादिनिरूपणम् । श्रोत्राभ्यां कल्पयेत्कृष्णगुणनामान्यहर्निशम् ॥
जिह्वया हरिपादाम्बु खादितव्यं विचक्षणैः । घ्राणेनाघ्राय गोविन्दपादाब्जतुलसीदलम् ॥
त्वचाऽऽस्पृश्य हरिर्भक्तं मनसाऽऽध्याय तत्पदम् । कृतार्थो जायते जन्तुर्नात्र कार्या विचारणा ॥
तन्मना हि भवेत्प्राज्ञस्तथा स्यात्तद्गताशयः । तमेवान्तेऽप्येति लोको नात्र कार्या विचारणा ॥
चेतसा चाप्यनुध्यातः स्वपदं यः प्रयच्छति । नारायणमनाद्यन्तं न तं सेवेत को जनः ॥
सततनियतचित्तो विष्णुपादाराविन्दे वितरणमनुशक्ति प्रीतये तस्य कुर्यात् ।
नतिमतिरतिमस्याङ्घ्रिद्वये संविदध्यात् स हि खलु नरलोके पूज्यतामाप्नुयाच्च ॥
(६१।९३-१०२)