भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना * ४८१


सागरसे तर जाओगे। जो मनुष्य प्रतिदिन चन्दन आदि सामग्रियोंसे इच्छानुसार श्रीरामचन्द्रजीका पूजन करता है, उसे इहलोक और परलोककी उत्तम समृद्धि प्राप्त होती है, तुमने श्रीरामके ध्यानका प्रकार पूछा था। सो मैंने तुम्हें बता दिया। इसके अनुसार ध्यान करके भवसागरके पार हो जाओ।'

आरण्यकने कहा— मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपसे पुनः कुछ प्रश्न करता हूँ, मुझे उनका उत्तर दीजिये। महामते ! गुरुजन अपने सेवकपर कृपा करके उन्हें सब बातें बता देते हैं। महाभाग ! आप प्रतिदिन जिनका ध्यान करते हैं वे श्रीराम कौन हैं तथा उनके चरित्र कौन-कौन-से हैं ? यह बतानेकी कृपा कीजिये। द्विजश्रेष्ठ ! श्रीरामने किसलिये अवतार लिया था ? वे क्यों मनुष्यशरीरमें प्रकट हुए थे ? आप मेरा सन्देह निवारण करनेके लिये सब बातोंको शीघ्र बताइये।

मुनिके परम कल्याणमय वचन सुनकर महर्षि लोमशने श्रीरामचन्द्रजीके अद्भुत चरित्रका वर्णन किया। वे बोले—'योगेश्वरोंके ईश्वर भगवान्‌ने सम्पूर्ण लोकोंको दुःखी जानकर संसारमें अपनी कीर्ति फैलानेका विचार किया। ऐसा करनेका उद्देश्य यह था कि जगत्‌के मनुष्य मेरी कीर्तिका गान करके घोर संसारसे तर जायँगे। यह समझकर भक्तोंका मन लुभानेवाले दयासागर भगवान्‌ने चार विग्रहोंमें अवतार धारण किया। साथ ही उनकी ह्लादिनी शक्ति लक्ष्मी भी अवतीर्ण हुईं। पूर्वकालमें त्रेतायुग आनेपर सूर्यवंशमें श्रीरघुनाथजीका पूर्णावतार हुआ। उनकी श्रीरामके नामसे प्रसिद्धि हुई। श्रीरामके नेत्र कमलके समान शोभायमान थे। लक्ष्मण सदा उनके साथ रहते थे। धीरे-धीरे उन्होंने यौवनमें प्रवेश किया। तत्पश्चात् पिताकी आज्ञासे दोनों भाई—श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्रके अनुगामी हुए। राजा दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये अपने दोनों कुमारोंको विश्वामित्रके अर्पण कर दिया था। वे दोनों भाई जितेन्द्रिय, धनुर्धर और वीर थे। मार्गमें जाते समय उन्हें भयङ्कर वनके भीतर ताड़का नामकी राक्षसी मिली। उसने उनके रास्तेमें विघ्न डाला। तब महर्षि विश्वामित्रकी आज्ञासे रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीने ताड़काको परलोक भेज दिया। गौतम-पत्नी अहल्या, जो इन्द्रके साथ सम्पर्क करनेके कारण पत्थर हो गयी थी, श्रीरामके चरण-स्पर्शसे पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हो गयी। विश्वामित्रका यज्ञ प्रारम्भ होनेपर श्रीरघुनाथजीने अपने श्रेष्ठ बाणोंसे मारीचको घायल किया और सुबाहुको मार डाला। तदनन्तर राजा जनकके भवनमें रखे हुए शङ्करजीके धनुषको तोड़ा। उस समय श्रीरामचन्द्रजीकी अवस्था पंद्रह वर्षकी थी। उन्होंने छः वर्षकी अवस्थावाली मिथिलेशकुमारी सीताको, जो परम सुन्दरी और अयोनिजा थी, वैवाहिक विधिके अनुसार ग्रहण


महामरकतस्वर्णनीलरत्नादिशोभितम् ॥
सिंहासनं चित्तहरं कान्त्या तामिस्रनाशनम् । तत्रोपरि समासीनं रघुरजं मनोरमम् ॥
दूर्वादलश्यामतनुं देवं देवेन्द्रपूजितम् । राकायां पूर्णशीतांशुक्रान्तिधिकारिवक्त्रिणम् ॥
अष्टमीचन्द्रशकलसमभालाधिधारिणम् ! नीलकुन्तलशोभाढ्यं किरीटमणिरञ्जितम् ॥
मकराकारसौन्दर्यकुण्डलाभ्यां विराजितम् ॥
विद्रुमप्रभसत्कान्तिरदच्छदविराजितम् ।
तारापतिकराकारद्विजराजिसुशोभितम् । जपापुष्पाभया माध्या जिह्वया शोभिताननम् ॥
यस्यां वसन्ति निगमा ऋगगाद्याः शास्त्रसंयुताः । कम्बुकान्तिधरग्रीवाशोभया समलङ्कृतम् ॥
सिंहवदुच्चकौ स्कन्धौ मांसलौ बिभ्रतं वरम् । बाहू दधानं दीर्घाङ्गौ केयूरकटकाङ्कितौ ॥
मुद्रिकाहारशोभाभिर्भूषितौ जानुलम्बितौ । वक्षो दधानं विपुलं लक्ष्मीवासेन शोभितम् ॥
श्रीवत्सादिविचित्राङ्गैरङ्कितं सुमनोहरम् । महोदरं महानाभिं शुभकट्या विराजितम् ॥
काञ्च्या वै मणिमय्या च विशेषेण श्रियान्वितम् । ऊरुभ्यां विमलाभ्यां च जानुभ्यां शोभितं श्रिया ॥
चरणाभ्यां वज्ररेखायवाङ्कुशसुरेखया । युताभ्यां योगिध्येयाभ्यां कोमलाभ्यां विराजितम् ॥ (३५ । ५७—६८)