पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पातालखण्ड ] * शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना * ४८१
सागरसे तर जाओगे। जो मनुष्य प्रतिदिन चन्दन आदि सामग्रियोंसे इच्छानुसार श्रीरामचन्द्रजीका पूजन करता है, उसे इहलोक और परलोककी उत्तम समृद्धि प्राप्त होती है, तुमने श्रीरामके ध्यानका प्रकार पूछा था। सो मैंने तुम्हें बता दिया। इसके अनुसार ध्यान करके भवसागरके पार हो जाओ।'
आरण्यकने कहा— मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपसे पुनः कुछ प्रश्न करता हूँ, मुझे उनका उत्तर दीजिये। महामते ! गुरुजन अपने सेवकपर कृपा करके उन्हें सब बातें बता देते हैं। महाभाग ! आप प्रतिदिन जिनका ध्यान करते हैं वे श्रीराम कौन हैं तथा उनके चरित्र कौन-कौन-से हैं ? यह बतानेकी कृपा कीजिये। द्विजश्रेष्ठ ! श्रीरामने किसलिये अवतार लिया था ? वे क्यों मनुष्यशरीरमें प्रकट हुए थे ? आप मेरा सन्देह निवारण करनेके लिये सब बातोंको शीघ्र बताइये।
मुनिके परम कल्याणमय वचन सुनकर महर्षि लोमशने श्रीरामचन्द्रजीके अद्भुत चरित्रका वर्णन किया। वे बोले—'योगेश्वरोंके ईश्वर भगवान्ने सम्पूर्ण लोकोंको दुःखी जानकर संसारमें अपनी कीर्ति फैलानेका विचार किया। ऐसा करनेका उद्देश्य यह था कि जगत्के मनुष्य मेरी कीर्तिका गान करके घोर संसारसे तर जायँगे। यह समझकर भक्तोंका मन लुभानेवाले दयासागर भगवान्ने चार विग्रहोंमें अवतार धारण किया। साथ ही उनकी ह्लादिनी शक्ति लक्ष्मी भी अवतीर्ण हुईं। पूर्वकालमें त्रेतायुग आनेपर सूर्यवंशमें श्रीरघुनाथजीका पूर्णावतार हुआ। उनकी श्रीरामके नामसे प्रसिद्धि हुई। श्रीरामके नेत्र कमलके समान शोभायमान थे। लक्ष्मण सदा उनके साथ रहते थे। धीरे-धीरे उन्होंने यौवनमें प्रवेश किया। तत्पश्चात् पिताकी आज्ञासे दोनों भाई—श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्रके अनुगामी हुए। राजा दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये अपने दोनों कुमारोंको विश्वामित्रके अर्पण कर दिया था। वे दोनों भाई जितेन्द्रिय, धनुर्धर और वीर थे। मार्गमें जाते समय उन्हें भयङ्कर वनके भीतर ताड़का नामकी राक्षसी मिली। उसने उनके रास्तेमें विघ्न डाला। तब महर्षि विश्वामित्रकी आज्ञासे रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीने ताड़काको परलोक भेज दिया। गौतम-पत्नी अहल्या, जो इन्द्रके साथ सम्पर्क करनेके कारण पत्थर हो गयी थी, श्रीरामके चरण-स्पर्शसे पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हो गयी। विश्वामित्रका यज्ञ प्रारम्भ होनेपर श्रीरघुनाथजीने अपने श्रेष्ठ बाणोंसे मारीचको घायल किया और सुबाहुको मार डाला। तदनन्तर राजा जनकके भवनमें रखे हुए शङ्करजीके धनुषको तोड़ा। उस समय श्रीरामचन्द्रजीकी अवस्था पंद्रह वर्षकी थी। उन्होंने छः वर्षकी अवस्थावाली मिथिलेशकुमारी सीताको, जो परम सुन्दरी और अयोनिजा थी, वैवाहिक विधिके अनुसार ग्रहण
महामरकतस्वर्णनीलरत्नादिशोभितम् ॥
सिंहासनं चित्तहरं कान्त्या तामिस्रनाशनम् । तत्रोपरि समासीनं रघुरजं मनोरमम् ॥
दूर्वादलश्यामतनुं देवं देवेन्द्रपूजितम् । राकायां पूर्णशीतांशुक्रान्तिधिकारिवक्त्रिणम् ॥
अष्टमीचन्द्रशकलसमभालाधिधारिणम् ! नीलकुन्तलशोभाढ्यं किरीटमणिरञ्जितम् ॥
मकराकारसौन्दर्यकुण्डलाभ्यां विराजितम् ॥
विद्रुमप्रभसत्कान्तिरदच्छदविराजितम् ।
तारापतिकराकारद्विजराजिसुशोभितम् । जपापुष्पाभया माध्या जिह्वया शोभिताननम् ॥
यस्यां वसन्ति निगमा ऋगगाद्याः शास्त्रसंयुताः । कम्बुकान्तिधरग्रीवाशोभया समलङ्कृतम् ॥
सिंहवदुच्चकौ स्कन्धौ मांसलौ बिभ्रतं वरम् । बाहू दधानं दीर्घाङ्गौ केयूरकटकाङ्कितौ ॥
मुद्रिकाहारशोभाभिर्भूषितौ जानुलम्बितौ । वक्षो दधानं विपुलं लक्ष्मीवासेन शोभितम् ॥
श्रीवत्सादिविचित्राङ्गैरङ्कितं सुमनोहरम् । महोदरं महानाभिं शुभकट्या विराजितम् ॥
काञ्च्या वै मणिमय्या च विशेषेण श्रियान्वितम् । ऊरुभ्यां विमलाभ्यां च जानुभ्यां शोभितं श्रिया ॥
चरणाभ्यां वज्ररेखायवाङ्कुशसुरेखया । युताभ्यां योगिध्येयाभ्यां कोमलाभ्यां विराजितम् ॥ (३५ । ५७—६८)
४८२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ******************************************************************************
किया। इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी बारह वर्षोंतक सीताके साथ रहे। सत्ताईसवें वर्षकी उम्रमें उन्हें युवराज बनानेकी तैयारी हुई। इसी बीचमें रानी कैकेयीने राजा दशरथसे दो वर माँगे। उनमेंसे एकके द्वारा उन्होंने यह इच्छा प्रकट की कि 'श्रीराम मस्तकपर जटा धारण करके चौदह वर्षोंतक वनमें रहें।' तथा दूसरे वरके द्वारा यह माँगा कि 'मेरे पुत्र भरत युवराज बनाये जायँ', राजा दशरथने श्रीरामको वनवास दे दिया। श्रीरामचन्द्रजी तीन रातितक केवल जल पीकर रहे, चौथे दिन उन्होंने फलाहार किया और पाँचवें दिन चित्रकूटपर पहुँचकर अपने लिये रहनेका स्थान बनाया। [इस प्रकार वहाँ बारह वर्ष बीत गये।] तदनन्तर तेरहवें वर्षके आरम्भमें वे पञ्चवटीमें जाकर रहने लगे। महामुने ! वहाँ श्रीरामने [लक्ष्मणके द्वारा] शूर्पणखा नामकी राक्षसीको [उसकी नाक कटाकर] कुरूप बना दिया। तत्पश्चात् वे जानकीके साथ वनमें विचरण करने लगे। इसी बीचमें अपने पापोंका फल उदय होनेपर दस मस्तकोंवाला राक्षसराज रावण सीताको हर ले जानेके लिये वहाँ आया और माघ कृष्णा अष्टमीको वृन्द नामक मुहूर्त्तमें, जब कि श्रीराम और लक्ष्मण आश्रमपर नहीं थे, उन्हें हर ले गया। उसके द्वारा अपहरण होनेपर देवी सीता कुररीकी भाँति विलाप करने लगीं—'हा राम ! हा राम ! मुझे राक्षस हरकर लिये जा रहा है, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।' रावण कामके अधीन होकर जनककिशोरी सीताको लिये जा रहा था। इतनेहीमें पक्षिराज जटायु वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने राक्षसराज रावणके साथ युद्ध किया, किन्तु स्वयं ही उसके हाथसे मारे जाकर धरतीपर गिर पड़े। इसके बाद दसवें महीनेमें अगहन<sup>१</sup> शुक्ला नवमीके दिन सम्पातिने वानरोंको इस बातकी सूचना दी कि 'सीता देवी रावणके भवनमें निवास कर रही हैं।'
'फिर एकादशीको हनुमान्जी महेन्द्र पर्वतसे उछलकर सौ योजन चौड़ा समुद्र लाँघ गये। उस रातमें वे लङ्कापुरीके भीतर सीताकी खोज करते रहे। रात्रिके अन्तिम भागमें हनुमान्जीको सीताका दर्शन हुआ। द्वादशीके दिन वे शिंशपा नामक वृक्षपर बैठे रहे। उसी दिन रातमें जानकीजीको विश्वास दिलानेके लिये उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी कथा सुनायी। फिर त्रयोदशीको अक्ष आदिके साथ उनका युद्ध हुआ। चतुर्दशीके दिन इन्द्रजित्ने आकर ब्रह्मास्त्रसे उन्हें बाँध लिया। इसके बाद उनकी पूँछमें आग लगा दी गयी और उसी आगके द्वारा उन्होंने लङ्कापुरीको जला डाला। पूर्णिमाको वे पुनः महेन्द्र पर्वतपर आ गये। फिर मार्गशीर्ष कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे लेकर पाँच दिन उन्होंने मार्गमें बिताये। छठे दिन मधुवनमें पहुँचकर उसका विध्वंस किया और सप्तमीको श्रीरामचन्द्रजीके पास पहुँचकर सीताजीका दिया हुआ चिह्न उन्हें अर्पण किया तथा वहाँका सारा समाचार कह सुनाया। तत्पश्चात् अष्टमीको उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र और विजय नामक मुहूर्त्तमें दोपहरके समय श्रीरघुनाथजीका लङ्काके लिये प्रस्थान हुआ। श्रीरामचन्द्रजी यह प्रतिज्ञा करके कि 'मैं समुद्रको लाँघकर राक्षसराज रावणका वध करूँगा', दक्षिण दिशाकी ओर चले। उस समय सुग्रीव उनके सहायक हुए। सात दिनोंके बाद समुद्रके तटपर पहुँचकर उन्होंने सेनाको ठहराया। पौष-शुक्ला प्रतिपदासे लेकर तृतीयातक श्रीरघुनाथजी सेनासहित समुद्र-तटपर टिके रहे। चतुर्थीको विभीषण आकर उनसे मिले। फिर पञ्चमीको समुद्र पार करनेके विषयमें विचार हुआ। इसके बाद श्रीरामने चार दिनोंतक अनशन किया। फिर समुद्रसे वर मिला और उसने पार जानेका उपाय भी दिखा दिया। तदनन्तर दशमीको सेतु बाँधनेका कार्य आरम्भ होकर त्रयोदशीको समाप्त हुआ। चतुर्दशीको श्रीरामने सुवेल पर्वतपर अपनी सेनाको ठहराया। पूर्णिमासे द्वितीयातक तीन दिनोंमें सारी सेना समुद्रके पार हुई। समुद्र पार करके लक्ष्मणसहित श्रीरामने वानरराजकी
१-यह गणना शुक्लपक्षसे महीनेका आरम्भ मानकर की गयी है; अतः यहाँ अगहन शुक्लाका अर्थ यहाँकी प्रचलित गणनाके अनुसार कार्तिक शुक्लपक्ष समझना चाहिये। तथा इसी प्रकार आगे बतायी जानेवाली अन्य तिथियोंको भी जानना चाहिये।
पातालखण्ड ] * शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना * ४८३
सेना साथ ले सीताके लिये लङ्कापुरीको चारों ओरसे घेर लिया। तृतीयासे दशमीपर्यन्त आठ दिनोंतक सेनाका घेरा पड़ा रहा। एकादशीके दिन शुक और सारण सेनामें घुस आये थे। पौष-कृष्ण द्वादशीको शार्दूलके द्वारा वानर-सेनाकी गणना हुई। साथ ही उसने प्रधान-प्रधान वानरोंकी शक्तिका भी वर्णन किया। शत्रुसेनाकी संख्या जानकर रावणने त्रयोदशीसे अमावास्यापर्यन्त तीन दिनोंतक लङ्कापुरीमें अपने सैनिकोंको युद्धके लिये उत्साहित किया। माघ-शुक्ल प्रतिपदाको अङ्गद दूत बनकर रावणके दरबारमें गये। उधर रावणने मायाके द्वारा सीताको, उनके पतिके कटे हुए मस्तक आदिका दर्शन कराया। माघकी द्वितीयासे लेकर अष्टमीपर्यन्त सात दिनोंतक राक्षसों और वानरोंमें घमासान युद्ध होता रहा। माघ शुक्ल नवमीको रात्रिके समय इन्द्रजित्ने युद्धमें श्रीराम और लक्ष्मणको नाग-पाशसे बाँध लिया। इससे प्रधान-प्रधान वानर जब सब ओरसे व्याकुल और उत्साहहीन हो गये तो दशमीको नाग-पाशका नाश करनेके लिये वायुदेवने श्रीरामचन्द्रजीके कानमें गरुड़के मन्त्रका जप और उनके स्वरूपका ध्यान बता दिया। ऐसा करनेसे एकादशीको गरुड़जीका आगमन हुआ। फिर द्वादशीको श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे धूम्राक्षका वध हुआ। त्रयोदशीको भी उन्हींके द्वारा कम्पन नामका राक्षस युद्धमें मारा गया। माघ शुक्ल चतुर्दशीसे कृष्ण पक्षकी प्रतिपदातक तीन दिनमें नीलके द्वारा प्रहस्तका वध हुआ। माघ कृष्ण द्वितीयासे चतुर्थीपर्यन्त तीन दिनोंतक तुमुल युद्ध करके श्रीरामने रावणको रणभूमिसे भगा दिया। पञ्चमीसे अष्टमीतक चार दिनोंमें रावणने कुम्भकर्णको जगाया और जागनेपर उसने आहार ग्रहण किया। फिर नवमीसे चतुर्दशीपर्यन्त छः दिनोंतक युद्ध करके श्रीरामने कुम्भकर्णका वध किया। उसने बहुत-से वानरोंको भक्षण कर लिया था। अमावास्याके दिन कुम्भकर्णकी मृत्युके शोकसे रावणने युद्धको बंद रखा। उसने अपनी सेना पीछे हटा ली। फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे चतुर्थीतक चार दिनोंके भीतर विसतन्तु आदि पाँच राक्षस मारे गये। पञ्चमीसे सप्तमीतकके युद्धमें अतिकायका वध हुआ। अष्टमीसे द्वादशीतक पाँच दिनोंमें निकुम्भ और कुम्भ मौतके घाट उतारे गये। उसके बाद तीन दिनोंमें मकराक्षका वध हुआ। फाल्गुन कृष्ण द्वितीयाके दिन इन्द्रजित्ने लक्ष्मणपर विजय पायी। फिर तृतीयासे सप्तमीतक पाँच दिन लक्ष्मणके लिये दवा आदिके प्रबन्धमें व्यग्र रहनेके कारण श्रीरामने युद्धको बंद रखा। तदनन्तर त्रयोदशीपर्यन्त पाँच दिनोंतक युद्ध करके लक्ष्मणने विख्यात बलशाली इन्द्रजित्को युद्धमें मार डाला। चतुर्दशीको दशग्रीव रावणने यज्ञकी दीक्षा ली और युद्धको स्थगित रखा। फिर अमावास्याके दिन वह युद्धके लिये प्रस्थित हुआ। चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर पञ्चमीतक रावण युद्ध करता रहा; उसमें पाँच दिनोंके भीतर बहुत-से राक्षसोंका विनाश हुआ। षष्ठीसे अष्टमीतक महापार्श्व आदि राक्षस मारे गये। चैत्र शुक्ल नवमीके दिन लक्ष्मणजीको शक्ति लगी। तब श्रीरामने क्रोधमें भरकर दशशीशको मार भगाया। फिर अञ्जना-नन्दन हनुमान्जी लक्ष्मणकी चिकित्साके लिये द्रोण पर्वत उठा लाये। दशमीके दिन श्रीरामचन्द्रजीने भयङ्कर युद्ध किया, जिसमें असंख्य राक्षसोंका संहार हुआ। एकादशीके दिन इन्द्रके भेजे हुए मातलि नामक सारथि श्रीरामचन्द्रजीके लिये रथ ले आये और उसे युद्धक्षेत्रमें भक्तिपूर्वक उन्होंने श्रीरघुनाथजीको अर्पण किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी चैत्र शुक्ल द्वादशीसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीतक अठारह दिन रोषपूर्वक युद्ध करते रहे। अन्ततोगत्वा उस द्वैरथयुद्धमें रामने रावणका वध किया। उस तुमुल संग्राममें श्रीरघुनाथजीने ही विजय प्राप्त की। माघ शुक्ल द्वितीयासे लेकर चैत्रकृष्ण चतुर्दशीतक सतासी दिन होते हैं, इनके भीतर केवल पंद्रह दिन युद्ध बंद रहा। शेष बहत्तर दिनोंतक संग्राम चलता रहा। रावण आदि राक्षसोंका दाहसंस्कार अमावास्याके दिन हुआ। वैशाख शुक्ल प्रतिपदाको श्रीरामचन्द्रजी युद्धभूमिमें ही ठहरे रहे। द्वितीयाको लङ्काके राज्यपर विभीषणका अभिषेक किया गया। तृतीयाको सीताजीकी अग्निपरीक्षा हुई और देवताओंसे वर मिला। इस प्रकार लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरामने लङ्कापति रावणको थोड़े ही दिनोंमें
४८४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मारकर परमपवित्र जनककिशोरी सीताको ग्रहण किया, जिन्हें राक्षसने बहुत कष्ट पहुँचाया था। जानकीजीको पाकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे लङ्कासे लौटे। वैशाख शुक्ल चतुर्थीको पुष्पकविमानपर आरूढ़ होकर वे आकाशमार्गसे पुनः अयोध्यापुरीकी ओर चले। वैशाख शुक्ल पञ्चमीको भगवान् श्रीराम अपने दल-बलके साथ भरद्वाजमुनिके आश्रमपर आये और चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर षष्ठीको नन्दिग्राममें जाकर भरतसे मिले। फिर सप्तमीको अयोध्यापुरीमें श्रीरघुनाथजीका राज्याभिषेक हुआ। मिथिलेशकुमारी सीताको अधिक दिनोंतक रामसे अलग होकर रावणके यहाँ रहना पड़ा था। बयालिसवें वर्षकी उम्रमें श्रीरामचन्द्रजीने राज्य ग्रहण किया, उस समय सीताकी अवस्था तैंतीस वर्षकी थी। रावणका संहार करनेवाले भगवान् श्रीराम चौदह वर्षोंके बाद पुनः अपनी पुरी अयोध्यामें प्रविष्ट होकर बड़े प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् वे भाइयोंके साथ राज्यकार्य देखने लगे। श्रीरघुनाथजीके राज्य करते समय ही अगस्त्यजी, जो एक अच्छे वक्ता हैं तथा जिनकी उत्पत्ति कुम्भसे हुई है, उनके पास पधारेंगे। उनके कहनेसे श्रीरघुनाथजी अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेंगे। सुव्रत ! भगवान्का वह यज्ञसम्बन्धी अश्व तुम्हारे आश्रमपर आवेगा तथा उसकी रक्षा करनेवाले योद्धा भी बड़े हर्षके साथ तुम्हारे आश्रमपर पधारेंगे। उनके सामने तुम श्रीरामचन्द्रजीकी मनोहर कथा सुनाओगे तथा उन्हीं लोगोंके साथ अयोध्यापुरीको भी जाओगे। द्विजश्रेष्ठ ! अयोध्यामें कमलनयन श्रीरामका दर्शन करके तुम तत्काल ही संसारसागरसे पार हो जाओगे।'
मुनिश्रेष्ठ लोमश सर्वज्ञ हैं; उन्होंने मुझसे उपर्युक्त बातें कहकर पूछा—'आरण्यक ! तुम्हें अपने कल्याणके लिये और क्या पूछना है?' तब मैंने उनसे कहा—'महर्षे ! आपकी कृपासे मुझे भगवान् श्रीरामके अद्भुत चरित्रका पूर्ण ज्ञान हो गया। अब आपकीके प्रसादसे मैं उनके चरणकमलोंको भी प्राप्त करूँगा।' ऐसा कहकर मैंने मुनीश्वरको प्रणाम किया। तत्पश्चात् वे चले गये। उन्हींकी कृपासे मुझे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी पूजन-विधि भी प्राप्त हुई है। तबसे मैं सदा ही श्रीरामके चरणोंका चिन्तन करता हूँ तथा आलस्य छोड़कर बारम्बार उन्हींके चरित्रका गान करता रहता हूँ। उनके गुणोंका गान मेरे चित्तको लुभाये रहता है। मैं उसके द्वारा दूसरे लोगोंको भी पवित्र किया करता हूँ तथा मुनिके वचनोंका बारम्बार स्मरण करके भगवत्-दर्शनकी उत्कण्ठासे पुलकित हो उठता हूँ। इस पृथ्वीपर मैं धन्य हूँ; कृतकृत्य हूँ और परम सौभाग्यशाली हूँ; क्योंकि मेरे हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंको देखनेकी जो अभिलाषा है, वह निश्चय ही पूर्ण होगी। अतः सब प्रकारसे परम मनोहर श्रीरामचन्द्रजीका ही भजन करना चाहिये। संसार-समुद्रके पार जानेकी इच्छासे सब लोगोंको श्रीरघुनाथजीकी ही वन्दना करनी चाहिये।*
* धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं सभाग्योऽहं महीतले। रामचन्द्रपदाम्भोजदिदृक्षा मे भविष्यति ॥
तस्मात्सर्वात्मना रामो भजनीयो मनोहरः। वन्दनीयो हि सर्वेषां संसाराब्धितितीर्षया ॥ (३६। ८९-९०)
पातालखण्ड ] * शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना * ४८५
अच्छा, अब तुमलोग बताओ, किसलिये यहाँ आये हो ? कौन धर्मात्मा राजा अश्वमेध नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान कर रहा है ? ये सब बातें यहाँ बतलाकर अश्वकी रक्षाके लिये जाओ और श्रीरघुनाथजीके चरणोंका निरन्तर स्मरण करते रहो।
आरण्यक मुनिके ये वचन सुनकर सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए उनसे बोले—'ब्रह्मर्षिवर ! इस समय आपका दर्शन पाकर हम सब लोग पवित्र हो गये; क्योंकि आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथा सुनाकर यहाँ सब लोगोंको पवित्र करते रहते हैं। आपने हमलोगोंसे जो कुछ पूछा है, वह सब हम बता रहे हैं। आप हमारे यथार्थ वचनको श्रवण करें। महर्षि अगस्त्यजीके कहनेसे भगवान् श्रीराम ही सब सामग्री एकत्रित करके अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कर रहे हैं। उन्हींका यज्ञसम्बन्धी अश्व यहाँ आया है और उसीकी रक्षा करते हुए हम सब लोग भी अश्वके साथ ही आपके आश्रमपर आ पहुँचे हैं। महामते ! यही हमारा वृत्तान्त है; आप इसे हृदयङ्गम करें।'
रसायनके समान मनको प्रिय लगनेवाला यह उत्तम वचन सुनकर राम-भक्त ब्राह्मण आरण्यक मुनिको बड़ा हर्ष हुआ। वे कहने लगे—'आज मेरे मनोरथरूपी वृक्षमें फल आ गया, वह उत्तम शोभासे सम्पन्न हो गया। मेरी माताने जिसके लिये मुझे उत्पन्न किया था, वह शुभ उद्देश्य आज पूरा हो गया। आजतक हविष्यके द्वारा मैंने जो हवन किया है, उस अग्निहोत्रका फल आज मुझे मिल गया; क्योंकि अब मैं श्रीरामचन्द्रजीके युगल-चरणारविन्दोंका दर्शन करूँगा। अहा ! जिनका मैं प्रतिदिन अपने हृदयमें ध्यान करता था, वे मनोहर रूपधारी अयोध्यानाथ भगवान् श्रीराम निश्चय ही मेरे नेत्रोंके समक्ष होकर दर्शन देंगे। हनुमान्जी मुझे हृदयसे लगाकर मेरी कुशल पूछेंगे। वे संतोंके शिरोमणि हैं; मेरी भक्ति देखकर उन्हें बड़ा सन्तोष होगा।' आरण्यक मुनिके ये वचन सुनकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीने उनके दोनों चरण पकड़ लिये और कहा—'ब्रह्मर्षे ! मैं ही हनुमान् हूँ, स्वामिन् ! मैं आपका सेवक हूँ और आपके सामने खड़ा हूँ। मुनीश्वर ! मुझे श्रीरघुनाथजीके दासकी चरण-धूलि समझिये।' हनुमान्जी श्रीरामभक्त होनेके कारण अत्यन्त शोभा पा रहे थे। उनकी उपर्युक्त बातें सुनकर आरण्यक मुनिको बड़ा हर्ष हुआ और उन्होंने हनुमान्जीको हृदयसे लगा लिया। दोनोंके हृदयसे प्रेमकी धारा फूटकर बह रही थी। दोनों ही आनन्द-सुधामें निमग्न होकर शिथिल एवं चित्रलिखित-से प्रतीत हो रहे थे। श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंके प्रेमसे दोनोंका ही मानस भरा हुआ था। अतः दोनों ही बैठकर आपसमें भगवान्की मनोहारिणी कथाएँ कहने लगे। मुनिश्रेष्ठ आरण्यक श्रीरामके चरणोंका ध्यान कर रहे थे। हनुमान्जीने उनसे यह मनोहर वचन कहा—'महर्षे ! ये श्रीरघुनाथजीके भ्राता महावीर शत्रुघ्न आपको प्रणाम कर रहे हैं। ये उद्भट वीरोंसे सेवित भरतकुमार पुष्कल भी आपके चरणोंमें शीश झुकाते हैं तथा इधरकी ओर जो ये महान् बली और अनेक गुणोंसे विभूषित सज्जन खड़े हैं, इन्हें श्रीरघुनाथजीके मन्त्री समझिये। अत्यन्त भयङ्कर योद्धा महायशस्वी राजा सुबाहु भी आपको प्रणाम करते हैं। ये श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका मकरन्द पान करनेवाले मधुकर हैं। ये राजा सुमंद हैं, जिन्हें पार्वतीजीने श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति प्रदान की है, जिससे ये संसार-समुद्रके पार हो चुके हैं; ये भी आपके चरणोंमें नमस्कार करते हैं। जिन्होंने अपने सेवकके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीके अश्वको आया हुआ सुनकर अपना सारा राज्य ही भगवान्को समर्पण कर दिया है, वे राजा सत्यवान् भी पृथ्वीपर माथा टेककर आपके चरणोंमें प्रणाम करते हैं।'
हनुमान्जीके ये वचन सुनकर आरण्यक मुनिने बड़े आदरके साथ सबको हृदयसे लगाया और फल-मूल आदिके द्वारा सबका स्वागत-सत्कार किया। फिर शत्रुघ्न आदि सब लोगोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ महर्षिके आश्रमपर निवास किया। प्रातःकाल नर्मदामें नित्यकर्म करके वे महान् उद्योगी सैनिक आगे जानेको उद्यत हुए। शत्रुघ्नने आरण्यक मुनिको पालकीपर बिठाकर अपने सेवकोंद्वारा उन्हें श्रीरघुनाथजीकी निवासभूत अयोध्या-
४८६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
पुरीको पहुँचा दिया। सूर्यवंशी राजाओंने जिसे अपना निवास-स्थान बनाया था, उस अवधपुरीको दूरसे ही देखकर आरण्यक मुनि सवारीसे उतर पड़े और श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी इच्छासे पैदल ही चलने लगे। जन-समुदायसे शोभा पानेवाली उस रमणीय नगरीमें पहुँचकर उनके मनमें श्रीरामको देखनेके लिये हजार-हजार अभिलाषाएँ उत्पन्न हुईं। थोड़ी ही देरमें वहाँ यज्ञमण्डपसे सुशोभित सरयूके पावन तटपर उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी झाँकी हुई। भगवान्का श्रीविग्रह दूर्वादलके समान श्यामसुन्दर दिखायी देता था। उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान शोभा पा रहे थे। वे अपने कटिभागमें मृगशृङ्ग धारण किये हुए थे। व्यास<sup>१</sup> आदि महर्षि उन्हें घेरकर विराजमान थे और बहुत-से शूरवीर उनकी सेवामें उपस्थित थे। उनके दोनों पार्श्वभागोंमें भरत और सुमित्रानन्दन लक्ष्मण खड़े थे तथा श्रीरघुनाथजी दीनजनोंको मुँहमाँगा दान दे रहे थे।
भगवान्का दर्शन करके आरण्यक मुनिने अपनेको कृतार्थ माना। वे कहने लगे—'आज मेरे नेत्र सफल हो गये, क्योंकि ये श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन कर रहे हैं। मैंने जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त किया था, वह आज सार्थक हो गया; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको जानकर इस समय मैं अयोध्यापुरीमें आ पहुँचा हूँ।' इस प्रकार हर्षमें भरकर उन्होंने बहुत-सी बातें कहीं। श्रीरघुनाथजीके चरणोंका दर्शन करके उनके समस्त शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। इस अवस्थामें वे रमानाथ भगवान् श्रीरामके समीप गये, जो दूसरोंके लिये अगम्य हैं तथा विचारपरायण योगेश्वरोंसे भी जो बहुत दूर हैं। भगवान्के निकट पहुँचकर वे बोल उठे—'अहा ! आज मैं धन्य हो गया; क्योंकि श्रीरघुनाथजीके चरण मेरे नेत्रोंके समक्ष विराजमान हैं। अब मैं श्रीरामचन्द्रजीको देखकर इनसे वार्तालाप करके अपनी वाणीको पवित्र बनाऊँगा।'
श्रीरामचन्द्रजी भी अपने तेजसे जाज्वल्यमान तपोमूर्ति विप्रवर आरण्यक मुनिको आया देख उनके स्वागतके लिये उठकर खड़े हो गये। वे बड़ी देरतक उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये रहे। देवता और असुर अपनी मुकुट-मणियोंसे जिनके युगल-चरणोंकी आरती उतारते हैं, वे ही प्रभु श्रीरघुनाथजी मुनिके पैरोंपर पड़कर कहने लगे—'ब्राह्मणदेव ! आज आपने मेरे शरीरको पवित्र कर दिया।' ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ महातपस्वी आरण्यक मुनिने राजाओंके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीको चरणोंमें पड़ा देख उनका हाथ पकड़कर उठाया और अपने प्रियतम प्रभुको छातीसे लगा लिया। कौसल्यानन्दन श्रीरामने ब्राह्मणको मणिनिर्मित ऊँचे आसनपर बिठाया और स्वयं ही जल लेकर उनके दोनों पैर धोये। फिर चरणोदक लेकर भगवान्ने उसे अपने मस्तकपर चढ़ाया और कहा—'आज मैं अपने कुटुम्ब और सेवकोंसहित पवित्र हो गया।' तत्पश्चात् देवाधिदेवोंसे सेवित श्रीरघुनाथजीने मुनिके ललाटमें चन्दन लगाया और उन्हें दूध देनेवाली गौ दान की। फिर मनोहर वचनोंमें कहा—'स्वामिन् ! मैं अश्वमेधयज्ञ कर रहा हूँ। आपके चरण यहाँ आ गये, इससे अब यह यज्ञ पूर्ण हो जायगा। मेरे अश्वमेध-यज्ञको आपने चरणोंसे पवित्र कर दिया।' राजाधिराजोंसे सेवित श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर आरण्यक मुनिने हँसते हुए मधुर वाणीमें कहा—'स्वामिन् ! आप ब्राह्मणोंके हितैषी और इस पृथ्वीके रक्षक हैं; अतः यह वचन आपहीके योग्य है। महाराज ! वेदोंके पारगामी ब्राह्मण आपके ही विग्रह हैं। यदि आप ब्राह्मणोंकी पूजा आदि कर्तव्य-कर्मोंका आचरण करेंगे तो अन्य सब राजा भी ब्राह्मणोंका आदर करेंगे। शास्त्रोंके ज्ञानसे रहित मूढ़ मनुष्य भी यदि आपके नामका स्मरण करता है तो वह सम्पूर्ण पापोंके महासागरको पार करके परम पदको प्राप्त होता है। सभी
<sup>१</sup>यहाँ 'व्यास' शब्दका अर्थ शास्त्रकी व्याख्या करनेवाले विद्वान् महर्षि वसिष्ठ या अगस्त्य आदिका वाचक है, श्रीकृष्णद्वैपायनका नहीं; क्योंकि उस समयतक उनका प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। 'विस्तारो विग्रहो व्यासः' इस कोषके अनुसार 'व्याख्याकारक' अर्थ मानना सुसंगत है। पुराण आदि कथा बाचनेवाले ब्राह्मणको भी 'व्यास' कहते हैं; 'य एवं वाचयेद् विप्रः स ब्रह्मन् व्यास उच्यते।' इस पौराणिक वचनसे इसका समर्थन होता है।
पातालखण्ड ] * शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना * ४८७
वेदों और इतिहासोंका यह स्पष्ट सिद्धान्त है कि राम-नामका जो स्मरण किया जाता है, वह पापोंसे उद्धार करनेवाला है। श्रीरघुनाथजी! ब्रह्महत्या-जैसे पाप भी तभीतक गर्जना करते हैं, जबतक आपके नामोंका स्पष्टरूपसे उच्चारण नहीं किया जाता। महाराज! आपके नामोंकी गर्जना सुनकर महापातकरूपी गजराज कहीं छिपनेके लिये स्थान ढूँढ़ते हुए भाग खड़े होते हैं।* श्रीराम! आपकी कथा सुनकर सब लोग पवित्र हो जायँगे। पूर्वकालमें जब कि सत्ययुग चल रहा था, मैंने गङ्गातीरपर निवास करनेवाले पुराणवेत्ता ऋषियोंके मुखसे यह बात सुनी थी—'महान् पाप करनेके कारण कातर हृदयवाले पुरुषोंको तभीतक पापका भय बना रहता है जबतक वे अपनी जिह्वासे परम मनोहर राम-नामका उच्चारण नहीं करते।'† अतः श्रीरामचन्द्रजी! इस समय मैं धन्य हो गया। आपके दर्शनसे मेरे संसार-बन्धनका नाश सुलभ हो गया।'
मुनिके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने उनका पूजन किया। उस समय सभी महर्षि उन्हें साधुवाद देने लगे। इसी बीचमें वहाँ जो अत्यन्त आश्चर्यजनक घटना घटी, उसे मैं बतला रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ वात्स्यायन! तुम श्रीरामके भजनमें तत्पर रहनेवाले हो; मेरी बातोंको ध्यान देकर सुनो। आरण्यक मुनिको ध्यानमें श्रीरघुनाथजीका जैसा स्वरूप दिखायी देता था; उसी रूपमें महाराज श्रीरामचन्द्रजीको प्रत्यक्ष देखकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। वे वहाँ बैठे हुए महर्षियोंसे बोले—'मुनीश्वरो! आपलोग मेरे मनोहर वचन सुनें। भला, इस भूमण्डलमें मेरे-जैसा सौभाग्यशाली मनुष्य कौन होगा? श्रीरामचन्द्रजीने मुझे नमस्कार करके अपने श्रीमुखसे मेरा स्वागत एवं कुशल-समाचार पूछा है। अतः आज मेरी समानता करनेवाला न कोई है न हुआ है और न होगा। श्रुतियाँ भी जिनके चरणकमलोंकी रजको सदा ही ढूँढ़ा करती हैं, उन्हीं भगवान्ने आज मेरे चरणोंका जल पीकर अपनेको पवित्र माना है!'
ऐसा कहते-कहते उनका ब्रह्मरन्ध्र फूट गया तथा उससे जो तेज निकला वह श्रीरघुनाथजीमें समा गया। इस प्रकार सरयूके तटवर्ती यज्ञ-मण्डपमें सब लोगोंके देखते-देखते आरण्यक मुनिको सायुज्यमुक्ति प्राप्त हुई, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। उस समय आकाशमें तूर्य और वीणा आदि बाजे बजने लगे। भगवान्के आगे फूलोंकी वर्षा हुई। दर्शकोंके लिये यह विचित्र एवं अद्भुत घटना थी। मुनियोंने भी यह दृश्य देखकर मुनीश्वर आरण्यककी प्रशंसा करते हुए कहा—'ये मुनिश्रेष्ठ कृतार्थ हो गये! क्योंकि श्रीरघुनाथजीके स्वरूपमें मिल गये हैं।'
* त्वन्नामस्मरणान्मूढः सर्वशास्त्रविवर्जितः। सर्वपापाब्धिमुत्तीर्य स गच्छेत्परमं पदम्॥
सर्ववेदेतिहासानां सारार्थोऽयमिति स्फुटम्। यद्रामनामस्मरणं क्रियते पापतारकम्॥
तावद्गर्जन्ति पापानि ब्रह्महत्यासमानि च। न यावत्प्रोच्यते नाम रामचन्द्र तव स्फुटम्॥
त्वन्नामगर्जनं श्रुत्वा महापातककुञ्जराः। पलायन्ते महाराज कुत्रचित्स्थानलिप्सया॥ (३७। ५०—५३)
† तावत्पापभियः पुंसां कातराणां सुपापिनाम्। यावन्न वदते वाचा रामनाम मनोहरम्॥ (३७। ५६)
४८८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण, दोनों ओरकी सेनाओंमें युद्ध और पुष्कलके बाणसे राजा वीरमणिका मूर्छित होना
वात्स्यायन बोले— फणीश्वर ! जो भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेके लिये नाना प्रकारकी कीर्ति किया करते हैं, उन श्रीरघुनाथजीकी कथा सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती—अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है। वेदोंको धारण करनेवाले आरण्यक मुनि धन्य थे, जिन्होंने श्रीरघुनाथजीका दर्शन करके उनके सामने ही अपने नश्वर शरीरका परित्याग किया था। शेषजी ! अब यह बताइये कि महाराजका वह यज्ञ-सम्बन्धी अश्व वहाँसे किस ओर गया, किसने उसे पकड़ा तथा वहाँ रमानाथ श्रीरघुनाथजीकी कीर्तिका किस प्रकार विस्तार हुआ ?
शेषजीने कहा— ब्रह्मर्षे ! आपका प्रश्न बड़ा सुन्दर है। आप श्रीरघुनाथजीके सुने हुए गुणोंको भी नहीं सुने हुएके समान मानकर उनके प्रति अपना लोभ प्रकट करते हैं और बारम्बार उन्हें पूछते हैं। अच्छा, अब आगेकी कथा सुनिये। बहुततेरे सैनिकोंसे घिरा हुआ वह घोड़ा आरण्यक मुनिके आश्रमसे बाहर निकला और नर्मदाके मनोहर तटपर भ्रमण करता हुआ देवनिर्मित देवपुर नामक नगरमें जा पहुँचा। जहाँ मनुष्योंके घरोंकी दीवारें स्फटिक मणिकी बनी हुई थीं तथा वे गृह अपनी ऊँचाईके कारण हाथियोंसे भरे हुए विन्ध्याचल पर्वतका उपहास करते थे। वहाँकी प्रजाके घर भी चाँदीके बने हुए दिखायी देते थे तथा उनके गोपुर नाना प्रकारके माणिक्योंद्वारा बने हुए थे; जिनमें भाँति-भाँतिकी विचित्र मणियाँ जड़ी हुई थीं। उस नगरमें महाराज वीरमणि राज्य करते थे, जो धर्मात्माओंमें अग्रगण्य थे। उनका विशाल राज्य सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न था। राजाके पुत्रका नाम था रुक्माङ्गद। वह महान् शूरवीर और बलवान् था। एक दिन वह सुन्दर शरीरवाली रमणियोंके साथ विहार करनेके लिये वनमें गया और वहाँ प्रसन्नचित्त होकर मधुर वाणीमें मनोहर गान करता हुआ विचरने लगा। इसी समय परम बुद्धिमान् राजाधिराज श्रीरामचन्द्रजीका वह शोभाशाली अश्व उस वनमें आ पहुँचा। उसके ललाटमें स्वर्णपत्र बँधा हुआ था। शरीरका रंग गङ्गाजलके समान स्वच्छ था। परन्तु केसर और कुङ्कुमसे चर्चित होनेके कारण कुछ पीला दिखायी देता था। वह अपनी तीव्र गतिसे वायुके वेगको भी तिरस्कृत कर रहा था। उसका स्वरूप अत्यन्त कौतूहलसे भरा हुआ था। उसे देखकर राजकुमारकी स्त्रियोंने कहा—'प्रियतम ! स्वर्णपत्रसे शोभा पानेवाला यह महान् अश्व किसका है ? यह देखनेमें बड़ा सुन्दर है। आप इसे बलपूर्वक पकड़ लें।'
राजकुमारके नेत्र लीलायुक्त चितवनके कारण बड़े सुन्दर जान पड़ते थे। उसने स्त्रियोंकी बातें सुनकर खेल-सा करते हुए एक ही हाथसे घोड़ेको पकड़ लिया। उसके भालपत्रपर स्पष्ट अक्षर लिखे हुए थे। राजकुमार उसे बाँचकर हँसा और उस महिला-मण्डलमें इस प्रकार बोला—'अहो ! शौर्य और सम्पत्तिमें मेरे पिता महाराज वीरमणिकी समानता करनेवाला इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है, तथापि उनके जीते-जी ये राजा रामचन्द्र इतना अहङ्कार कैसे धारण करते हैं ? पिनाकधारी भगवान् शङ्कर जिनकी सदा रक्षा करते रहते हैं तथा देवता, दानव और यक्ष—अपने मणिमय मुकुटोंद्वारा जिनके चरणोंकी वन्दना किया करते हैं, वे महाबली मेरे पिताजी ही इस घोड़ेके द्वारा अश्वमेध यज्ञ करें। इस समय यह घुड़सालमें जाय और मेरे सैनिक इसे ले जाकर वहाँ बाँध दें।' इस प्रकार उस घोड़ेको पकड़कर राजा वीरमणिका ज्येष्ठ पुत्र रुक्माङ्गद अपनी पत्नियोंके साथ नगरमें आया। उस समय उसके मनमें बड़ा उत्साह भरा हुआ था। उसने पितासे जाकर कहा—'मैं रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रका घोड़ा ले आया हूँ। यह इच्छानुसार चलनेवाला अद्भुत अश्व अश्वमेध यज्ञके लिये छोड़ा गया था। रामके भाई शत्रुघ्न अपनी विशाल सेनाके साथ इसकी रक्षाके लिये आये हैं।' महाराज वीरमणि बड़े
पातालखण्ड ] * देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण * ४८९
'बुद्धिमान् थे। पुत्रकी बात सुनकर उन्होंने उसके कार्यकी प्रशंसा नहीं की। सोचा कि 'यह घोड़ा लेकर चुपकेसे चला आया है। इसका यह कार्य तो चोरके समान है।' अद्भुत कर्म करनेवाले भगवान् शङ्कर राजाके इष्टदेव थे। उनसे राजाने सारा हाल कह सुनाया।
तब भगवान् शिवने कहा—राजन् ! तुम्हारे पुत्रने बड़ा अद्भुत काम किया है। यह परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामचन्द्रके महान् अश्वको हर लाया है, जिनका मैं अपने हृदयमें ध्यान करता हूँ, जिह्वासे जिनके नामका उच्चारण करता हूँ, उन्हीं श्रीरामके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका तुम्हारे पुत्रने अपहरण किया है। परन्तु इस युद्धक्षेत्रमें एक बहुत बड़ा लाभ यह होगा कि हमलोग भक्तोंद्वारा सेवित श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंका दर्शन कर सकेंगे। परन्तु अब हमें अश्वकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करना होगा। इतनेपर भी मुझे संदेह है कि शत्रुघ्नके सैनिक मेरे द्वारा रक्षा किये जानेपर भी इसे बलपूर्वक पकड़ ले जायेंगे। इसलिये महाराज [मैं तो यही सलाह दूँगा कि] तुम विनीत होकर जाओ और राज्यसहित इस सुन्दर अश्वको भगवान्की सेवामें अर्पण करके उनके चरणोंका दर्शन करो।
वीरमणि बोले—भगवन् ! क्षत्रियोंका यह धर्म है कि वे अपने प्रतापकी रक्षा करें, अतः हर एक मानी पुरुषके लिये अपने प्रतापकी रक्षा करना कर्तव्य है; इसके लिये उसे अपनी शक्तिभर पराक्रम करना चाहिये। आवश्यकता हो तो शरीरको भी होम देना चाहिये। सहसा किसीकी शरणमें जानेसे शत्रु उपहास करते हैं। वे कहते हैं—'यह कायर है, राजाओंमें अधम है, क्षुद्र है। इस नीचने भयसे विह्वल होकर अनार्यपुरुषोंकी भाँति शत्रुके चरणोंमें मस्तक झुकाया है।' अतः अब युद्धका अवसर उपस्थित हो गया है। इस समय जैसा उचित हो, वही आप करें। कर्तव्यका विचार करके आपको अपने इस भक्तकी रक्षा करनी चाहिये।
शेषजी कहते हैं—राजाकी बात सुनकर भगवान् चन्द्रमौलि अपनी मेघके समान गम्भीर वाणीसे उनका मन लुभाते हुए हँसकर बोले—'राजन् ! यदि तैंतीस करोड़ देवता भी आ जायँ तो भी किसमें इतनी शक्ति है जो मेरे द्वारा रक्षित रहनेपर तुमसे घोड़ा ले सके। यदि साक्षात् भगवान् यहाँ आकर अपने स्वरूपकी झाँकी करायेंगे तो मैं उनके कोमल चरणोंमें मस्तक झुकाऊँगा; क्योंकि सेवकका स्वामीके साथ युद्ध करना बहुत बड़ा अन्याय बताया गया है। शेष जितने वीर हैं, वे मेरे लिये तिनकेके समान हैं—कुछ भी नहीं कर सकते। अतः राजेन्द्र ! तुम युद्ध करो, मैं तुम्हारा रक्षक हूँ। मेरे रहते कौन ऐसा वीर है जो बलपूर्वक घोड़ा ले जा सके ? यदि त्रिलोकी भी संगठित होकर आ जाय तो मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती।'
इधर श्रीरघुनाथजीके जितने सैनिक थे, वे अश्वका मार्ग ढूँढ़ रहे थे। इतनेहीमें महाराज शत्रुघ्न भी अपनी विशाल सेनाके साथ आ पहुँचे। आते ही उन्होंने सभी सेवकोंसे प्रश्न किया—'कहाँ है मेरा अश्व ? स्वर्णपत्रसे सुशोभित वह यज्ञ-सम्बन्धी घोड़ा इस समय दिखायी क्यों नहीं देता ?' उनकी बात सुनकर अश्वके पीछे चलनेवाले सेवकोंने कहा—'नाथ ! उस मनके समान तीव्रगामी अश्वको इस जंगलमें किसीने हर लिया। हमें भी वह कहीं दिखायी नहीं देता।' सेवकोंके वचन सुनकर राजा शत्रुघ्नने सुमतिसे पूछा—'मन्त्रिवर ! यहाँ कौन राजा निवास करता है ? हमें अश्वकी प्राप्ति कैसे होगी ? जिसने आज हमारे अश्वका अपहरण किया है, उस राजाके पास कितनी सेना है ?' इस प्रकार शत्रुघ्नजी मन्त्रीके साथ परामर्श कर रहे थे, इतनेहीमें देवर्षि नारद युद्ध देखनेके लिये उत्सुक होकर वहाँ आये। शत्रुघ्नने उन्हें स्वागत-सत्कारसे सन्तुष्ट किया। वे बातचीत करनेमें बड़े चतुर थे; अतः अपनी वाणीसे नारदजीको प्रसन्न करते हुए बोले—'महामते ! बताइये, मेरा अश्व कहाँ है ? उसका कुछ पता नहीं चलता। मेरे कार्य-कुशल अनुचर भी उसके मार्गका अनुसन्धान नहीं कर पाते।'
नारदजी वीणा बजाते और श्रीराम-कथाका बारम्बार गान करते हुए बोले—'राजन् ! यहाँ देवपुर नामका नगर है उसमें वीरमणि नामसे विख्यात एक बहुत बड़े राजा रहते हैं। उनका पुत्र इस वनमें आया था, उसीने
४९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
अश्वको पकड़ लिया है। आज उस राजाके साथ तुमलोगोंका बड़ा भयङ्कर युद्ध होगा। उसमें बड़े-बड़े बलवान् और शूरवीर मारे जायँगे। इसलिये तुम पूरी तैयारीके साथ यहाँ स्थिरतापूर्वक खड़े रहो तथा सेनाका ऐसा व्यूह बनाओ; जिसमें शत्रुके सैनिकोंका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन हो। श्रेष्ठ राजा वीरमणिसे युद्ध करते समय तुम्हें बड़ी कठिनाइयोंका सामना करना पड़ेगा; तथापि अन्तमें विजय तुम्हारी ही होगी। भला, सम्पूर्ण जगत्में कौन ऐसा वीर है, जो भगवान् श्रीरामको पराजित कर सके।' ऐसा कहकर नारदजी वहाँसे अन्तर्धान हो गये और देवता तथा दानवोंके समान उन दोनों पक्षोंका भयङ्कर युद्ध देखनेके लिये आकाशमें ठहर गये।
उधर शूरशिरोमणि राजा वीरमणिने रिपुवार नामक सेनापतिको बुलाया और उसे अपने नगरमें ढिंढोरा पिटवानेका आदेश दिया। सेनापतिने राजाकी आज्ञाका पालन किया। प्रत्येक घर, गली और सड़कपर डंकेकी आवाज सुनायी देने लगी। लोगोंको जो घोषणा सुनायी गयी, वह इस प्रकार थी— 'राजधानीमें जो-जो वीर उपस्थित हैं, वे सभी शत्रुघ्नपर चढ़ाई करें। जो लोग वीरताके अभिमानमें आकर राजाज्ञाका उल्लङ्घन करेंगे, वे महाराजके पुत्र या भाई ही क्यों न हों, वधके योग्य समझे जायँगे। फिरसे डंका बजाकर उपर्युक्त घोषणा दुहराई जाती है—सभी वीर सुन लें और सुनकर शीघ्र ही अपने कर्तव्यका पालन करें। विलम्ब नहीं होना चाहिये।' नरश्रेष्ठ वीरमणिके सैनिक श्रेष्ठ योद्धा थे। उन्होंने यह घोषणा अपने कानों सुनी और कवच आदिसे सुसज्जित होकर वे महाराजके पास गये। उनकी दृष्टिमें युद्ध एक महान् उत्सवके समान था; उसका अवसर पाकर उनका हृदय हर्ष और उत्साहसे भर गया था। राजकुमार रुक्माङ्गद भी अपने मनके समान वेगशाली रथपर सवार होकर आये। उनके छोटे भाई शुभाङ्गद भी अपने सुन्दर शरीरपर बहुमूल्य रत्नमय कवच धारण करके रणोत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये प्रस्थित हुए। महाराजके भाईका नाम था वीरसिंह। वे सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें प्रवीण थे। राजाज्ञाके अनुसार वे भी दरबारमें गये; क्योंकि महाराजका शासन कोई लाँघ नहीं सकता था। राजाका भानजा बलमित्र भी उपस्थित हुआ तथा सेनापति रिपुवारने भी चतुरङ्गिणी सेना तैयार करके महाराजको इसकी सूचना दी।
तदनन्तर राजा वीरमणि सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरे हुए अपने श्रेष्ठ रथपर सवार हुए। वह रथ बहुत ऊँचा था और उसके ऊँचे-ऊँचे पहिये मणियोंके बने हुए थे। चारों ओरसे भेरियाँ बज उठीं। उनके बजानेवाले बहुत अच्छे थे। भेरी बजते ही राजाकी सेना संग्रामके लिये प्रस्थित हुई। सर्वत्र कोलाहल छा गया। महाराज वीरमणि युद्धके उत्साहसे युक्त होकर रणक्षेत्रकी ओर गये। राजाकी सेना आ पहुँची। शस्त्र-सञ्चालनमें चतुर रथियोंके द्वारा समूची सेनामें महान् कोलाहल छा रहा है, यह देखकर शत्रुघ्नने सुमतिसे कहा— 'मन्त्रिवर ! मेरे अश्वको पकड़नेवाले बलवान् राजा वीरमणि मुझसे युद्ध करनेके लिये विशाल चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आ गये; अब किस तरह युद्ध आरम्भ करना चाहिये। कौन-कौन महाबली योद्धा इस समय युद्ध करेंगे? उन सबको आदेश दो; जिससे इस संग्राममें हमें मनोवाञ्छित विजय प्राप्त हो।'
पातालखण्ड ] * देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण * ४९१
सुमतिने कहा— स्वामिन्! वीर पुष्कल श्रेष्ठ अस्त्रोंके ज्ञाता हैं; इस समय ये ही युद्ध करें। नीलरत्न आदि दूसरे योद्धा भी संग्राममें कुशल हैं; अतः वे भी लड़ सकते हैं। आपको तो भगवान् शङ्कर अथवा राजा वीरमणिके साथ ही युद्ध करना चाहिये। वे राजा बड़े बलवान् और पराक्रमी हैं; उन्हें द्वन्द्वयुद्धके द्वारा जीतना चाहिये। इस उपायसे काम लेनेपर आपकी विजय होगी। इसके बाद आपको जैसा जँचे, वैसा ही कीजिये; क्योंकि आप तो स्वयं ही परम बुद्धिमान् हैं।
मन्त्रीकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले शत्रुघ्नने युद्धके लिये निश्चय किया और श्रेष्ठ योद्धाओंको लड़नेकी आज्ञा दी। संग्रामके लिये उनकी आज्ञा सुनकर युद्ध-कुशल वीर अत्यन्त उत्साहसे भर गये और शत्रुसैनिकोंके साथ युद्ध करनेके लिये चले। वे हाथोंमें धनुष धारण किये युद्धके मैदानमें दिखायी दिये और बाणोंकी बौछार करके बहुतेरे विपक्षी योद्धाओंको विदीर्ण करने लगे। उनके द्वारा अपने सैनिकोंका संहार सुनकर मणिमय रथपर बैठा हुआ बलवान् राजकुमार रुक्माङ्गद उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा। उसने अपने अनेकों बाणोंकी मारसे शत्रुपक्षके हजारों वीरोंको उद्विग्न कर दिया। उनमें हाहाकार मच गया। राजकुमार बलवान् था; उसने बल, यश और सम्पत्तिमें अपनी समानता रखनेवाले शत्रुघ्न तथा भरत-कुमार पुष्कलको युद्धके लिये ललकारा— 'वीररत्न! मुझसे युद्ध करनेके लिये आओ। इन करोड़ों मनुष्योंको डराने या मारनेसे क्या लाभ? मेरे साथ घोर संग्राम करके विजय प्राप्त करो।'
रुक्माङ्गदके ऐसा कहनेपर बलवान् वीर पुष्कल हँस पड़े। उन्होंने अपने तीखे बाणोंसे राजकुमारकी छातीमें बड़े वेगसे प्रहार किया। राजकुमार शत्रुके इस पराक्रमको नहीं सह सका। उसने अपने महान् धनुषपर बाणोंका सन्धान किया और दस सायकोंसे वीर पुष्कलकी छातीको बींध डाला। दोनों ही युद्धमें एक दूसरेपर कुपित थे। दोनोंहीके हृदयमें विजयकी अभिलाषा थी। रुक्माङ्गदने पुष्कलसे कहा—'वीर! अब तुम बलपूर्वक किया हुआ मेरा पराक्रम देखो। संभलकर बैठ जाओ, मैं तुम्हारे रथको आकाशमें उड़ाता हूँ।' ऐसा कहकर उसने मन्त्र पढ़ा और पुष्कलके रथपर भ्रामकास्त्रका प्रयोग किया। उस बाणसे आहत होकर पुष्कलका रथ चक्कर काटता हुआ एक योजन दूर जा पड़ा। सारथिने बड़ी कठिनाईसे रथको रोका तो भी वह पृथ्वीपर ही चक्कर लगाता रहा। किसी तरह पूर्वस्थानपर रथको ले जाकर उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता पुष्कलने कहा—'राजकुमार! तुम्हारे जैसे वीर पृथ्वीपर रहनेके योग्य नहीं हैं। तुम्हें तो इन्द्रकी सभामें रहना चाहिये; इसलिये अब देवलोकको ही चले जाओ।' ऐसा कहकर उन्होंने आकाशमें उड़ा देनेवाले महान् अस्त्रका प्रयोग किया। उस बाणकी चोटसे रुक्माङ्गदका रथ सीधे आकाशमें उड़ चला और समस्त लोकोंको लाँघता हुआ सूर्यमण्डलतक जा पहुँचा। वहाँकी प्रचण्ड ज्वालासे राजकुमारका रथ घोड़े और सारथिसहित दग्ध हो गया तथा वह स्वयं भी सूर्यकी किरणोंसे झुलस जानेके कारण बहुत दुःखी हो गया। अन्तमें वह दग्ध होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय युद्धके अग्रभागमें महान् हाहाकार मचा। राजा वीरमणि अपने पुत्रको मूर्च्छित देखकर क्रोधमें भर गये और रणभूमिके मध्यभागमें खड़े हुए पुष्कलकी ओर चले।
इधर कपिवर हनुमान्जीने जब देखा कि समुद्रके समान विशाल सेनाके भीतर स्थित हुए राजा वीरमणि भरतकुमार पुष्कलको ललकार रहे हैं तब वे उनकी ओर दौड़े। उन्हें आते देख पुष्कलने कहा—'महाकपे! आप क्यों युद्धभूमिमें लड़नेके लिये आ रहे हैं? राजा वीरमणिकी यह सेना है ही कितनी! मैं तो इसे बहुत थोड़ी—अत्यन्त तुच्छ समझता हूँ। जिस प्रकार आपने भगवान् श्रीरामकी कृपासे राक्षस-सेनारूपी समुद्रको पार किया था, उसी प्रकार मैं भी श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके इस दुस्तर संकटके पार हो जाऊँगा। जो लोग दुस्तर अवस्थामें पड़कर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हैं, उनका दुःखरूपी समुद्र सूख जाता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है; इसलिये महावीर! आप चाचा शत्रुघ्नके
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- अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
पास जाइये। मैं अभी एक क्षणमें राजा वीरमणिको जीतकर आ रहा हूँ।'
हनुमान्जी बोले—बेटा ! राजा वीरमणिसे भिड़नेका साहस न करो। ये दानी, शरणागतकी रक्षामें कुशल, बलवान् और शौर्यसे शोभा पानेवाले हैं। तुम अभी बालक हो और राजा वृद्ध। ये सम्पूर्ण अस्त्र-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। इन्होंने युद्धमें अनेकों शूरवीरोंको परास्त किया है। तुम्हें मालूम होना चाहिये कि भगवान् सदाशिव इनके रक्षक हैं और सदा इनके पास रहते हैं। वे राजाकी भक्तिके वशीभूत होकर इनके नगरमें पार्वती-सहित निवास करते हैं।
पुष्कलने कहा—कपिश्रेष्ठ ! माना कि राजाने भगवान् शङ्करको भक्तिसे वशमें करके अपने नगरमें स्थापित कर रखा है; परन्तु भगवान् शङ्कर स्वयं जिनकी आराधना करके सर्वोत्कृष्ट स्थानको प्राप्त हुए हैं, वे श्रीरघुनाथजी मेरा हृदय छोड़कर कहीं नहीं जाते। जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं, वहीं सम्पूर्ण चराचर जगत् है; अतः मैं राजा वीरमणिको युद्धमें जीत लूँगा।
धीरतापूर्वक कही हुई पुष्कलकी ऐसी वाणी सुनकर हनुमान्जी राजाके छोटे भाई वीरसिंहसे युद्ध करनेके लिये चले गये। पुष्कल द्वैरथ-युद्धमें कुशल थे और सुवर्णजटित रथपर विराजमान थे। वे राजाको ललकारते देख उनका सामना करनेके लिये गये। उन्हें आया देखकर राजा वीरमणिने कहा—'बालक ! मेरे सामने न आओ, मैं इस समय क्रोधमें भरा हूँ; युद्धमें मेरा क्रोध और भी बढ़ जाता है; यदि प्राण बचानेकी इच्छा हो तो लौट जाओ। मेरे साथ युद्ध मत करो।' राजाका यह वचन सुनकर पुष्कलने कहा— 'राजन् ! आप युद्धके मुहानेपर सँभलकर खड़े होइये। मैं श्रीरामका भक्त हूँ; मुझे कोई युद्धमें जीत नहीं सकता, चाहे वह इन्द्र-पदका ही अधिकारी क्यों न हो।' पुष्कलका ऐसा वचन सुनकर राजाओंमें अग्रगण्य वीरमणि उन्हें निरा बालक समझकर हँसने लगे, तत्पश्चात् उन्होंने अपना क्रोध प्रकट किया। राजाको कुपित जानकर रणोन्मत्त वीर भरतकुमारने उनकी छातीमें बीस तीखे बाणोंका प्रहार किया। उन बाणोंको आते देख राजाने अत्यन्त कुपित होकर अपने तीक्ष्ण सायकोंसे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। बाणोंका काटा जाना देख शत्रु-वीरोंका विनाश करनेवाले भरतकुमारके हृदयमें बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने तीन बाणोंसे राजाके ललाटको बींध डाला। उन बाणोंकी चोटसे राजाको बड़ी व्यथा हुई। वे प्रचण्ड क्रोधमें भर गये और वीर पुष्कलकी छातीमें उन्होंने नौ बाण मारे। तब तो पुष्कलका क्रोध भी बढ़ा। उन्होंने तीखे पर्ववाले सौ बाण मारकर तुरंत ही राजाको घायल कर दिया। उन बाणोंके प्रहारसे राजाका कवच, किरीट, शिरस्त्राण तथा रथ—सभी छिन्न-भिन्न हो गये। तब वीरमणि दूसरे रथपर सवार होकर भरत-कुमारके सामने आये और बोले—'श्रीरामचन्द्रजीके चरण-कमलोंमें भ्रमरके समान अनुराग रखनेवाले वीर पुष्कल ! तुम धन्य हो !' ऐसा कहकर अस्त्र-विद्यामें कुशल राजाने उनपर असंख्य बाणोंका प्रहार किया। वहाँ पृथ्वीपर और दिशाओंमें उनके बाणोंके सिवा दूसरा कुछ नहीं दिखायी देता था। अपनी सेनाका यह संहार देखकर रथियोंमें अग्रगण्य पुष्कलने भी शत्रुपक्षके योद्धाओंका विनाश आरम्भ किया। हाथियोंके मस्तक विदीर्ण होने लगे, उनके मोती बिखर-बिखरकर गिरने लगे। उस समय क्रोधमें भरे हुए पुष्कलने राजा वीरमणिको सम्बोधित करके शङ्ख बजाकर निर्भयतापूर्वक कहा—'राजन् ! आप वृद्ध होनेके कारण मेरे मान्य हैं, तथापि इस समय युद्धमें मेरा महान् पराक्रम देखिये। वीरवर ! यदि तीन बाणोंसे मैं आपको मूर्च्छित न कर दूँ तो जो महापापी मनुष्य पापहारिणी गङ्गाजीके तटपर जाकर भी उनकी निन्दा करके उनके जलमें डुबकी नहीं लगाता, उसको लगने-वाला पाप मुझे ही लगे।'
यह कहकर पुष्कलने राजाके महान् वक्षःस्थलको, जो किवाड़ोंके समान विस्तृत था निशाना बनाया और एक अग्निके समान तेजस्वी एवं तीक्ष्ण बाण छोड़ा। किन्तु राजाने अपने बाणसे पुष्कलके उस बाणके दो टुकड़े कर डाले। उनमेंसे एक टुकड़ा तो भूमण्डलको प्रकाशित करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा और दूसरा
पातालखण्ड ] * हनुमान्जीके द्वारा वीरसिंहकी पराजय और वीरमणिका आत्मसमर्पण * ४९३
राजाके रथपर गिरा। तब पुष्कलने अपना मातृ-भक्तिजनित पुण्य अर्पण करके दूसरा बाण चलाया; किन्तु राजाने अपने महान् बाणसे उसको भी काट दिया। इससे पुष्कलके मनमें बड़ा खेद हुआ। वे सोचने लगे—'अब क्या करना चाहिये ?' इतनेहीमें उन्हें एक उपाय सूझ गया। वे श्रेष्ठ अस्त्रोंके ज्ञाता तो थे ही, अपनी पीड़ा दूर करनेवाले श्रीरघुनाथजीका उन्होंने मन-ही-मन स्मरण किया और तीसरा बाण छोड़ दिया। वह बाण सर्पके समान विषैला और सूर्यके समान प्रज्वलित था। उसने राजाकी छातीमें चोट पहुँचाकर उन्हें मूर्च्छित कर दिया। राजाके मूर्च्छित होते ही उनकी सारी सेना हाहाकार मचाती हुई भाग चली और पुष्कल विजयी हुए।
हनुमान्जीके द्वारा वीरसिंहकी पराजय, वीरभद्रके हाथसे पुष्कलका वध, शङ्करजीके द्वारा शत्रुघ्नका मूर्च्छित होना, हनुमान्के पराक्रमसे शिवका संतोष, हनुमान्जीके उद्योगसे मरे हुए वीरोंका जीवित होना, श्रीरामका प्रादुर्भाव और वीरमणिका आत्मसमर्पण
शेषजी कहते हैं—मुने ! हनुमान्जीने वीरसिंहके पास जाकर कहा—'वीरवर ! ठहरो, कहाँ जाते हो ? मैं एक ही क्षणमें तुम्हें परास्त करूँगा।' वानरके मुखसे ऐसी बढ़ी-चढ़ी बात सुनकर वीरसिंह क्रोधमें भर गये और मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले धनुषको खींचकर तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा करने लगे। उस समय रणभूमिमें उनकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो आषाढ़के महीनेमें धारावाहिक वृष्टि करनेवाला मनोहर मेघ शोभा पा रहा हो। उन तीखे बाणोंको अपने शरीरपर लगते देख हनुमान्जीने वज्रके समान मुक्का वीरसिंहकी छातीमें मारा। मुष्टिका-प्रहार होते ही वे मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़े। अपने चाचाको मूर्च्छित देख राजकुमार शुभाङ्गद वहाँ आ पहुँचा। रुक्माङ्गदकी भी मूर्च्छा दूर हो चुकी थी; अतः वह भी युद्ध क्षेत्रमें आ धमका। वे दोनों भाई भयङ्कर संग्राम करते हुए हनुमान्जीके पास गये। उन दोनों वीरोंको समर-भूमिमें आया देख हनुमान्जीने उन्हें रथ और धनुषसहित अपनी पूँछमें लपेट लिया और पृथ्वीपर बड़े वेगसे पटका। इससे वे दोनों राजकुमार तत्काल मूर्च्छित हो गये। इसी प्रकार बलमित्र भी सुमंदके साथ बहुत देरतक युद्ध करके अन्तमें मूर्च्छाको प्राप्त हुए।
तदनन्तर, अपने आत्मीय जनोंको मूर्च्छित देख भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाले भगवान् महेश्वर स्वयं ही उस विशाल सेनामें शत्रुघ्नके सैनिकोंके साथ युद्ध करनेके लिये गये। उनका उद्देश्य था भक्तोंकी रक्षा करना। वे पूर्वकालमें जैसे त्रिपुरसे युद्ध करनेके लिये गये थे, उसी प्रकार वहाँ भी अपने पार्षदों और प्रमथ-गणोंसहित पृथ्वीतलको कँपाते हुए जा पहुँचे। महाबली शत्रुघ्नने जब देखा कि सर्वदेवशिरोमणि साक्षात् महेश्वर पधारे हैं, तब वे भी उनका सामना करनेके लिये रणभूमिमें गये। शत्रुघ्नको आया देख पिनाकधारी रुद्रने वीरभद्रसे कहा—'तुम मेरे भक्तको पीड़ा देनेवाले पुष्कलसे युद्ध करो।' फिर नन्दीको उन्होंने महाबली हनुमान्से लड़नेके लिये भेजा। तदनन्तर कुशध्वजके पास प्रचण्डको, सुबाहुके पास भृङ्गीको और सुमंदके पास चण्डनामक अपने गणको भेजकर युद्धके लिये आदेश दिया। महारुद्रके प्रधान गण वीरभद्रको आया देख पुष्कल अत्यन्त उत्साहपूर्वक उनसे युद्ध करनेको आगे बढ़े। उन्होंने पाँच बाणोंसे वीरभद्रको घायल किया। उनके बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर वीरभद्रने त्रिशूल हाथमें लिया; किन्तु महाबली पुष्कलने एक ही क्षणमें उस त्रिशूलको काटकर विकट गर्जना की। अपने त्रिशूलको कटा देख रुद्रके अनुगामी महाबली वीरभद्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने महारथी पुष्कलके रथको तोड़ डाला। वीरभद्रके वेगसे चकनाचूर हुए रथको त्याग कर महाबली पुष्कल पैदल हो गये
४९४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
और वीरभद्रको मुक्केसे मारने लगे। फिर दोनोंने एक दूसरेपर मुष्टिप्रहार आरम्भ किया। दोनों ही परस्पर विजयके अभिलाषी और एक-दूसरेके प्राण लेनेको उतारू थे। इस प्रकार रात-दिन लगातार युद्ध करते उन्हें चार दिन व्यतीत हो गये। पाँचवें दिन पुष्कलको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने वीरभद्रका गला पकड़कर उन्हें पृथ्वीपर दे मारा। उनके प्रहारसे महाबली वीरभद्रको बड़ी पीड़ा हुई। फिर उन्होंने भी पुष्कलके पैर पकड़कर उन्हें बारम्बार घुमाया और पृथ्वीपर पछाड़कर मार डाला। महाबली वीरभद्रने पुष्कलके मस्तकको, जिसमें कुण्डल जगमगा रहे थे, त्रिशूलसे काट दिया। इसके बाद वे जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। यह देखकर सभी लोग थर्रा उठे। रणभूमिमें जो युद्ध-कुशल वीर थे, उन्होंने वीरभद्रके द्वारा पुष्कलके मारे जानेका समाचार शत्रुघ्नसे कहा।
पुष्कलके वधका वृत्तान्त सुनकर महावीर शत्रुघ्नको बड़ा दुःख हुआ। वे शोकसे काँप उठे। उन्हें दुःखी जानकर भगवान् शङ्करने कहा—'रे शत्रुघ्न ! तू युद्धमें शोक न कर। वीर पुष्कल धन्य है, जिसने महाप्रलयकारी वीरभद्रके साथ पाँच दिनोतक युद्ध किया। ये वीरभद्र वे ही हैं, जिन्होंने मेरे अपमान करनेवाले दक्षको क्षणभरमें मार डाला था; अतः महाबलवान् राजेन्द्र ! तू शोक त्याग दे और युद्ध कर। शत्रुघ्नने शोक छोड़ दिया। उन्हें शङ्करके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने चढ़ाये हुए धनुषको हाथमें लेकर महेश्वरपर बाणोंका प्रहार आरम्भ किया। उधरसे शङ्करने भी बाण छोड़े। दोनोंके बाण आकाशमें छा गये। बाण-युद्धमें दोनोंकी क्षमता देखकर सब लोगोंको यह विश्वास हो गया कि अब सबको मोहमें डालनेवाला लोक-संहारकारी प्रलयकाल आ पहुँचा। दर्शक कहने लगे—'ये तीनों लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलय करनेवाले रुद्र हैं, तो वे भी महाराज श्रीरामचन्द्रके छोटे भाई हैं। न् जाने क्या होगा। इस भूत़लपर किसकी विजय होगी?'
इस प्रकार शत्रुघ्न और शिवमें ग्यारह दिनोंतक परस्पर युद्ध होता रहा। बारहवें दिन राजा शत्रुघ्नने क्रोधमें भरकर महादेवजीका वध करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया, किन्तु महादेवजी उस महान् अस्त्रको हँसते-हँसते पी गये। इससे शत्रुघ्नको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे—'अब क्या करना चाहिये?' वे इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि देवाधिदेवोंके शिरोमणि भगवान् शिवने शत्रुघ्नकी छातीमें एक अग्निके समान तेजस्वी बाण भोंक दिया। उससे मूर्च्छित होकर शत्रुघ्न रणभूमिमें गिर पड़े। उस समय योद्धाओंसे भरी हुई उनकी सारी सेनामें हाहाकार मच गया। शत्रुघ्नको बाणोंसे पीड़ित एवं मूर्च्छित होकर गिरा देख हनुमान्जीने पुष्कलके शरीरको रथपर सुला दिया और सेवकोंको उनकी रक्षामें तैनात करके वे स्वयं संहारकारी शिवसे युद्ध करनेके लिये आये। हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके अपने पक्षके योद्धाओंका हर्ष बढ़ाते हुए रोषके मारे अपनी पूँछको जोर-जोरसे हिला रहे थे।
युद्धके मुहानेपर रुद्रके समीप पहुँचकर महावीर हनुमान्जी देवाधिदेव महादेवजीका वध करनेकी इच्छासे बोले—'रुद्र ! तुम रामभक्तका वध करनेके लिये उद्यत होकर धर्मके प्रतिकूल आचरण कर रहे हो; इसलिये मैं तुम्हें दण्ड देना चाहता हूँ। मैंने पूर्वकालमें वैदिक ऋषियोंके मुँहसे अनेकों बार सुना है कि पिनाकधारी रुद्र सदा ही श्रीरघुनाथजीके चरणोंका स्मरण करते रहते हैं; किन्तु वे सभी बातें आज झूठी साबित हुईं। क्योंकि तुमने राम भक्त शत्रुघ्नके साथ युद्ध किया है।' हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर महेश्वर बोले—'कपिश्रेष्ठ ! तुम वीरोंमें प्रधान और धन्य हो। तुमने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। देवदानव-वन्दित ये भग .न् श्रीरामचन्द्रजी वास्तवमें मेरे स्वामी हैं। किन्तु मेरा भक्त वीरमणि उनके अश्वको ले आया है और उस अश्वके रक्षक शत्रुघ्न, जो शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले हैं, इसके ऊपर चढ़ आये हैं। इस अवस्थामें मैं वीरमणिकी भक्तिके वशीभूत होकर उसकी रक्षाके लिये आया हूँ; क्योंकि भक्त अपना ही स्वरूप होता है। अतः जिस किसी तरह भी सम्भव हो, उसकी रक्षा करनी चाहिये; यही मर्यादा है।'
चण्डीपति भगवान् शङ्करके ऐसा कहनेपर हनुमान्जी बहुत कुपित हुए और उन्होंने एक बड़ी शिला
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लेकर उसे उनके रथपर दे मारा। शिलाका आघात पाकर महादेवजीका रथ घोड़े, सारथि, ध्वजा और पताकासहित चूर-चूर हो गया। शिवजीको रथहीन देखकर नन्दी दौड़े हुए आये और बोले—‘भगवन्! मेरी पीठपर सवार हो जाइये।’ भूतनाथको वृषभपर आरूढ़ देख हनुमान्जीका क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने शालका वृक्ष उखाड़कर बड़े वेगसे उनकी छातीपर प्रहार किया। उसकी चोट खाकर भगवान् भूतनाथने एक तीखा शूल हाथमें लिया, जिसकी तीन शिखाएँ थीं तथा जो अग्निकी ज्वालाकी भाँति जाज्वल्यमान हो रहा था। अग्नितुल्य तेजस्वी उस महान् शूलको अपनी ओर आते देख हनुमान्जीने वेगपूर्वक हाथसे पकड़ लिया और उसे क्षणभरमें तिल-तिल करके तोड़ डाला। कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने जब वेगके साथ त्रिशूलके टुकड़े-टुकड़े कर डाले, तब भगवान् शिवने तुरंत ही शक्ति हाथमें ली, जो सब-की-सब लोहेकी बनी हुई थी। शिवजीकी चलायी हुई वह शक्ति बुद्धिमान् हनुमान्जीकी छातीमें आ लगी। इससे वे कपिश्रेष्ठ क्षणभर बड़े विकल रहे। फिर एक ही क्षणमें उस पीड़ाको सहकर उन्होंने एक भयङ्कर वृक्ष उखाड़ लिया और बड़े-बड़े नागोंसे विभूषित महादेवजीकी छातीमें प्रहार किया। वीरवर हनुमान्जीकी मार खाकर शिवजीके शरीरमें लिपटे हुए नाग थर्रा उठे और वे उन्हें छोड़कर इधर-उधर होते हुए बड़े वेगसे पातालमें घुस गये। इसके बाद शिवजीने उनके ऊपर मुशल चलाया, किन्तु वे उसका वार बचा गये। उस समय रामसेवक हनुमान्जीको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने हाथपर पर्वत लेकर उसे शिवजीकी छातीपर दे मारा। तदनन्तर, उनके ऊपर दूसरी-दूसरी शिलाओं, वृक्षों और पर्वतोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी। वे भगवान् भूतनाथको अपनी पूँछमें लपेटकर मारने लगे। इससे नन्दीको बड़ा भय हुआ। उन्होंने एक-एक क्षणमें प्रहार करके शिवजीको अत्यन्त व्याकुल कर दिया। तब वे वानरराज हनुमान्जीसे बोले—‘रघुनाथजीकी सेवामें रहनेवाले भक्तप्रवर तुम धन्य हो। आज तुमने महान् पराक्रम कर दिखाया। इससे मुझे बड़ा सन्तोष हुआ है। महान् वेगशाली वीर ! मैं दान, यज्ञ या थोड़ी-सी तपस्यासे सुलभ नहीं हूँ; अतः मुझसे कोई वर माँगो।'
भगवान् शिव सन्तुष्ट होकर जब ऐसी बात कहने लगे, तब हनुमान्जीने हँसकर निर्भय वाणीमें कहा—'महेश्वर! श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे मुझे सब कुछ प्राप्त है; तथापि आप मेरे युद्धसे सन्तुष्ट हैं, इसलिये मैं आपसे यह वर माँगता हूँ। हमारे पक्षके ये वीर पुष्कल युद्धमें मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हैं, श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई शत्रुघ्न भी रणमें मूर्च्छित हो गये हैं तथा दूसरे भी बहुत-से वीर बाणोंकी मारसे क्षत-विक्षत एवं मूर्च्छित होकर धरतीपर गिरे हुए हैं। इन सबकी आप अपने गणोंके साथ रहकर रक्षा करें। इनके शरीरका खण्ड-खण्ड न हो, इस बातकी चेष्टा करें। मैं अभी द्रोणगिरिको लाने जा रहा हूँ, उसपर मरे हुए प्राणियोंको जिलानेवाली ओषधियाँ रहती हैं।' यह सुनकर शङ्करजीने कहा—'बहुत अच्छा, जाओ।' उनकी स्वीकृति पाकर हनुमान्जी सम्पूर्ण द्वीपोंको लाँघते हुए क्षीरसागरके तटपर गये। इधर भगवान् शिव अपने गणोंके साथ रहकर पुष्कल आदिकी रक्षा करने लगे। हनुमान्जी द्रोण नामक महान् पर्वतपर पहुँचकर जब उसे लानेको उद्यत हुए, तब वह काँपने लगा। उस पर्वतको काँपते देख उसकी रक्षा करनेवाले देवताओँने कहा—'छोड़ दो इसे, किसलिये यहाँ आये हो ? क्यों इसे ले जाना चाहते हो ?' उनकी बात सुनकर महायशस्वी हनुमान्जी बोले—'देवताओ ! राजा वीरमणिके नगरमें जो संग्राम हो रहा है, उसमें रुद्रके द्वारा हमारे पक्षके बहुत-से योद्धा मारे गये हैं। उन्हींको जीवित करनेके लिये मैं यह द्रोण पर्वत ले जाऊँगा। जो लोग अपने बल और पराक्रमके घमंडमें आकर इसे रोकेंगे, उन्हें एक ही क्षणमें मैं यमराजके घर भेज दूँगा। अतः तुमलोग मुझे समूचा द्रोण पर्वत अथवा वह औषध दे दो, जिससे मैं रणभूमिमें मरे हुए वीरोंको जीवन-दान कर सकूँ।' पवनकुमारके ये वचन सुनकर सबने उन्हें प्रणाम किया और संजीविनी नामक ओषधि उन्हें दे दी। हनुमान्जी औषध लेकर युद्धक्षेत्रमें आये।
४९६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण'
उन्हें आया देख समस्त वैरी भी साधु-साधु कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे तथा सबने उन्हें एक अद्भुत शक्तिशाली वीर माना। हनुमान्जी बड़ी प्रसन्नताके साथ मरे हुए वीर पुष्कलके पास आये और महापुरुषोंके भी आदरणीय मन्त्रिवर सुमतिको बुलाकर बोले—'आज मैं युद्धमें मरे हुए सम्पूर्ण वीरोंको जिलाऊँगा।'
ऐसा कहकर उन्होंने पुष्कलके विशाल वक्षःस्थल-पर औषध रखा और उनके सिरको धड़से जोड़कर यह कल्याणमय वचन कहा—'यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा श्रीरघुनाथजीको ही अपना स्वामी समझता हूँ तो इस दवासे पुष्कल शीघ्र ही जीवित हो जायें।' इस बातको ज्यों ही उन्होंने मुँहसे निकाला त्यों ही वीरशिरोमणि पुष्कल उठकर खड़े हो गये और रणभूमिमें रोषके मारे दाँत कटकटाने लगे। वे बोले—'मुझे युद्धमें मूर्च्छित करके वीरभद्र कहाँ चले गये ? मैं अभी उन्हें मार गिराता हूँ। कहाँ है मेरा उत्तम धनुष !' उन्हें ऐसा कहते देख कपिराज हनुमान्जीने कहा—'वीरवर ! तुम्हें वीरभद्रने मार डाला था। श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे पुनः नया जीवन प्राप्त हुआ है। शत्रुघ्न भी मूर्च्छित हो गये हैं। चलो, उनके पास चलें।' यों कहकर वे युद्धके मुहानेपर पहुँचे, जहाँ भगवान् श्रीशिवके बाणोंसे पीड़ित होकर शत्रुघ्नजी केवल साँस ले रहे थे। साँस आनेपर हनुमान्जीने उनकी छातीपर दवा रख दी और कहा—'भैया शत्रुघ्न ! तुम तो महाबलवान् और पराक्रमी हो, रणभूमिमें मूर्च्छित होकर कैसे पड़े हो ? यदि मैंने प्रयत्नपूर्वक आजन्म ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया है तो वीर शत्रुघ्न क्षणभरमें जीवित हो उठें।' इतना कहते ही वे क्षणमात्रमें जीवित हो बोल उठे—'शिव कहाँ हैं, शिव कहाँ हैं ? वे रणभूमि छोड़कर कहाँ चले गये ?'
पिनाकधारी रुद्रने युद्धमें अनेकों वीरोंका सफाया कर डाला था, किन्तु महात्मा हनुमान्जीने उन सबको जीवित कर दिया। तब वे सभी वीर कवच आदिसे सुसज्जित हो अपने-अपने रथपर बैठकर रोषपूर्ण हृदयसे शत्रुओंकी ओर चले। अबकी बार राजा वीरमणि स्वयं ही शत्रुघ्नका सामना करनेके लिये गये। उन्हें देखकर शत्रुघ्नको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने राजाके ऊपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, जिससे उनकी सेना दग्ध होने लगी। शत्रुके छोड़े हुए उस महान् दाहक अस्त्रको देखकर राजाके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने वारुणास्त्रका प्रयोग किया। वारुणास्त्रद्वारा अपनी सेनाको शीतके कष्टसे पीड़ित देख महाबली शत्रुघ्नने उसपर वायव्यास्त्रका प्रहार किया। इससे बड़े जोरोंकी हवा चलने लगी। वायुके वेगसे मेघोंकी घिरी हुई घटा छिन्न-भिन्न हो गयी। वे चारों ओर फैलकर विलीन हो गये। अब शत्रुघ्नके सैनिक सुखी दिखायी देने लगे। उधर महाराज वीरमणिने जब देखा कि मेरी सेना आँधीसे कष्ट पा रही है, तब उन्होंने अपने धनुषपर शत्रुओंका संहार करनेवाले पर्वतास्त्रका प्रयोग किया। पर्वतोंके द्वारा वायुकी गति रुक गयी। अब वह युद्धक्षेत्रमें फैल नहीं पाती थी। यह देख शत्रुघ्नने वज्रास्त्रका सन्धान किया। वज्रास्त्रकी मार पड़नेपर समस्त पर्वत तिल-तिल करके चूर्ण हो गये। शत्रुवीरोंके अङ्ग विदीर्ण होने लगे। खूनसे लथपथ होनेके कारण उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस समय युद्धका अद्भुत दृश्य था। राजा वीरमणिका क्रोध सीमाको पार कर गया। उन्होंने अपने धनुषपर ब्रह्मास्त्रका सन्धान किया, जो वैरियाँको दग्ध करनेवाला अद्भुत अस्त्र था। ब्रह्मास्त्र उनके हाथसे छूटकर शत्रु की ओर चला। तबतक शत्रुघ्नने भी मोहनास्त्र छोड़ा। मोहनास्त्रने एक ही क्षणमें ब्रह्मास्त्रके दो टुकड़े कर डाले तथा राजाकी छातीमें चोट करके उन्हें तुरंत मूर्च्छित कर दिया। तब शिवजीको बड़ा क्रोध हुआ और वे रथपर बैठकर राजाके पास आये। उस समय शत्रुघ्न सहसा उनसे युद्धके लिये आगे बढ़ आये और अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर युद्ध करने लगे। उन दोनोंमें बड़ा भयङ्कर संग्राम छिड़ा, जो वैरियाँको विदीर्ण करनेवाला था। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग होनेके कारण सारी दिशाएँ उद्दीप्त हो उठी थीं। शिवके साथ युद्ध करते-करते शत्रुघ्न अत्यन्त व्याकुल हो गये। तब हनुमान्जीके उपदेशसे उन्होंने अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया—'हा नाथ ! हा भाई ! ये
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अत्यन्त भयङ्कर शिव धनुष उठाकर मेरे प्राण लेनेपर उतारू हो गये हैं; आप युद्धमें मेरी रक्षा कीजिये। राम ! आपका नाम लेकर अनेकों दुःखी जीव दुःख-सागरके पार हो चुके हैं। कृपानिधे ! मुझ दुःखियाको भी उबारिये।' शत्रुघ्नने ज्यों ही उपर्युक्त बात मुँहसे निकाली, त्यों ही नील कमल-दलके समान श्यामसुन्दर कमल-नयन भगवान् श्रीराम मृगका शृङ्ग हाथमें लिये यज्ञदीक्षित पुरुषके वेषमें वहाँ आ पहुँचे। समरभूमिमें उन्हें देखकर शत्रुघ्नको बड़ा विस्मय हुआ।
प्रणतजनोंका क्लेश दूर करनेवाले अपने भाई श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन पाकर शत्रुघ्न सभी दुःखोंसे मुक्त हो गये। हनुमान्जी भी श्रीरघुनाथजीको देखकर सहसा उनके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और वे भक्तकी रक्षाके लिये आये हुए भगवान्से बोले—'स्वामिन् ! अपने भक्तोंका सब प्रकारसे पालन करना आपके लिये सर्वथा योग्य ही है। हम धन्य हैं, जो इस समय श्रीचरणोंका दर्शन पा रहे हैं। श्रीरघुनन्दन ! अब आपकी कृपासे हमलोग क्षणभरमें ही शत्रुओंपर विजय पा जायेंगे।' इसी समय योगियोंके ध्यानगोचर श्रीरामचन्द्रजीको आया जान श्रीमहादेवजी भी आगे बढ़े और उनके चरणोंमें प्रणाम करके शरणागतभयहारी प्रभुसे बोले—'भगवन् ! एकमात्र आप ही साक्षात् अन्तर्यामी पुरुष हैं, आप ही प्रकृतिसे पर परब्रह्म कहलाते हैं। जो अपनी अंश-कलासे इस विश्वकी सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं, वे परमात्मा आप ही हैं। आप सृष्टिके समय विधाता, पालनके समय स्वयंप्रकाश राम और प्रलयके समय शर्व नामसे प्रसिद्ध साक्षात् मेरे स्वरूप हैं। मैंने अपने भक्तका उपकार करनेके लिये आपके कार्यमें बाधा डालनेवाला आयोजन किया है। कृपालो ! मेरे इस अपराधको क्षमा कीजिये। क्या करूँ, मैंने अपने सत्यकी रक्षाके लिये ही यह सब कुछ किया है। आपके प्रभावको जानकर भी भक्तकी रक्षाके लिये यहाँ आया हूँ। पूर्वकालकी बात है, इस राजाने क्षिप्रा नदीमें स्नान करके उज्जयिनीके महाकाल-मन्दिरमें बड़ी अद्भुत तपस्या की थी। इससे प्रसन्न होकर मैंने कहा—'महाराज ! वर माँगो।' इसने अद्भुत राज्य माँगा।' मैंने कहा—'देवपुरमें तुम्हारा राज्य होगा और जबतक वहाँ श्रीरामचन्द्रजीके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका आगमन होगा, तबतक मैं भी तुम्हारी रक्षाके लिये उस स्थानपर निवास करूँगा।' इस प्रकार मैंने इसे वरदान दे दिया था। उसी सत्यसे मैं इस समय बँधा हूँ। अब यह राजा अपने पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित यज्ञका घोड़ा आपको समर्पित करके आपके ही चरणोंकी सेवा करेगा।'
श्रीरामने कहा—भगवन् ! देवताओंका तो यह धर्म ही है कि वे अपने भक्तोंका पालन करें। आपने जो इस समय अपने भक्तकी रक्षा की है, यह आपके द्वारा बहुत उत्तम कार्य हुआ है। मेरे हृदयमें शिव हैं और शिवके हृदयमें मैं हूँ। हम दोनोंमें भेद नहीं है। जो मूर्ख हैं, जिनकी बुद्धि दूषित है; वे ही भेददृष्टि रखते हैं। हम दोनों एकरूप हैं। जो हमलोगोंमें भेद-बुद्धि करते हैं, वे मनुष्य हजार कल्पोंतक कुम्भीपाकमें पकाये जाते हैं। महादेवजी ! जो सदा आपके भक्त रहे हैं, वे धर्मात्मा पुरुष मेरे भी भक्त हैं तथा जो मेरे भक्त हैं, वे भी बड़ी
४९८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
भक्तिसे आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं।*
शेषजी कहते हैं—श्रीरघुनाथजीका ऐसा वचन सुनकर भगवान् शिवने मूर्च्छित पड़े हुए राजा वीरमणिको अपने हाथके स्पर्श आदिसे जीवित किया। इसी प्रकार उनके दूसरे पुत्रोंको भी, जो बाणोंसे पीड़ित होकर अचेत-अवस्थामें पड़े थे, जिलाया। भगवान् भूतनाथने राजाको तैयार करके पुत्र-पौत्रोंसहित उन्हें श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें गिराया। वात्स्यायनजी ! धन्य हैं राजा वीरमणि, जिन्होंने श्रीरघुनाथजीका दर्शन किया। जो लाखों योगियोंके लिये उनकी योगनिष्ठाके द्वारा भी दुर्लभ हैं, उन्हीं भगवान् श्रीरामको प्रणाम करके समस्त राज-परिवारके लोग कृतार्थ हो गये—उनका शरीर धारण करना सफल हो गया। इतना ही नहीं, वे ब्रह्मादि देवताओंके भी पूजनीय बन गये। शत्रुघ्न, हनुमान् और पुष्कल आदि उद्भट योद्धा जिनकी स्तुति करते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीको राजा वीरमणिने शिवजीकी प्रेरणासे वह उत्तम अश्व दे दिया; साथ ही पुत्र, पशु और बान्धवों- सहित अपना सारा राज्य भी समर्पण कर दिया। तदनन्तर, श्रीरामचन्द्रजी समस्त शत्रुओं तथा सेवकोंसे अभिनन्दित होकर मणिमय रथपर बैठे-बैठे ही अन्तर्धान हो गये। मुने ! विश्ववन्दित श्रीरामको तुम मनुष्य न समझो। जलमें, थलमें, सब जगह तथा सबके भीतर सदा वे ही स्थित रहते हैं। भगवान् शङ्करने भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके सेवक राजासे विदा ली और कहा—'राजन् ! श्रीरामचन्द्रजीका आश्रय ही संसारमें सबसे दुर्लभ वस्तु है, अतः तुम श्रीरघुनाथजीकी ही शरणमें रहो।' यों कहकर प्रलय और उत्पत्तिके कर्ता-धर्ता भगवान् शिव स्वयं भी अदृश्य हो समस्त पार्षदोंके साथ कैलासको चले गये। इसके बाद राजा वीरमणि श्रीरामके चरण-कमलोंका ध्यान करते हुए स्वयं भी अपनी सेना लेकर महाबली शत्रुघ्नके साथ-साथ गये। जो श्रेष्ठ मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीके इस चरित्रका श्रवण करेंगे, उन्हें कभी सांसारिक दुःख नहीं होगा।
अश्वका गात्र-स्तम्भ, श्रीरामचरित्र-कीर्तनसे एक स्वर्गवासी ब्राह्मणका राक्षसयोनिसे उद्धार तथा अश्वके गात्र-स्तम्भकी निवृत्ति
शेषजी कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ ! तदनन्तर बँधे हुए चँवरसे सुशोभित वह यज्ञ-सम्बन्धी अश्व हजारों योद्धाओंसे सुरक्षित होकर भारतवर्षके अन्तमें स्थित हेमकूट पर्वतपर गया, जो चारों ओरसे दस हजार योजन लंबा-चौड़ा है। उसके सुन्दर शिखर सोने-चाँदी आदि धातुओंके हैं। वहाँ एक विशाल उद्यान है, जो बहुत ही सुन्दर और भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे सुशोभित है। घोड़ा उसमें प्रवेश कर गया। वहाँ जानेपर उस अश्वके सम्बन्धमें सहसा एक आश्चर्यजनक घटना हुई; उसे बतलाता हूँ, सुनिये—अकस्मात् उसका सारा शरीर अकड़ गया, वह हिल-डुल नहीं पाता था। मार्गमें खड़ा-खड़ा वह हेमकूट पर्वतकी ही भाँति अविचल प्रतीत होने लगा। अश्वके रक्षकोंने शत्रुघ्नके पास जाकर पुकार मचायी—'स्वामिन् ! हम नहीं जानते घोड़ेको क्या हो गया। अकस्मात् उसका सम्पूर्ण शरीर स्तब्ध हो गया है। इस बातपर विचार कर जो कुछ करना उचित जान पड़े, कीजिये।' यह सुनकर राजा शत्रुघ्नको बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने समस्त सैनिकोंके साथ अश्वके निकट गये। पुष्कलने अपनी बाँहसे पकड़कर उसके दोनों चरणोंको धरतीसे ऊपर उठानेका प्रयत्न किया। परन्तु वे अपने स्थानसे हिल भी न सके। तब शत्रुघ्नने सुमतिसे पूछा—'मन्त्रिवर ! घोड़ेको क्या हुआ है, जो इसका
* ममास्ति हृदये शर्वो भवतो हृदये त्वहम्। आवयोरन्तरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुर्धियः ॥
ये भेदं विदधत्यद्धा आवयोरेकरूपयोः । कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नराः कल्पसहस्रकम् ॥
ये त्वद्भक्ताः सदासंस्ते मद्भक्ता धर्मसंयुताः। मद्भक्ता अपि भूयस्या भक्त्या तव नतिङ्कराः ॥ (४६। २०—२२)
पातालखण्ड ] * अश्वका गात्र-स्तम्भ तथा एक ब्राह्मणका राक्षस्योनिसे उद्धार * ४९९
सारा शरीर अकड़ गया ? अब यहाँ क्या उपाय करना चाहिये, जिससे इसमें चलनेकी शक्ति आ जाय ?'
सुमतिने कहा—स्वामिन् ! किन्हीं ऐसे ऋषि-मुनिकी खोज करनी चाहिये, जो सब बातोंको जाननेमें कुशल हों। मैं तो लोकमें होनेवाले प्रत्यक्ष विषयोंको ही जानता हूँ; परोक्षमें मेरी गति नहीं है।
शेषजी कहते हैं—सुमतिकी यह बात सुनकर धर्मके ज्ञाता शत्रुघ्नने अपने सेवकोंद्वारा ऋषिकी खोज करायी। एक सेवक वहाँसे एक योजन दूर पूर्व दिशाकी ओर गया। वहाँ उसे एक बहुत बड़ा आश्रम दिखायी दिया, जहाँके पशु और मनुष्य—सभी परस्पर वैर-भावसे रहित थे। गङ्गाजीमें स्नान करनेके कारण उनके समस्त पाप दूर हो गये थे तथा वे सब-के-सब बड़े मनोहर दिखायी देते थे। वह शौनक मुनिका मनोहर आश्रम था। उसका पता लगाकर सेवक लौट आया और विस्मित होकर उसने राजा शत्रुघ्नसे उस आश्रमका समाचार निवेदन किया। सेवककी बात सुनकर अनुचरोंसहित शत्रुघ्नको बड़ा हर्ष हुआ और वे हनुमान् तथा पुष्कल आदिके साथ ऋषिके आश्रमपर गये। वहाँ जाकर उन्होंने मुनिके पापहारी चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा शत्रुघ्नको आया जान शौनक मुनिने अर्घ्य, पाद्य आदि देकर उनका स्वागत किया। उनके दर्शनसे मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। शत्रुघ्नजी सुखपूर्वक बैठकर जब विश्राम कर चुके तो मुनीश्वरने पूछा—'राजन् ! तुम किसलिये भ्रमण कर रहे हो ? तुम्हारी यह यात्रा तो बड़ी दूरकी जान पड़ती है।' मुनिकी यह बात सुनकर राजा शत्रुघ्नका शरीर हर्षसे पुलकित हो उठा। वे अपना परिचय देते हुए गद्गद वाणीमें बोले—'महर्षे ! मेरा अश्व अकस्मात् एक फूलोंसे सुशोभित उद्यानमें चला गया। उसके भीतर एक किनारेपर पहुँचते ही तत्काल उसका शरीर अकड़ गया। इसके कारण हमलोग अपार दुःखके समुद्रमें डूब रहे हैं; आप नौका बनकर हमें बचाइये। हमारे बड़े भाग्य थे, जो दैवात् आपका दर्शन हुआ। घोड़ेकी इस अवस्थाका प्रधान कारण क्या है ? यह बतानेकी कृपा कीजिये।'
शत्रुघ्नके इस प्रकार पूछनेपर परम बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ शौनक ने थोड़ी देरतक ध्यान किया। फिर एक ही क्षणमें सारा रहस्य समझमें आ गया। उनकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं तथा वे दुःख और संशयमें पड़े हुए राजा शत्रुघ्नसे बोले—राजन् ! मैं अश्वके गात्र-स्तम्भका कारण बताता हूँ, सुनो। गौड़ देशके सुरम्य प्रदेशमें, कावेरीके तटपर सात्त्विक नामका एक ब्राह्मण बड़ी भारी तपस्या कर रहा था। वह एक दिन जल पीता, दूसरे दिन हवा पीकर रहता और तीसरे दिन कुछ भी नहीं खाता था। इस प्रकार तीन-तीन दिनका व्रत लेकर वह समय व्यतीत करता था। उसका यह व्रत चल ही रहा था कि सबका विनाश करनेवाले कालने उसे अपने दाढ़ोंमें ले लिया। उस महान् व्रतधारी तपस्वीकी मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् वह सात्त्विक नामका ब्राह्मण सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा सब तरहकी शोभासे सम्पन्न विमानपर बैठकर मेरुगिरिके शिखरपर गया। वहाँ जम्बू नामकी नदी बहती थी, जिसके किनारे तप और ध्यानमें संलग्न रहनेवाले ऋषि महर्षि निवास करते थे। वह ब्राह्मण वहीं आनन्दमग्न होकर अपनी इच्छाके अनुसार अप्सराओंके साथ विहार करने लगा। अभिमान और मदसे उन्मत्त होकर उसने वहाँ रहनेवाले ऋषियोंके प्रतिकूल बर्ताव किया। इससे रुष्ट होकर उन ऋषियोंने शाप दिया—'जा, तू राक्षस हो जा; तेरा मुख विकृत हो जाय।' यह शाप सुनकर ब्राह्मणको बड़ा दुःख हुआ और उसने उन विद्वान् एवं तपस्वी ब्राह्मणोंसे कहा—'महर्षियो ! आप सब लोग दयालु हैं; मुझपर कृपा कीजिये।' तब उन्होंने उसपर अनुग्रह करते हुए कहा—'जिस समय तुम श्रीरामचन्द्रजीके अश्वको अपने वेगसे स्तब्ध कर दोगे, उस समय तुम्हें श्रीरामकी कथा सुननेका अवसर मिलेगा। उसके बाद इस भयङ्कर शापसे तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।' मुनियोंके कथनानुसार उसीने यहाँ राक्षस होकर श्रीरघुनाथजीके अश्वको स्तम्भित किया है; अतः तुम कीर्तनके द्वारा घोड़ेको उसके चंगुलसे छुड़ाओ।'
मुनिका यह कथन सुनकर शत्रुवीरोंका दमन
•सं०प०पु० १७—
५०० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
करनेवाले शत्रुघ्नके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे शौनकसे बोले- 'कर्मकी बात बड़ी गहन है, जिससे सात्त्विक नामधारी ब्राह्मण अपने महान् कर्मसे स्वर्गमें पहुँचकर भी पुनः राक्षसभावको प्राप्त हो गया। स्वामिन् ! आप कर्मके अनुसार जैसी गति होती है, उसका वर्णन कीजिये ! जिस कर्मके परिणामसे जैसे नरककी प्राप्ति होती है, उसे बताइये।'
शौनकके कहा- रघुकुलश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, जो तुम्हारी बुद्धि सदा ऐसी बातोंको जानने और सुननेमें लगी रहती है। इसमें संदेह नहीं कि तुम इस विषयको भलीभाँति जानते हो; तो भी लोगोंके हितके लिये मुझसे पूछ रहे हो। महाराज ! कर्मोंके स्वरूप विचित्र हैं तथा उनकी गति भी नाना प्रकारकी है; मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। इस विषयका श्रवण करनेसे मनुष्यको मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है।
जो दुष्ट बुद्धिवाला पुरुष पराये धन, परायी संतान और परायी स्त्रीको भोग-बुद्धिसे बलात्पूर्वक अपने अधिकारमें कर लेता है, उसको महाबली यमदूत कालपाशमें बाँधकर तामिस्र नामक नरकमें गिराते हैं और जबतक एक हजार वर्ष पूरे नहीं हो जाते, तबतक उसीमें रखते हैं। यमराजके प्रचण्ड दूत वहाँ उस पापीको खूब पीटते हैं। इस प्रकार पाप-भोगके द्वारा भलीभाँति क्लेश उठाकर अन्तमें वह सूअरकी योनिमें जन्म लेता है और उसमें भी महान् दुःख भोगनेके पश्चात् वह फिर मनुष्यकी योनिमें जाता है; परन्तु वहाँ भी अपने पूर्वजन्मके कलङ्कको सूचित करनेवाला कोई रोग आदिका चिह्न धारण किये रहता है। जो केवल दूसरे प्राणियोंसे द्रोह करके ही अपने कुटुम्बका पोषण करता है, वह पापपरायण पुरुष अन्धतामिस्र नरकमें पड़ता है। जो लोग यहाँ दूसरे प्राणियोंका वध करते हैं, वे रौरव नरकमें गिराये जाते हैं तथा रुरु नामक पक्षी रोषमें भरकर उनका शरीर नोचते हैं। जो अपने पेटके लिये दूसरे जीवोंका वध करता है, उसे यमराजकी आज्ञासे महारौरव नामक नरकमें डाला जाता है। जो पापी अपने पिता और ब्राह्मणसे द्वेष करता है, वह महान् दुःखमय कालसूत्र नरकमें, जिसका विस्तार दस हजार योजन है, पड़ता है। जो गौओंसे द्रोह करता है, उसे यमराजके किङ्कर नरकमें डालकर पकाते हैं; वह भी थोड़े समयतक नहीं, गौओंके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक। जो इस पृथ्वीका राजा होकर दण्ड न देने योग्य पुरुषको दण्ड देता है तथा लोभवश (अन्यायपूर्वक) ब्राह्मणको भी शारीरिक दण्ड देता है, उसे सूअरके समान मुँहवाले दुष्ट यमदूत पीड़ा देते हैं। तत्पश्चात् वह शेष पापोंसे छुटकारा पानेके लिये दुष्ट योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। जो मनुष्य मोहवश ब्राह्मणों तथा गौओंके थोड़े-से भी द्रव्य, धन अथवा जीविकाको लेते या लूटते हैं, वे परलोकमें जानेपर अन्धकूप नामक नरकमें गिराये जाते हैं। वहाँ उनको महान् कष्ट भोगना पड़ता है। जो जीभके लिये आतुर हो लोलुपतावश स्वयं ही मधुर अन्न लेकर खा जाता है, देवताओं तथा सुहृदोंको नहीं देता, वह निश्चय ही 'कृमिभोजन' नामक नरकमें पड़ता है। जो मनुष्य सुवर्ण आदिका अपहरण अथवा ब्राह्मणके धनकी चोरी करता है, वह अत्यन्त दुःखदायक 'संदंश' नामक नरकमें गिरता है।
जो मूढ़ बुद्धिवाला पुरुष केवल अपने शरीरका पोषण करता है, दूसरेको नहीं जानता, वह तपाये हुए तेलसे पूर्ण अत्यन्त भयंकर कुम्भीपाक नरकमें डाला जाता है। जो पुरुष मोहवश अगम्या स्त्रीको भार्या-बुद्धिसे भोगना चाहता है, उसे यमराजके दूत उसी स्त्रीकी लोहमयी तपायी हुई प्रतिमाके साथ आलिङ्गन करवाते हैं। जो अपने बलसे उन्मत्त होकर बलपूर्वक वेदकी मर्यादाका लोप करते हैं, वे वैतरणी नदीमें डूबकर मांस और रक्त भोजन करते हैं। जो द्विज होकर शूद्रकी स्त्रीको अपनी भार्या बनाकर उसके साथ गृहस्थी चलाता है, वह निश्चय ही 'पूयोद' नामक नरकमें गिरता है। वहाँ उसे बहुत दुःख भोगना पड़ता है। जो धूर्त लोगोंको धोखेमें डालनेके लिये दम्भका आश्रय लेते हैं, वे मूढ़ वैशस नामक नरकमें डाले जाते हैं और वहाँ उनपर यमराजकी मार पड़ती है। जो मूढ़ सवर्णा (समान गोत्रवाली) स्त्रीकी योनिमें वीर्यपात करते हैं, उन्हें वीर्यकी नहरमें