भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

१४७-भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान

६०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


प्रशंसनीय माहात्म्य अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाला और पापोंको धो डालनेवाला है। माधव-मासका यह माहात्म्य भगवान् माधवको अत्यन्त प्रिय है। राजा महीरथका चरित्र और हम दोनोंका मनोरम संवाद सुनने, पढ़ने तथा विधिपूर्वक अनुमोदन करनेसे मनुष्यको भगवान्‌की भक्ति प्राप्त होती है, जिससे समस्त क्लेशोंका नाश हो जाता है।

सूतजी कहते हैं— धर्मराजकी यह बात सुनकर वह ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करके चला गया। उसने भूतलपर प्रतिवर्ष स्वयं तो वैशाख-स्नानकी विधिका पालन किया ही, दूसरोंसे भी कराया। यह ब्राह्मण और यमका संवाद मैंने आपलोगोंसे वैशाख मासके पुण्यमय स्नानके प्रसङ्गमें सुनाया है। जो एकचित्त होकर वैशाख मासके माहात्म्यका श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है।


भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान

**ऋषि बोले—**महाप्राज्ञ सूतजी ! आपका हृदय अत्यन्त करुणामूर्ण है; आपने कृपा करके ही पापनाशक वैशाख-माहात्म्यका वर्णन किया है। अब इस समय हम भक्तगणोंके प्रिय परमात्मा श्रीकृष्णका ध्यान सुनना चाहते हैं, जो भवसागरसे तारनेवाला है।

**सूतजीने कहा—**मुनियो ! वृन्दावनमें विचरनेवाले जगदात्मा श्रीकृष्णके, जो गौओं, ग्वालों और गोपियोंके प्राण हैं, ध्यानका वर्णन आप सब लोग सुनें। द्विजवरो ! एक समय महर्षि गौतमने देवर्षि नारदजीसे यही बात पूछी थी। नारदजीने उनसे जिस पापनाशक ध्यानका वर्णन किया था, वही मैं आपलोगोंको बताता हूँ।

नारदजी कहते हैं—

सुमनप्रकरसौरभो ल्लितमाध्विकाहूल्लस-
त्सुशाखिनवपल्लवप्रकरनम्रशोभायुतम् ।
प्रफुल्लनवमञ्जरीललितवल्लरीवेष्टितं
स्मरेत सततं शिवं सितमतिः सुवृन्दावनम् ॥

ध्यान करनेवाले मनुष्यको सदा शुद्धचित्त होकर पहले उस परम कल्याणमय सुन्दर वृन्दावनका चिन्तन करना चाहिये, जो फूलोंके समुदाय, मनोहर सुगन्ध और बहते हुए मकरन्द आदिसे सुशोभित सुन्दर-सुन्दर वृक्षोंके नूतन पल्लवोंसे झुका हुआ शोभा पा रहा है तथा खिली हुई नवल मञ्जरियों और ललित लताओंसे आवृत है।

प्रवालनवपल्लवं मरकतच्छदं मौक्तिक-
प्रभाप्रकरकोरकं कमलरागनानाफलम् ।
स्थविष्ठमखिलर्तुभिः सततसेवितं कामदं
तदन्तरपि कल्पकाङ्घ्रिपमुदञ्चितं चिन्तयेत् ॥

उस वनके भीतर भी एक कल्पवृक्षका चिन्तन करे, जो बहुत ही मोटा और ऊँचा है, जिसके नये-नये पल्लव मूँगेके समान लाल हैं, पत्ते मरकत मणिके सदृश नीले हैं, कलिकाएँ मोतीके प्रभा-पुञ्जकी भाँति शोभा पा रही हैं और नाना प्रकारके फल पद्मराग मणिके समान जान पड़ते हैं। समस्त ऋतुएँ सदा ही उस वृक्षकी सेवामें रहती हैं तथा वह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है।

सुहेमशिखराचले उदितभानुवद्भासुरा-
मधोऽस्य कनकस्थलीममृतशीकरासारिणः ।
प्रदीप्तमणिकुट्टिमां कुसुमरेणुपुञ्जोज्ज्वलां
स्मरेत्पुनरतन्द्रितो विगतषत्तरङ्गां बुधः ॥

फिर आलस्यरहित हो विद्वान् पुरुष धारावाहिकरूपसे अमृतकी बूँदें बरसानेवाले उस कल्पवृक्षके नीचे सुवर्णमयी वेदीकी भावना करे, जो मेरु गिरिपर उगे हुए सूर्यकी भाँति प्रभासे उद्भासित हो रही है, जिसका फर्श जगमगाती हुई मणियोंसे बना है, जो फूलोंके पराग-पुञ्जसे कुछ धवल वर्णकी हो गयी है तथा जहाँ क्षुधा-पिपासा, शोक-मोह और जरा-मृत्यु—ये छः ऊर्मियाँ नहीं पहुँचने पातीं।

तद्रत्नकुट्टिमविविष्टमहिष्ठयोग-
पीठेऽष्टपत्रमरुणं कमलं विचिन्त्य ।
उद्यद्विरोचनसरोचिरमुष्य मध्ये
संचिन्तयेत् सुखनिविष्टमथो मुकुन्दम् ॥

उस रत्नमय फर्शपर रखे हुए एक विशाल योग-

पातालखण्ड ]
* भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान *
६०७


पीठके ऊपर लाल रंगके अष्टदल कमलका चिन्तन करके उसके मध्यभागमें सुखपूर्वक बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करे, जो अपनी दिव्य प्रभासे उदयकालीन सूर्यदेवकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं।

सुत्रामहेतिदलिताञ्जनमेघपुञ्ज-
प्रत्यग्रनीलजलजन्म समानभासम् ।
सुस्निग्धनीलघनकुञ्चितकेशजालं
राजन्मनोज्ञशितिकण्ठशिखण्डचूडम् ॥

भगवान्‌के श्रीविग्रहकी आभा इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण हुए कजलगिरि, मेघोंकी घटा तथा नूतन नील-कमलके समान श्याम रंगकी है; श्याम मेघके सदृश काले-काले घुँघराले केश-कलाप बड़े ही चिकने हैं तथा उनके मस्तकपर मनोहर मोर-पंखका मुकुट शोभा पा रहा है।

रोलम्बलालितसुरद्रुममूनसम्प-
द्युक्तं समुत्कचनवोत्पलकर्णपूरम् ।
लोलालिभिः स्फुरितभालतलप्रदीप्त-
गोरोचनातिलकमुज्ज्वलचिल्लिचापम् ॥

कल्पवृक्षके फूलोंसे, जिनपर भौंरे मँडरा रहे हैं, भगवान्‌का शृङ्गार हुआ है। उन्होंने कानोंमें खिले हुए नवीन कमलके कुण्डल धारण कर रखे हैं; जिनपर चञ्चल भ्रमर उड़ रहे हैं। उनके ललाटमें चमकीले गोरोचनका तिलक चमक रहा है तथा धनुषाकार भौंहें बड़ी सुन्दर प्रतीत हो रही हैं।

आपूर्णशारदगताङ्कशशाङ्कबिम्ब-
कान्ताननं कमलपत्रविशालनेत्रम् ।
रत्नस्फुरन्मकरकुण्डलरश्मिदीप्त-
गण्डस्थलीमुकुरमुन्नतचारुनासम् ॥

भगवान्‌का मुख शरत्पूर्णिमाके कलङ्कहीन चन्द्रमण्डलकी भाँति कान्तिमान् है, बड़े-बड़े नेत्र कमलदलके समान सुन्दर जान पड़ते हैं, दर्पणके सदृश स्वच्छ कपोल रत्नोंके कारण चमकते हुए मकराकृत कुण्डलोंकी किरणोंसे देदीप्यमान हो रहे हैं तथा ऊँची नासिका बड़ी मनोहर जान पड़ती है।

सिन्दूरसुन्दरतराधरमिन्दुकुन्द-
मन्दारमन्दहसितद्युतिदीपिताशम् ।
वन्यप्रवालकुसुमप्रचयावक्लृप्त-
ग्रैवेयकोज्ज्वलमनोहरकम्बुकण्ठम् ॥

सिन्दूरके समान परम सुन्दर लाल-लाल ओष्ठ हैं; चन्द्रमा, कुन्द और मन्दार पुष्पकी-सी मन्द मुसकानकी छटासे सामनेकी दिशा प्रकाशित हो रही है तथा वनके कोमल पल्लवों और फूलोंके समूहद्वारा बनाये हुए हारसे शङ्खसदृश मनोहर ग्रीवा बड़ी सुन्दर जान पड़ती है।

मत्तभ्रमद्भ्रमरघृष्टविलम्बमान-
संतानकप्रसवदामपरिष्कृतांसम् ।
हारावलीभगणराजितपीवरोरो-
व्योमस्थलीवसितकौस्तुभभानुमन्तम् ॥

मँडराते हुए मतवाले भौरोंसे निनादित एवं घुटनोंतक लटकी हुई पारिजात पुष्पोंकी मालासे दोनों कंधे शोभा पा रहे हैं। पीन और विशाल वक्षःस्थलरूपी आकाश हाररूपी नक्षत्रोंसे सुशोभित है तथा उसमें कौस्तुभमणिरूपी सूर्य भासमान हो रहा है।

श्रीवत्सलक्षणसुलक्षितमुन्नतांस-
माजानुपीनपरिवृत्तसुजातबाहुम् ।
आबन्धुरोदरमुदारगभीरनाभिं
भृङ्गाङ्गनानिकरमञ्जुलरोमराजिम् ॥

भगवान्‌के वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न बड़ा सुन्दर दिखायी देता है, उनके कंधे ऊँचे हैं, गोल-गोल सुन्दर भुजाएँ घुटनोंतक लंबी एवं मोटी हैं, उदरका भाग बड़ा मनोहर है, नाभि विस्तृत और गहरी है तथा त्रिवलीकी रोमपङ्क्ति भँवरोंकी पङ्क्तिके समान शोभा पा रही है।

नानामणिप्रघटिताङ्गदकङ्कणोर्मि-
ग्रैवेयकारसननूपुरतुन्दबन्धम् ।
दिव्याङ्गरागपरिपिञ्जरिताङ्गयष्टि-
मापीतवस्त्रपरिवीतनितम्बबिम्बम् ॥

नाना प्रकारकी मणियोंके बने हुए भुजबंद, कड़े, अँगूठियाँ, हार, करधनी, नूपुर और पेटी आदि आभूषण भगवान्‌के श्रीविग्रहपर शोभा पा रहे हैं; उनके समस्त अङ्ग दिव्य अङ्गरागोंसे अनुरञ्जित हैं तथा कटिभाग कुछ हलके रंगके पीताम्बरसे ढका हुआ है।

६०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


चारूरुजानुमनुवृत्तमनोज्ञजङ्घं<br>कान्तोन्नतप्रपदनन्दितकूर्मकान्तिम् ।<br>माणिक्यदर्पणलसन्नखराजिराज-<br>द्रक्ताङ्गुलिच्छदनसुन्दरपादपद्मम् ॥<br>दोनों जाँघें और घुटने सुन्दर हैं; पिंडलियोंका भाग गोलाकार एवं मनोहर है; पादाग्रभाग परम कान्तिमान् तथा ऊँचा है और अपनी शोभासे कछुएके पृष्ठभागकी कान्तिको मलिन कर रहा है तथा दोनों चरण-कमल माणिक्य तथा दर्पणके समान स्वच्छ नखपङ्क्तियोंसे सुशोभित लाल-लाल अङ्गुलिदलोंके कारण बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं।थनोंके भारसे लड़खड़ाती हुई मन्द-मन्द गतिसे चलनेवाली गौएँ दाँतोंके अग्रभागमें चबानेसे बचे हुए तिनकोंके अङ्कुर लिये, पूँछ लटकाये भगवान्के मुखकमलमें आँखें गड़ाये उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हैं।
मत्स्याङ्कुशारिदरकेतुयवाब्जवज्रैः<br>संलक्षितारुणकराङ्घ्रितलाभिरामम् ।<br>लावण्यसारसमुदायविनिर्मिताङ्गं<br>सौन्दर्यनिन्दित मनोभवदेहकान्तिम् ॥<br>मत्स्य, अङ्कुश, चक्र, शङ्ख, पताका, जौ, कमल और वज्र आदि चिह्नोंसे चिह्नित लाल-लाल हथेलियों तथा तलवोंसे भगवान् बड़े मनोहर प्रतीत हो रहे हैं। उनका श्रीअङ्ग लावण्यके सार-संग्रहसे निर्मित जान पड़ता है तथा उनके सौन्दर्यके सामने कामदेवके शरीरकी कान्ति फीकी पड़ जाती है।सम्भ्रस्तस्तनविभूषणपूर्णनिश्च-<br>लास्याद् दृढक्षरत्फेनिलदुग्धमुग्धैः ।<br>वेणुप्रवर्तितमनोहरमन्दगीत-<br>दत्तोर्ध्वकर्णयुगलैरपि तर्णकैश्च ॥<br>गौओंके साथ ही छोटे-छोटे बछड़े भी भगवान्को सब ओरसे घेरे हुए हैं और मुरलीसे मन्दस्वरमें जो मनोहर संगीतकी धारा बह रही है, उसे वे कान लगाकर सुन रहे हैं, जिसके कारण उनके दोनों कान खड़े हो गये हैं। गौओंके टपकते हुए थनोंके आभूषणरूप दूधसे भरे हुए उनके मुख स्थिर हैं, जिनसे फेनयुक्त दूध बह रहा है; इससे वे बछड़े बड़े मनोहर प्रतीत हो रहे हैं।
आस्यारविन्दपरिपूरितवेणुरन्ध्र-<br>लोलत्कराङ्गुलिसमीरितदिव्यरागैः ।<br>शश्वद्द्रवैः कृतनविष्टसमस्तजन्तु-<br>सन्तानसंततिमलन्तसुखाम्बुराशिम् ॥<br>भगवान् अपने मुखारविन्दसे मुरली बजा रहे हैं; उस समय मुरलीके छिद्रोंपर उनकी अँगुलियोंके फिरनेसे निरन्तर दिव्य रागोंकी सृष्टि हो रही है, जिनसे प्रभावित हो समस्त जीव-जन्तु जहाँ-के-तहाँ बैठकर भगवान्की ओर मस्तक टेक रहे हैं। भगवान् गोविन्द अनन्त आनन्दके समुद्र हैं।गोपैः समानगुणशीलवयोविलास-<br>वेशैश्च मूर्च्छितकलस्वनवेणुवीणैः ।<br>मन्दोच्चतारपटुगानपरैर्विलोल-<br>दोर्वल्लरीललितलास्यविधानदक्षैः ॥<br>भगवान्के ही समान गुण, शील, अवस्था, विलास तथा वेष-भूषावाले गोप भी, जो अपनी चञ्चल भुजाओंको सुन्दर ढंगसे नचानेमें चतुर हैं, वंशी और वीणाकी मधुर ध्वनिका विस्तार करके मन्द, उच्च और तारस्वरमें कुशलतापूर्वक गान करते हुए भगवान्को सब ओरसे घेरकर खड़े हैं।
गोभिर्मुखाम्बुजविलीनविलोचनाभि-<br>रूधोभरस्खलितमन्थरमन्दगाभिः ।<br>दन्ताग्रदष्टपरिशिष्टतृणाङ्कुराभि-<br>रालम्बिवालधिलताभिरथाभिवीतम् ॥जङ्घान्तपीवरकटीरतटीनिवद्ध-<br>व्यालोलकिङ्किणिघटारणितैरटद्भिः ।<br>मुग्धैस्तरक्षुनखकल्पितकान्तभूषै-<br>रव्यक्तमञ्जुवचनैः पृथुकैः परीतम् ॥<br>छोटे-छोटे ग्वाल-बाल भी भगवान्के चारों ओर घूम रहे हैं; जाँघसे ऊपर उनके मोटे कटिभागमें करधनी पहनायी गयी है, जिसकी क्षुद्रघण्टिकाओंकी मधुर झनकार सुनायी पड़ती है। वे भोले-भाले बालक बघनखोंके सुन्दर आभूषण पहने हुए हैं। उनकी

पातालखण्ड ] * भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान * ६०९ ********************************************************************************************************

मीठी-मीठी तोतली वाणी साफ समझमें नहीं आती।

भगवान्‌के प्रति दृढ़ अनुराग रखनेवाली सुन्दरी गोपाङ्गनाएँ भी उन्हें प्रेमपूर्ण दृष्टिसे निहारती हुई सब ओरसे घेरकर खड़ी हैं। गोपी, गोप और पशुओंके घेरेसे बाहर भगवान्‌के सामनेकी ओर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि देवताओंका समुदाय खड़ा होकर स्तुति कर रहा है।

तद्वद् दक्षिणतो मुनिकरं दृढधर्मवाञ्छया समाम्नायपरम्।
योगीन्द्रानथ पृष्ठे मुमुक्षमाणान् समाधिना तु सनकाद्यान् ॥

इसी प्रकार उपर्युक्त घेरेसे बाहर भगवान्‌के दक्षिण भागमें सुदृढ़ धर्मकी अभिलाषासे वेदाभ्यासपरायण मुनियोंका समुदाय उपस्थित है तथा पृष्ठभागकी ओर समाधिके द्वारा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले सनकादि योगीश्वर खड़े हैं।

सव्ये सकान्तानथ यक्षसिद्धान्
गन्धर्वविद्याधरचारणांश्च ।
सकिन्नरानप्सरसश्च मुख्याः
कामाथिनीर्नर्तनगीतवाद्यैः ॥

वाम भागमें अपनी स्त्रियोंसहित यक्ष, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण और किन्नर खड़े हैं। साथ ही भगवत्प्रेमकी इच्छा रखनेवाली मुख्य-मुख्य अप्सराएँ भी मौजूद हैं। ये सब लोग नाचने, गाने तथा बजानेके द्वारा भगवान्‌की सेवा कर रहे हैं।

शङ्खेन्दुकुन्दधवलं सकलागमज्ञं
सौदामनीततिपिशङ्गजटाकलापम् ।
तत्पादपङ्कजगतानमलां च भक्तिं
वाञ्छन्तमुज्झिततरान्यसमस्तसङ्गम् ॥
नानाविधश्रुतिगणान्वितसप्तराग-
ग्रामत्रयीगतमनोहरमूर्च्छनाभिः ।
सम्प्रीणयन्तमुदिताभिरपि प्रभक्त्या
संचिन्तयेन्नभसि मां द्रुहिणप्रसूतम् ॥

तत्पश्चात् आकाशमें स्थित मुझ ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारदका चिन्तन करना चाहिये। नारदजीके शरीरका वर्ण शङ्ख, चन्द्रमा तथा कुन्दके समान गौर है; वे सम्पूर्ण आगमोंके ज्ञाता हैं, उनकी जटाएँ बिजलीकी पङ्क्तियोंके समान पीली और चमकीली हैं, वे भगवान्‌के चरण-कमलोंकी निर्मल भक्तिके इच्छुक हैं तथा अन्य सब ओरकी आसक्तियोंका सर्वथा परित्याग कर चुके हैं और संगीतसम्बन्धी नाना प्रकारकी श्रुतियोंसे युक्त सात स्वरों और त्रिविध ग्रामोंकी मनोहर मूर्च्छनाओंको अभिव्यञ्जित करके अत्यन्त भक्तिके साथ भगवान्‌को प्रसन्न कर रहे हैं।

इति ध्यात्वाऽऽत्मानं पटुविशदधीर्नन्दनतनयं
नरो बौद्धैर्घ्यप्रभृतिभिरनिन्द्योपहृतिभिः ।
यजेद् भूयो भक्त्या स्ववपुषि बहिष्ठैश्च विभवै-
रिति प्रोक्तं सर्वं यदभिलषितं भूसुरवराः ॥*

इस प्रकार प्रखर एवं निर्मल बुद्धिवाला पुरुष अपने आत्मस्वरूप भगवान् नन्दनन्दनका ध्यान करके मानसिक अर्घ्य आदि उत्तम उपहारोंसे अपने शरीरके भीतर ही भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे तथा बाह्य उपचारोंसे भी उनकी आराधना करे। ब्राह्मणो ! आपलोगोंकी जैसी अभिलाषा थी, उसके अनुसार भगवान्‌का यह सम्पूर्ण ध्यान मैंने बता दिया।

**सूतजी कहते हैं—**महर्षिगण ! जो इस कथाको सुनाता है, वह भगवान्‌के समान हो जाता है। विप्रो ! यह गुह्यसे भी गुह्य प्रसङ्ग कल्याणमय ज्ञान प्रदान करनेवाला है। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम-पदको प्राप्त होता है।

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॥ पातालखण्ड सम्पूर्ण ॥
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* ये ध्यानसम्बन्धी श्लोक अध्याय १९ से लिये गये हैं।

उत्तरखण्ड

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

संक्षिप्त पद्मपुराण

उत्तरखण्ड

नारद-महादेव-संवाद—बदरिकाश्रम तथा नारायणकी महिमा

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥*

ऋषियोंने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी ! आपके द्वारा वर्णित नाना प्रकारके उपाख्यानोंसे युक्त परमानन्ददायक पातालखण्डका हमलोगोंने श्रवण किया; अब भगवद्भक्तिको बढ़ानेवाला जो पद्मपुराणका शेष अंश है, उसे हम सुनना चाहते हैं। गुरुदेव ! कृपा करके उस अंशका वर्णन कीजिये।

सूतजी बोले—मुनियो ! भगवान् शङ्करने देवर्षि नारदके प्रश्न करनेपर जिस पापनाशक विज्ञानका श्रवण कराया था, उसीको मैं कहता हूँ; आप सब लोग सुनें। एक समयकी बात है, भगवान्के प्रिय भक्त देवर्षि नारदजी लोक-लोकान्तरोंमें भ्रमण करते हुए मन्दराचल पर्वतपर गये। वहाँ भगवान् शङ्करसे अपनी कुछ मनोगत बातोंको पूछना ही उनकी यात्राका उद्देश्य था। भगवान् उमानाथ उस पर्वतपर विराजमान थे। नारदजीने उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे उन्हींके सामने वे एक आसनपर बैठ गये। महात्माओ ! उस समय उन्होंने भगवान् शिवसे यही प्रश्न किया, जिसे आपलोग मुझसे पूछ रहे हैं।

नारदजीने कहा—भगवन् ! देवदेवेश्वर ! पार्वतीपते ! जगद्गुरो ! जिससे भगवत्तत्त्वका ज्ञान हो, उस विषयका आप मुझे उपदेश कीजिये।

महादेवजी बोले—नारद ! सुनो; मैं वेदोंकी समानता करनेवाले पुराणका वर्णन आरम्भ करता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस पृथ्वीपर एक लाख पचीस हजार पर्वत हैं, उन सबमें बदरिकाश्रम महान् पुण्यदायक एवं उत्तम है, जहाँ भगवान् नर-नारायण विराजमान हैं। नारदजी ! मैं इस समय उन्हींके तेज और स्वरूपका वर्णन करूँगा। ब्रह्मन् ! हिमालय पर्वतपर दो पुरुष हैं, जो क्रमशः नर-नारायणके नामसे विख्यात हैं; उनमें एक तो गौर वर्णके हैं और दूसरे श्याम वर्णके। श्याम वर्णवाले पुरुष ही ‘नारायण’ हैं; ये इस जगत्के आदि कारण और महान् प्रभु हैं। इनके चार भुजाएँ हैं। ये बड़े ही शोभासम्पन्न हैं। इनके दो रूप हैं—व्यक्त और अव्यक्त (साकार


* जिन्होंने अज्ञानरूपी अन्धकारसे अंधे हुए मुझ शिष्यके विवेकरूपी बंद नेत्रको ज्ञानरूप अञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है, उन श्रीगुरुदेवको प्रणाम है।

१४९-गङ्गावतरणकी संक्षिप्त कथा और हरिद्वारका माहात्म्य

उत्तरखण्ड ] * गङ्गावतरणकी संक्षिप्त कथा और हरिद्वारका माहात्म्य * ६११ ***********************************************************************************************************

और निराकार)। ये सनातन पुरुष हैं। सुव्रत ! उत्तरायणमें ही इनकी महती पूजा होती है। प्रायः छः महीनोंतक इनकी पूजा नहीं होती; क्योंकि जबतक दक्षिणायन रहता है, इनका स्थान हिमसे आच्छादित रहा करता है। अतः इनके-जैसा देवता न अबतक हुआ है और न आगे होगा। बदरिकाश्रममें देवगण निवास करते हैं। वहाँ ऋषियोंके भी आश्रम हैं। अग्निहोत्र और वेदपाठकी ध्वनि वहाँ सदा श्रवण-गोचर होती रहती है। भगवान् नारायणका दर्शन करना चाहिये। उनका दर्शन करोड़ों हत्याओंका नाश करनेवाला है। वहाँ 'अलकनन्दा' नामवाली गङ्गा बहती हैं, उनमें स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नान करके मनुष्य महान् पापसे मुक्त हो जाता है। उस तीर्थमें सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् नारायण सदा ही विराजमान रहते हैं।

एक समयकी बात है, मैंने एक वर्षतक वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की थी। उस समय भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् नारायण, जो अविनाशी, अन्तर्यामी, साक्षात् परमेश्वर तथा गरुड़के-से चिह्नवाली ध्वजासे युक्त हैं, बहुत प्रसन्न हुए और मुझसे बोले—'सुव्रत ! कोई वर माँगो; देव ! तुम जो-जो चाहोगे, वह सभी मनोरथ मैं पूर्ण करूँगा; तुम कैलासके स्वामी, साक्षात् रुद्र तथा विश्वके पालक हो।

तब मैंने कहा—जनार्दन ! यदि आप वर देना चाहते हैं तो मुझे दो वर प्रदान कीजिये—मेरे हृदयमें सदा ही आपके प्रति भक्ति बनी रहे और देवेश्वर ! मैं आपके प्रसादसे मुक्तिदाता होऊँ।


गङ्गावतरणकी संक्षिप्त कथा और हरिद्वारका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—देवर्षियोंमें श्रेष्ठ नारद ! अब तुम परम पुण्यमय हरिद्वारका माहात्म्य श्रवण करो। जहाँ भगवती गङ्गा बहती हैं, वहाँ उत्तम तीर्थ बताया गया है। वहाँ देवता, ऋषि और मनुष्य निवास करते हैं। वहाँ साक्षात् भगवान् केशव नित्य विराजमान रहते हैं। विद्वन् ! राजा भगीरथ उसी मार्गसे भगवती गङ्गाको लाये थे तथा उन महात्माने गङ्गाजलका स्पर्श कराकर अपने पूर्वजोंका उद्धार किया था।

नारद ! अत्यन्त सुन्दर गङ्गाद्वारमें जो जिस प्रकार गङ्गाजीको ले आये थे, वह सब प्रसङ्ग मैं क्रमशः सुनाता हूँ। पूर्वकालमें हरिश्चन्द्र नामके एक राजा हो चुके हैं, जो त्रिभुवनमें सत्यके पालक विख्यात थे। उनके रोहित नामक एक पुत्र हुआ, जो भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर था। रोहितका पुत्र वृक था, जो बड़ा ही धर्मात्मा और सदाचारी था। उसके सुबाहु नामक पुत्र हुआ। सुबाहुसे 'गर' नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। एक समय गरको कालयोगसे दुःखी होना पड़ा। अनेक राजाओंने चढ़ाई करके उनके देशको अपने अधीन कर लिया। गर कुटुम्बको साथ ले भृगुनन्दन और्वके आश्रमपर चले गये। और्वने कृपापूर्वक वहाँ उनकी रक्षा की। वहीं उनके सगर नामक पुत्रका जन्म हुआ। महात्मा भार्गवसे रक्षित होकर वह उसी आश्रमपर बढ़ने लगा। मुनिने उसके यज्ञोपवीत आदि सब क्षत्रियोचित संस्कार कराये। अस्त्र-शस्त्रों तथा वेद-विद्याका भी उसको अभ्यास कराया।

तदनन्तर महातपस्वी राजा सगरने और्व मुनिसे आग्नेयास्त्र प्राप्त किया और समूची पृथ्वीपर भ्रमण करके अपने शत्रु तालजङ्घ, हैहय, शक तथा पारदवंशियोंका वध कर डाला। इस प्रकार सबको जीतकर उन्होंने धर्म-संचय करना आरम्भ किया। राजाने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करनेके लिये अश्व छोड़ा। वह अश्व पूर्व दक्षिण-समुद्रके तटपर हर लिया गया और पृथ्वीके भीतर पहुँचा दिया गया। तब राजाने अपने पुत्रोंको लगाकर सब ओरसे उस स्थानको खुदवाया। महासागर खोदते समय वे अश्वको तो नहीं पा सके, किन्तु वहाँ तपस्या करनेवाले आदि पुरुष महात्मा कपिलपर उनकी दृष्टि पड़ी। वे उतावलीके साथ उनके निकट गये और जगत्प्रभु कपिलको लक्ष्य करके कहने लगे—'यह चोर है।'

६१२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


•कोलाहल सुनकर भगवान् कपिल समाधिसे जाग उठे। उस समय उनके नेत्रोंसे आग प्रकट हुई, जिससे साठ हजार सगर-पुत्र जलकर भस्म हो गये। महायशस्वी राजाने समुद्रसे उस आश्वमेधिक अश्वको प्राप्त किया और उसके द्वारा सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण किया।

नारदजीने पूछा— विज्ञानेश्वर ! सगरके साठ हजार पुत्र बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, उन वीरोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? यह बताइये।

महादेवजी बोले— नारद ! राजा सगरकी दो पत्नियाँ थीं, वे दोनों ही तपस्याके द्वारा अपने पाप दग्ध कर चुकी थीं। इससे प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ और्वने उन्हें वरदान दिया। उनमेंसे एक रानीने साठ हजार पुत्र माँगे और दूसरीने एक ही ऐसे पुत्रके लिये प्रार्थना की, जो वंश चलानेवाला हो। पहली रानीने तूँबीमें बहुत-से शूरवीर पुत्रोंको जन्म दिया; उन सबको धाइयोंने ही क्रमशः पाल-पोसकर बड़ा किया। घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर उन कुमारोंका पोषण किया गया। कपिला गायका दूध पीकर वे सब-के-सब बड़े हुए। दूसरी रानीके गर्भसे पञ्चजन नामक पुत्र हुआ, जो राजा बना। पञ्चजनके अंशुमान् नामक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ। अंशुमान्के दिलीप और दिलीपके भगीरथ हुए, जो उत्तम व्रत (तपस्या) का अनुष्ठान करके नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीको पृथ्वीपर ले आये तथा जिन्होंने गङ्गाको समुद्रतक ले जाकर उन्हें अपनी कन्याके रूपमें अङ्गीकार किया।

नारदजीने पूछा— भगवन् ! राजा भगीरथ गङ्गाको किस प्रकार लाये थे ? उन्होंने कौन-सी तपस्या की थी, ये सब बातें मुझे बताइये।

महादेवजी बोले— नारद ! राजा भगीरथ अपने पूर्वजोंका हित करनेके लिये हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दस हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की। इससे आदिदेव भगवान् निरञ्जन श्रीविष्णु प्रसन्न हुए। उन्हींके आदेशसे गङ्गाजी आकाशसे चलीं और जहाँ विश्वेश्वर श्रीशिव नित्य विराजमान रहते हैं, उस कैलास पर्वतपर उपस्थित हुईं। मैंने गङ्गाजीको आया देख उन्हें अपने जटाजूटमें धारण कर लिया और दस हजार वर्षोंतक उसी रूपमें स्थित रहा। इधर राजा भगीरथ गङ्गाजीको न देखकर विचार करने लगे— गङ्गा कहाँ चली

१५०-गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति ..

उत्तरखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१३ *********************************************************************************

गयीं ? ध्यान करके जब उन्होंने यह निश्चितरूपसे जान लिया कि उन्हें महादेवजीने ग्रहण कर लिया है, तब वे कैलास पर्वतपर गये। मुनिश्रेष्ठ वहाँ पहुँचकर वे तीव्र तपस्या करने लगे। उनके आराधना करनेपर मैंने अपने मस्तकसे एक बाल उखाड़ा और उसीके साथ त्रिपथगा गङ्गाजीको उन्हें अर्पण कर दिया। गङ्गाको लेकर वे पातालमें, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, गये। उस समय भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गङ्गा जब हरिद्वारमें आयीं, तब वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ श्रेष्ठ तीर्थ बन गया। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान तथा विशेषरूपसे श्रीहरिका दर्शन करके उनकी परिक्रमा करते हैं, वे दुःखके भागी नहीं होते। ब्रह्महत्या आदि पापोंकी अनेक राशियाँ ही क्यों न हों, वे सब सर्वदा श्रीहरिके दर्शनमात्रसे नष्ट हो जाती हैं। एक समय मैं भी हरिद्वारमें श्रीहरिके स्थानपर गया था, उस समय उस तीर्थके प्रभावसे मैं विष्णुस्वरूप हो गया। सभी मनुष्य वहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेमात्रसे वैकुण्ठ-लोकको प्राप्त होते हैं। परम सुन्दर हरिद्वार-तीर्थ मेरी दृष्टिमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह समस्त तीर्थोंमें श्रेष्ठ और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाला है।

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गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति

महादेवजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे तत्काल पापोंका नाश हो जाता है। जो मनुष्य सैकड़ों योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा' का उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें विष्णुलोकको जाता है।* नारद ! श्रीहरिके चरणकमलोंसे प्रकट हुई 'गङ्गा' नामसे विख्यात नदी पापोंकी स्थूल राशियोंका भी नाश करनेवाली है। नर्मदा, सरयू, वेत्रवती (बेतवा), तापी, पयोष्णी (मन्दाकिनी), चन्द्रा, विपाशा (ब्यास), कर्मनाशिनी, पुष्पा, पूर्णा, दांपा, विदीपा तथा सूर्यतनया यमुना—इनमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब पुण्य गङ्गा-स्नानसे मनुष्य प्राप्त कर लेते हैं। जो मनीषी पुरुष समुद्रसहित पृथ्वीका दान करते हैं, उनको मिलनेवाला फल भी गङ्गा-स्नानसे प्राप्त हो जाता है। सहस्र गोदान, सौ अश्वमेध यज्ञ तथा सहस्र वृषभ-दानसे जिस अक्षय फलकी प्राप्ति होती है, वह गङ्गाजीके दर्शनसे क्षणभरमें प्राप्त हो जाता है। वह गङ्गा नदी महान् पुण्यदायिनी है, विशेषतः ब्रह्महत्यारोंके लिये परम पावन है। वे नरकमें पड़नेवाले हों तो भी गङ्गाजी उनके पाप हर लेती हैं। तात ! जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार गङ्गाके प्रभावसे पातक नष्ट हो जाते हैं। ये माता गङ्गा संसारमें सदा पवित्र मानी गयी हैं। इनका स्वरूप परम कल्याणमय है। माता जाह्नवीका स्वरूप दिव्य है। जैसे देवताओंमें श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार नदियोंमें गङ्गा उत्तम हैं। जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती हैं, उन तीर्थमें स्नान और आचमन करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

[भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें जानेपर भगवान् श्रीविष्णु तथा यमुना, गङ्गा आदि नदियोंका किस प्रकार स्तवन करना चाहिये, यह बताया जाता है—]

त्वद्वातं प्रयतो ब्रवीमि यदहं सास्तु स्तुतिस्ते प्रभो
यद् भुञ्जे तव सन्निवेदनमथो यद्यामि सा प्रेष्यता।
यच्छ्रान्तः स्वपिमि त्वदङ्घ्रियुगले दण्डप्रणामोऽस्तु मे
स्वामिन् यच्च करोमि तेन स भवान् विश्वेश्वरः प्रीयताम् ॥

प्रभो ! मैं शुद्धभावसे आपके सम्बन्धमें जो कुछ भी चर्चा करता हूँ, वही आपके लिये स्तुति हो। जो कुछ भोजन करता हूँ, वह आपके लिये नैवेद्यका काम दे। जो चलता-फिरता हूँ, वही आपकी सेवा-टहल समझी जाय। जो थककर सो जाता हूँ, वही आपके लिये


* गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ (२३।२)

६१४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

साष्टाङ्ग प्रणाम हो तथा स्वामिन् ! मैं जो कुछ करता हूँ, उससे आप जगदीश्वर श्रीविष्णु प्रसन्न हों। दृष्टेन वन्दितेनापि स्पृष्टेन च धृतेन च। नरा येन विमुच्यन्ते तदेतद् यामुनं जलम्॥ जिसके दर्शन, वन्दन, स्पर्श तथा धारण करनेसे मनुष्य भव-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वही यह यमुनाजीका जल है। तावद् भ्रमन्ति भुवने मनुजा भवोत्य- दारिद्र्यरोगमरणव्यसनाभिभूताः । यावज्जलं तव महानदि नीलनीलं पश्यन्ति नो दधति मूर्धसु सूर्यपुत्रि ॥ सूर्यपुत्री महानदी यमुनाजी ! मनुष्य इस जगत्‌में प्राप्त होनेवाले दरिद्रता, रोग और मृत्यु आदि दुःखोंसे पीड़ित होकर तभीतक संसारमें भटकते रहते हैं, जबतक वे नीलमणिके सदृश आपके नीले जलका दर्शन नहीं करते अथवा उसे अपने मस्तकपर नहीं चढ़ाते। यत्संस्मृतिः सपदि कृन्तति दुष्कृतौघं पापावलीं जयति योजनलक्षतोऽपि । यन्नाम नाम जगदुच्चरितं पुनाति दिष्ट्या हि सा पथि दृशोर्भविताद्य गङ्गा ॥ जिनकी स्मृति पापराशिका तत्काल नाश कर देती है, जो लाख योजन दूरसे भी पापोंके समूहको परास्त करती हैं, जिनका नाम उच्चारण किये जानेपर सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र कर देता है, वे गङ्गाजी आज सौभाग्यवश मेरे दृष्टिपथमें आयेंगी। आलोकोत्कण्ठितेन प्रमुदितमनसा वर्त्म यस्याः प्रयातं सद् यस्मिन् कृत्यमेतामथ प्रथमकृती जज्ञिवान् स्वर्गसिन्धुम् । स्नानं सन्ध्या निवापः सुरयजनमपि श्राद्धविप्राशनाद्यं सर्वं सम्पूर्णमेतद् भवति भगवतः प्रीतिदं नात्र चित्रम् ॥ मनुष्य दर्शनके लिये उत्कण्ठित तथा प्रसन्नचित्त होकर जिसके पथका अनुसरण करता है, जिसके तटपर समस्त शास्त्रविहित कर्म उत्तमतापूर्वक सम्पन्न होते हैं, उन गङ्गाजीको आदि सृष्टिके रचयिता ब्रह्माजीने पहले स्वर्गङ्गाके रूपमें उत्पन्न किया था। उनके तटपर किया हुआ स्नान, सन्ध्या, तर्पण, देवपूजा, श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन आदि सब कुछ परिपूर्ण एवं भगवान्‌को प्रसन्नता प्रदान करनेवाला होता है-इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। द्रवीभूतं परं ब्रह्म परमानन्ददायिनि । अर्घ्यं गृहाण मे गङ्गे पापं हर नमोऽस्तु ते ॥ परमानन्द प्रदान करनेवाली गङ्गाजी ! आप जल-रूपमें अवतीर्ण साक्षात् परब्रह्म हैं। आपको नमस्कार है। आप मेरा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये और मेरे पाप हर लीजिये। साक्षाद्धर्मद्रवौघं मुररिपुचरणाम्भोजपीयूषसारं दुःखस्वाब्धेस्तरित्रं सुरदनुजनुतं स्वर्गसोपानमार्गम्। सर्वांहोहारि वारि प्रवरगुणगणं भासि या संवहन्ती तस्यै भागीरथि श्रीमत्ति मुदितमना देवि कुर्वे नमस्ते ॥ श्रीमती भागीरथी देवी ! जो जलरूपमें परिणत साक्षात् धर्मकी राशि है, भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंसे प्रकट हुई सुधाका सार है, दुःखरूपी समुद्रसे पार होनेके लिये जहाज है तथा स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी है, जिसे देवता और दानव भी प्रणाम करते हैं, जो समस्त पापोंका संहार करनेवाला, उत्तम गुणसमूहसे युक्त और शोभा-सम्पन्न है, ऐसे जलको आप धारण करती हैं। मैं प्रसन्नचित्त होकर आपको नमस्कार करता हूँ। स्वःसिन्धो दुरिताब्धिमग्नजनतासंस्तारणि प्रोल्लसत्- कल्लोलामलकान्तिनाशिततस्तोमे जगत्पावनि । गङ्गे देवि पुनीहि दुष्कृतभयक्रान्तं कृपाभाजनं मातर्मां शरणागतं शरणदे रक्षाद्य भो भीषितम् ॥ स्वर्गलोककी नदी भगवती गङ्गे ! आप पापके समुद्रमें डूबी हुई जनताको तारनेवाली हैं, अपनी उठती हुई शोभायुक्त लहरोंकी निर्मल कान्तिसे पापरूपी अन्धकार-राशिका नाश करती हैं तथा जगत्‌को पवित्र करनेवाली हैं; मैं पापके भयसे ग्रस्त और आपका कृपा-भाजन हूँ। शरणदायिनी माता ! आपकी शरणमें आया हूँ; आज मुझ भयभीतकी रक्षा कीजिये। हं हो मानस कम्पसे किमु सखे त्रस्तो भयान्नारकात् किं ते भीतिरिति श्रुतिर्दुरितकृत् संजायते नारकी। मा भैषीः शृणु मे गतिं यदि मया पापाचलस्पर्धिनी प्राप्ता ते निरयः कथं किमपरं किं मे न धर्मो धनम् ॥

उत्तराखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१५


ऐ मेरे चित्त ! ओ मित्र ! तुम नरकके भयसे त्रस्त होकर काँप क्यों रहे हो ? क्या तुम्हें यह सोचकर भय हो रहा है कि पापी मनुष्य नरकमें पड़ता है—ऐसा श्रुतिका कथन है। सखे ! इसके लिये भय न करो; मेरी क्या गति होगी—यह बताता हूँ, सुनो; यदि मुझे पापोंके पहाड़से भी टक्कर लेनेवाली भगवती गङ्गा प्राप्त हो गयी हैं तो तुम्हें नरककी प्राप्ति कैसे हो सकती है अथवा दूसरी कोई दुर्गति भी क्यों होगी। क्या मेरे पास धर्मरूपी धन नहीं है ?

स्वर्वासाधिप्रशंसामुदमनुभवितुं मज्जनं यत्र चोक्तं
स्वर्नार्यो वीक्ष्य हृष्टा विबुधसुरपतिप्राप्तिसंभावनेन ।
नीरे श्रीजह्नुकन्ये यमनियमरताः स्नान्ति ये तावकीने
देवत्वं ते लभन्ते स्फुटमशुभकृतोऽप्यत्र वेदाः प्रमाणम् ॥

जिस गङ्गाजीके जलमें किया हुआ स्नान स्वर्गलोकके निवास तथा प्रशंसाके आनन्दकी अनुभूतिका कारण बताया गया है, वहाँ किसीको स्नान करते देख स्वर्गलोककी देवियाँ एक नूतन देवता अथवा इन्द्रके मिलनेकी संभावनासे बहुत प्रसन्न होती हैं। जह्नुपुत्री गङ्गे ! जो लोग यम-नियमोंका पालन करते हुए आपके जलमें स्नान करते हैं, वे पहलेके पापी होनेपर भी निश्चय ही देवत्व प्राप्त कर लेते हैं—इस विषयमें वेद प्रमाण हैं।

बुद्धे सद्बुद्धिरेवं भवतु तव सखे मानस स्वस्ति तेऽस्तु
आस्तां पादौ पदस्थौ सततमिह युवां साधुदृष्टी च दृष्टी ।
वाणि प्राणप्रियेऽधिप्रकटगुणवपुः प्राप्नुहि प्राणपुष्टिं
यस्मात् सर्वैर्भवद्भिः सुखमतुलमहं प्राप्नुयां तीर्थपुण्यम् ॥

बुद्धे ! सदा इसी प्रकार तुम्हारी सद्बुद्धि बनी रहे। सखे मन ! तुम्हारा भी कल्याण हो। चरणो ! तुम भी इसी प्रकार योग्य पद (स्थान) पर स्थित रहो। नेत्रो ! तुम दोनों भी उत्तम दृष्टिसे सम्पन्न रहो। वाणी ! तुम प्राणोंकी प्रिया हो तथा प्रकट हुए उत्तम गुणोंसे युक्त शरीर ! तुम्हारी प्राणशक्तिका पोषण हो; क्योंकि मैं तुम सब लोगोंके साथ आज अतुलित सुख प्रदान करनेवाले तीर्थजनित पुण्यको प्राप्त करूँगा।

श्रीजाह्नवीरविसुतापरमेष्ठिपुत्री-
सिन्धुत्रयाभरण तीर्थवर प्रयाग ।
सर्वेश मामनुगृहाण नयस्व चोर्ध्व-
मन्तस्तमोदशविधं दलय स्वधाम्ना ॥

गङ्गा, यमुना और सरस्वती—इन तीनों नदियोंको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले तीर्थराज प्रयाग ! सर्वेश्वर ! मुझपर अनुग्रह करो, मुझे ऊँचे उठाओ तथा मेरे अन्तःकरणके दस प्रकारके अविद्यान्धकारको अपने तेजसे नष्ट करो।

वागीशविष्णुवीशपुरन्दराद्याः
पापप्रणाशाय विदां विदोऽपि ।
भजन्ति यत्तीरमनीलनीलं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा इन्द्र आदि देवता और विद्वानोंमें श्रेष्ठ विद्वान् (ऋषि-महर्षि) भी जिसके श्वेत-कृष्णजलसे शोभित तटका सेवन करते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

कलिन्दजासङ्गमवाप्य यत्र
प्रत्यागता स्वर्गधुनी धुनोति ।
अध्यात्मतापत्रितयं जनस्य
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

जहाँ आयी हुई गङ्गा कलिन्दनन्दिनी यमुनाका सङ्गम पाकर मनुष्योंके आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीनों तापोंका नाश करती हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

श्यामो वटोऽश्यामगुणं वृणोति
स्वच्छायया श्यामलया जनानाम् ।
श्यामः श्रमं कृन्तति यत्र दृष्टः
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

जहाँ श्यामवट उज्ज्वल गुण धारण करता है तथा दर्शन करनेपर अपनी श्यामल छायासे मनुष्योंके जन्म-मरणरूप श्रमका नाश कर डालता है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

ब्रह्मादयोऽप्यात्मकृतिं विहाय
भजन्ति पुण्यात्मकभाग्यधेयम् ।
यत्रोज्झिता दण्डधरः स्वदण्डं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

६१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


ब्रह्मा आदि देवता भी अपना काम छोड़कर जिस पुण्यमय सौभाग्यसे युक्त तीर्थका सेवन करते हैं तथा जहाँ दण्डधारी यमराज भी अपना दण्ड त्याग देते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

यत्सेवया देवनृदेवतादि-
देवर्षयः प्रत्यहमाममन्ति।
स्वर्गं च सर्वोत्तमभूमिराज्यं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

देवता, मनुष्य, ब्राह्मण तथा देवर्षि भी प्रतिदिन जिसके सेवनसे स्वर्ग एवं सर्वोत्तम भूमण्डलका राज्य प्राप्त करते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

एनांसि हन्तीति प्रसिद्धवार्ता
नामप्रतापेन दिशो द्रवन्ती।
यस्य त्रिलोकी प्रतता यशोभिः
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

प्रयाग अपने नामके प्रतापसे समस्त पापोंका नाश कर डालता है, यह प्रसिद्ध वार्ता सम्पूर्ण दिशाओंमें फैली हुई है। जिसके सुयशसे सारी त्रिलोकी आच्छादित है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

धत्तोऽभितश्चामरचारुकान्ती
सितासिते यत्र सरिद्वरेण्ये।
आद्यो वटश्छत्रमिवातिभाति
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

जहाँ दोनों किनारे श्याम और श्वेत सलिलसे सुशोभित दो श्रेष्ठ सरिताएँ यमुना और गङ्गा चँवरकी मनोहर कान्ति धारण कर रही हैं और आदि वट (अक्षयवट) छत्रके समान सुशोभित होता है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

ब्राह्मीनपुत्रीत्रिपथास्त्रिवेणी-
समागमेनाक्षतयागमात्रान्।
यत्राप्लुतान् ब्रह्मपदं नयन्ति
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

सरस्वती, यमुना और गङ्गा—ये तीन नदियाँ जहाँ डुबकी लगानेवाले मनुष्योंको, जो त्रिवेणी-संगमके सम्पर्कसे अक्षत यागफलको प्राप्त हो चुके हैं, ब्रह्मलोकमें पहुँचा देती हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

केषाञ्चिजन्मकोटिर्व्रजति सुवचसा यामि यामीति यस्मिन्
केषाञ्चित्प्रोषितानां नियतमतिपतेद् वर्षवृन्दं वरिष्ठम्।
यः प्राप्तो भाग्यलक्षैर्भवति भवति नो वा स वाचामवाच्यो
दिष्ट्या वेणीविशिष्टो भवति दृगतिथिः किं प्रयागः प्रयागः॥

‘मैं प्रयागमें जाऊँगा, जाऊँगा’ इन सुन्दर बातोंमें ही कितने ही लोगोंके करोड़ों जन्म बीत जाते हैं [और प्रयागकी यात्रा सुलभ नहीं होती]। कुछ लोग घरसे चल तो देते हैं, पर मार्गमें ही फँस जानेके कारण उनके अनेकों वर्ष समाप्त हो जाते हैं। लाखों बार भाग्यकी सहायता होनेपर भी जो कभी प्राप्त होता है और कभी नहीं भी होता, वह त्रिवेणी-संगम-विशिष्ट उत्तम यज्ञभूमि प्रयाग वाणीसे परे है। क्या मेरा ऐसा भाग्य है कि वह मेरे नेत्रोंका अतिथि हो सके ?

लोकानामक्षमाणां मखकृतिषु कलौ स्वर्गकामैर्जपस्तु-
त्यादिस्तोत्नैर्वचोभिः कथममरपदप्राप्तिचिन्तातूराणाम्।
अग्निष्टोमाश्वमेधप्रमुखमखफलं सम्यगालोच्य साङ्गं
ब्रह्माद्यैस्तीर्थराजोऽभिमतद उपदिष्टोऽयमेव प्रयागः॥

कलियुगमें मनुष्य स्वर्गकी इच्छा होते हुए भी यज्ञ-यगादि करनेमें असमर्थ होनेके कारण जप, स्तुति, स्तोत्र एवं पाठ आदिके द्वारा किस प्रकार अमरपदकी प्राप्ति हो—इस चिन्तासे आतुर होंगे; उनको अङ्गोंसहित अग्निष्टोम और अश्वमेध आदि यज्ञोंका फल कैसे मिले—इसकी भलीभाँति आलोचना करके ब्रह्मा आदि देवताओंने इस तीर्थराज प्रयागको ही सब प्रकारके अभीष्ट फलोंका दाता बताया है।

मया प्रमादात्तुरतादिदोषतः
संध्याविधिर्नो समुपासितोऽभूत्।
चेदत्र संध्यां चरतोऽप्रमादतः
संध्यास्तु पूर्णाखिलजन्मनोऽपि मे॥

यदि मैने प्रमाद और आतुरता आदि दोषोंके कारण भलीभाँति संध्योपासना नहीं की है तो यहाँ सावधानता-पूर्वक संध्या करनेसे मेरे सम्पूर्ण जन्मकी संध्योपासना पूर्ण हो जाय।

अन्यत्रापि प्रगर्जन्महिमनि तपसि प्रेमिभिर्विप्रकृष्टै-
र्ध्यातः संकीर्तितो योऽभिमतपदविधातानिशं निर्व्यपेक्षम्।

उत्तरखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१७ *****************************************************************************************************

श्रीमत्पांशुं त्रिवेणीपरिवृढमतुलं तीर्थराजं प्रयागं
गोऽलंकारप्रकाशं स्वयममरवरैश्चार्चितं तं नमामि ॥
जो माघमासमें अपनी महिमाके विषयमें अन्यत्र भी गर्जना करता है, प्रेमीजनोंके दूरसे भी अपना ध्यान और कीर्तन करनेपर जो बिना किसीकी सहायताके निरन्तर अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है, जिसकी धूलिराशि शोभासे सम्पन्न है, जो त्रिवेणीका स्वामी है, जिसकी संसारमें कहीं भी तुलना नहीं है तथा जिसका दिव्य स्वरूप अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशमान है, उस श्रेष्ठ देवताओं-द्वारा पूजित तीर्थराज प्रयागको मैं प्रणाम करता हूँ।

अस्माभिः सुतपोऽन्वतापि किमहोऽज्यन्त किं वाध्वराः
पात्रे दानमदायि किं बहुविधं किं वा सुराश्चार्चिताः ।
किं सत्तीर्थमसेवि किं द्विजकुलं पूजादिभिः सत्कृतं
येन प्राप्त सदाशिवस्य शिवदा सा राजधानी स्वयम् ॥
अहो ! हमलोगोंने क्या कोई उत्तम तपस्या की थी ? अथवा यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ? या किसी सुपात्रको नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान दिया था ? अथवा देवताओंकी पूजा की थी ? या किसी उत्तम तीर्थका सेवन किया था ? अथवा ब्राह्मणवंशका पूजा आदिके द्वारा सत्कार किया था, जिससे भगवान् सदाशिवकी यह कल्याणदायिनी राजधानी काशी हमें स्वयं ही प्राप्त हो गयी !

भाग्यैर्मेऽधिगता ह्यनेकजनुषां सर्वाघविध्वंसिनी
सर्वाश्चर्यमयी मया शिवपुरी संसारसिन्धोस्तरी ।
लब्धं तज्जनुषः फलं कुलमलंचक्रे पवित्रीकृतः
स्वात्मा चाप्यखिलं कृतं किमपरं सर्वोपरिष्टात् स्थितम् ॥
मेरे बड़े भाग्य थे, जो अनेक जन्मोंकी पापराशिका विध्वंस करनेवाली संसार-समुद्रके लिये नौकारूपा यह सर्वाश्चर्यमयी शिवपुरी मुझे प्राप्त हुई। इससे जन्म लेनेका फल मिल गया। मेरे कुलकी शोभा बढ़ गयी। मेरी अन्तरात्मा पवित्र हो गयी तथा मेरे सम्पूर्ण कर्तव्य पूर्ण हो गये। अधिक क्या कहूँ, अब मैं सर्वोपरि पदपर प्रतिष्ठित हो गया।

जीवन्नरः पश्यति भद्रलक्षमेवं वदन्तीति मृषा न यस्मात् ।
तस्मान्मया वै वपुषेदृशेन प्राप्तापि काशी क्षणभङ्गुरेन ॥
मनुष्य जीवित रहे तो वह लाखों कल्याणकी बातें देखता है—ऐसी जो किंवदन्ती है, वह झूठी नहीं है; इसीलिये मैंने इस क्षणभङ्गुर शरीरसे भी काशी-जैसी पुरीको प्राप्त कर लिया।

काश्यां विधातुममरैरपि दिव्यभूमौ
सत्तीर्थलिङ्गगणनाञ्चर्नतो न शक्या ।
यानीह गुप्तविवृतानि पुरातनानि
सिद्धानि योजितकरः प्रणमामि तेभ्यः ॥
काशीपुरीकी दिव्य भूमिमें कितने उत्तम तीर्थ और लिङ्ग हैं, उनकी पूजनपूर्वक गणना करना देवताओंके लिये भी असंभव है। यहाँ गुप्त और प्रकटरूपसे जो-जो पुरातन सिद्धपीठ हैं, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

किं भीत्या दुरितात्कृतात् किमु मुदा पुण्यैरगण्यैः कृतैः
किं विद्याभ्यसनानन्मदेन जडतादोषाद् विषादेन किम् ।
किं गर्वेण धनोदयादधनतातपेन किं भो जनाः
स्नात्वा श्रीमण्णिकर्णिकापयसि चेद् विश्वेश्वरो दृश्यते ॥
मनुष्यो ! यदि श्रीमणिकर्णिकाके जलमें स्नान करके भगवान् विश्वनाथजीका दर्शन किया जाता हो तो पूर्वकृत पापोंसे भयकी क्या आवश्यकता है। अथवा किये हुए अगणित पुण्योंद्वारा प्राप्त होनेवाले आनन्दसे भी क्या लेना है। विद्याभ्यासको लेकर घमंड या मूर्खताके लिये खेद करनेसे क्या लाभ है ? धनकी प्राप्तिसे होनेवाले गर्व तथा निर्धनताके कारण होनेवाले संतापसे भी क्या प्रयोजन है।

अल्पस्फीतिनिरामयापि तनुताप्रव्यक्तशक्त्यात्मता
प्रोत्साहाढ्यबलेन केवलमनोरागाद्द्वितीयेन यत् ।
अप्राप्यापि मनोरथैरविषया स्वप्नप्रवृत्तेरपि
प्राप्ता सापि गदाधरस्य नगरी सद्योऽपवर्गप्रदा ॥
जो स्वल्प समृद्धिसे युक्त होनेपर भी निरामय (नाशरहित) है, सूक्ष्मताके द्वारा ही जो अपनी शक्ति-शालिता सूचित कर रही है, अप्राप्य होनेपर भी जो उत्साहयुक्त बल तथा विशुद्ध मानसिक अनुरागसे प्राप्त होती है, मनोरथोंकी भी जहाँतक पहुँच नहीं है, जो स्वप्नमें भी सुलभ नहीं होती, वह तत्काल मोक्ष प्रदान करनेवाली भगवान् गदाधरकी नगरी गया आज मुझे प्राप्त हुई है।

१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


मन्ये नात्मकृतिर्न पूर्वपुरुषप्राप्तेर्बलं चात्र त-
त्रापीदं स्वजनप्रमाणमचलं किं शापतापादिकम्।
या दुष्प्रापगयाप्रयागयमुनाकाशीषु पर्वागमात्
प्राप्तिस्तत्र महाफलो विजयते श्रीशारदानुग्रहः ॥

कोई पुण्यपर्व आनेपर जो गया, प्रयाग, यमुना और काशी आदि दुर्लभ तीर्थोंमें आनेका सौभाग्य प्राप्त होता है, उसमें महान् फलदायक भगवती शारदाका अनुग्रह ही एकमात्र कारण है; उसीकी विजय है। मैं इसे अपना पुरुषार्थ नहीं मानता। पूर्वजोंने जो यहाँ आकर पुण्योपार्जन किया है, उसका बल भी इसमें सहायक नहीं है तथा स्वजनवर्गकी अविचल शक्ति भी इसमें कारण नहीं है। इन तीर्थोंमें आनेपर शाप-ताप आदि क्या कर सकते हैं।

यः श्राद्धसमये दूरात्स्मृतोऽपि पितृमुक्तिदः।
तं गयायां स्थितं साक्षान्नमामि श्रीगदाधरम् ॥

जो श्राद्ध-कालमें दूरसे स्मरण करनेपर भी पितरोंको मोक्ष प्रदान करते हैं, गयामें स्थित उन साक्षात् भगवान् श्रीगदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ।

पन्थानं समतीत्य दुस्तरमिमं दूराद्दवीयस्तरं
क्षुद्रव्याघ्रतरक्षकण्टकफणिप्रत्यर्थिभिः संकुलम्।
आगत्य प्रथमं ह्ययं कृपणवाग् याचेज्जनः कं परं
श्रीमद्द्वारि गदाधर प्रतिदिनं त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते ॥

भगवान् गदाधर ! यह आपका दास मक्खी, मच्छर, बाघ, चीते, काँटे, सर्प तथा लुटेरोंसे भरे हुए इस दुस्तर मार्गको, जो दूरसे भी दूर पड़ता है, तै करके पहले-पहल यहाँ आया है और दीन वाणीमें आपसे याचना करता है। भला, आपके सिवा और किसके सामने यह हाथ फैलाये। भगवन् ! यह सेवक प्रतिदिन आपके शोभासम्पन्न द्वारपर आकर दर्शनके लिये उत्कण्ठित रहता है।

सर्वात्मन्निजदर्शनेन च गयाश्राद्धेन वै दैवतान्
प्रीणन् विश्वमनीहवत् कथमिहौदासीन्यमालम्बसे।
किं ते सर्वद निर्दयत्वमधुना किं वा प्रभुत्वं कलेः
किं वा सत्त्वनिरीक्षणं नृषु चिरं किं वास्य सेवारुचिः ॥

सर्वात्मन् ! आप अपने दर्शनसे तथा गयामें किये जानेवाले श्राद्धसे देवताओंसहित सम्पूर्ण विश्वको तृप्त करते हैं; फिर मेरे सामने क्यों निश्चेष्ट-से होकर उदासीन भाव धारण कर रहे हैं ? भक्तको सर्वस्व देनेवाले दयामय ! क्या इस समय आपने निर्दयता धारण कर ली है ? या यह कलियुगका प्रभाव है ? अथवा देर लगाकर आप मनुष्योंके सत्त्व (शुद्ध भाव एवं धैर्य) की परीक्षा ले रहे हैं या इस दासकी भगवत्सेवामें कितनी रुचि है, इसका निरीक्षण कर रहे हैं ?

गदाधर मया श्राद्धं यच्चीर्णं त्वत्प्रसादतः।
अनुजानीहि मां देव गमनाय गृहं प्रति ॥*

गदाधर ! आपकी कृपासे मैंने यहाँ श्राद्धका अनुष्ठान किया है; [इसे स्वीकार कीजिये और] देव ! अब मुझे घर जानेकी आज्ञा दीजिये।

एवं हि देवतानां च स्तोत्रं स्वर्गार्थदायकम्।
श्राद्धकाले पठेन्नित्यं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥
सर्वतीर्थसमं स्नानं श्रवणात्पठनाज्जपात् ॥
प्रयागस्य च गङ्गाया यमुनायाः स्तुतेर्द्विज।
श्रवणेन विनश्यन्ति दोषाश्चैव तु कर्मजाः ॥
(२३।५१, ५३, ५४)

इस प्रकार यह देवताओंका स्तोत्र स्वर्ग एवं अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें तथा प्रतिदिन स्नानके समय इसका पाठ करता है, उसे सब तीर्थोंमें स्नानके समान पुण्य होता है। इसके श्रवण, पाठ तथा जपसे उक्त फलकी सिद्धि होती है। ब्रह्मन् ! प्रयाग, गङ्गा तथा यमुनाकी स्तुतिका श्रवण करनेसे कर्मजन्य दोष नष्ट हो जाते हैं।


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* अध्याय २३ श्लोक १५से ५०तक।

१५१-तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य

उत्तरखण्ड ]
* तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य *
६१९


तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य

'शिवजी बोले— नारद! सुनो; अब मैं तुलसीका माहात्म्य बताता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त किये हुए पापसे छुटकारा पा जाता है। तुलसीका पत्ता, फूल, फल, मूल, शाखा, छाल, तना और मिट्टी आदि सभी पावन हैं।* जिनका मृत शरीर तुलसी-काष्ठकी आगसे जलाया जाता है, वे विष्णुलोकमें जाते हैं। मृत पुरुष यदि अगम्यागमन आदि महान् पापोंसे ग्रस्त हो, तो भी तुलसी-काष्ठकी अग्निसे देहका दाह-संस्कार होनेपर वह शुद्ध हो जाता है। जो मृत पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंमें तुलसीका काष्ठ देकर पश्चात् उसका दाह-संस्कार करता है, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है। जिसकी मृत्युके समय श्रीहरिका कीर्तन और स्मरण हो तथा तुलसीकी लकड़ीसे जिसके शरीरका दाह किया जाय, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यदि दाह-संस्कारके समय अन्य लकड़ियोंके भीतर एक भी तुलसीका काष्ठ हो तो करोड़ों पापोंसे युक्त होनेपर भी मनुष्यकी मुक्ति हो जाती है।† तुलसीकी लकड़ीसे मिश्रित होनेपर सभी काष्ठ पवित्र हो जाते हैं। तुलसी-काष्ठकी अग्निसे मृत मनुष्यका दाह होता देख विष्णुदूत ही आकर उसे वैकुण्ठमें ले जाते हैं; यमराजके दूत उसे नहीं ले जा सकते। वह करोड़ों जन्मोंके पापसे मुक्त हो भगवान् विष्णुको प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी-काष्ठकी अग्निमें जलाये जाते हैं, उन्हें विमानपर बैठकर वैकुण्ठमें जाते देख देवता उनके ऊपर पुष्पाञ्जलि चढ़ाते हैं। ऐसे पुरुषको देखकर भगवान् विष्णु और शिव संतुष्ट होते हैं तथा श्रीजनार्दन उसके सामने जा हाथ पकड़कर उसे अपने धाममें ले जाते हैं। जिस अग्निशाला अथवा श्मशानभूमिमें घीके साथ तुलसी-काष्ठकी अग्नि प्रज्वलित होती है, वहाँ जानेसे मनुष्योंका पातक भस्म हो जाता है।

जो ब्राह्मण तुलसी-काष्ठकी अग्निमें हवन करते हैं, उन्हें एक-एक सिक्थ (भातके दाने) अथवा एक-एक तिलमें अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जो भगवान्‌को तुलसी-काष्ठका धूप देता है, वह उसके फलस्वरूप सौ यज्ञानुष्ठान तथा सौ गोदानका पुण्य प्राप्त करता है। जो तुलसीकी लकड़ीकी आँचसे भगवान्‌का नैवेद्य तैयार करता है, उसका वह अन्न यदि थोड़ा-सा भी भगवान् केशवको अर्पण किया जाय तो वह मेरुके समान अन्नदानका फल देनेवाला होता है। जो तुलसी-काष्ठकी आगसे भगवान्‌के लिये दीपक जलाता है, उसे दस करोड़ दीप-दानका पुण्य प्राप्त होता है। इस लोकमें पृथ्वीपर उसके समान वैष्णव दूसरा कोई नहीं दिखायी देता। जो भगवान् श्रीकृष्णको तुलसी-काष्ठका चन्दन अर्पण करता तथा उनके श्रीविग्रहमें उस चन्दनको भक्तिपूर्वक लगाता है। वह सदा श्रीहरिके समीप रमण करता है। जो मनुष्य अपने अङ्गमें तुलसीकी कीचड़ लगाकर श्रीविष्णुका पूजन करता है, उसे एक ही दिनमें सौ दिनोंके पूजनका पुण्य मिल जाता है। जो पितरोंके पिण्डमें तुलसीदल मिलाकर दान करता है, उसके दिये हुए एक दिनके पिण्डसे पितरोंको सौ वर्षोंतक तृप्ति बनी रहती है। तुलसीकी जड़की मिट्टीके द्वारा विशेषरूपसे स्नान करना चाहिये। इससे जबतक वह मिट्टी शरीरमें लगी रहती है, तबतक स्नान करनेवाले पुरुषको तीर्थ-स्नानका फल मिलता है। जो तुलसीकी नयी मञ्जरीसे भगवान्‌की पूजा करता है, उसे नाना प्रकारके पुष्पोंद्वारा किये हुए पूजनका फल प्राप्त होता है। जबतक सूर्य और चन्द्रमा हैं, तबतक वह उसका पुण्य भोगता है। जिस घरमें तुलसी-वृक्षका बगीचा है, उसके दर्शन और स्पर्शसे भी ब्रह्महत्या आदि सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।


* पत्रं पुष्पं फलं मूलं शाखा त्वक् स्कन्धसंज्ञितम्। तुलसीसंभवं सर्वं पावनं मृत्तिकादिकम्॥ (२४।२)
† यद्येकं तुलसीकाष्ठं मध्ये काष्ठस्य तस्य हि। दाहकाले भवेन्मुक्तिः कोटिपापयुतस्य च॥ (२४।७)

६२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


जिस-जिस घर, गाँव अथवा वनमें तुलसीका वृक्ष हो, वहाँ-वहाँ जगदीश्वर श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त होकर निवास करते हैं। उस घरमें दरिद्रता नहीं रहती और बन्धुओंसे वियोग नहीं होता। जहाँ तुलसी विराजमान होती हैं, वहाँ दुःख, भय और रोग नहीं ठहरते। यों तो तुलसी सर्वत्र ही पवित्र होती हैं, किन्तु पुण्यक्षेत्रमें वे अधिक पावन मानी गयी हैं। भगवान्‌के समीप पृथ्वी-तलपर तुलसीको लगानेसे सदा विष्णुपद (वैकुण्ठ-धाम) की प्राप्ति होती है। तुलसीद्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होनेपर शान्तिकारक भगवान् श्रीहरि भयंकर उत्पातों, रोगों तथा अनेक दुर्निमित्तोंका भी नाश कर डालते हैं। जहाँ तुलसीकी सुगन्ध लेकर हवा चलती है, वहाँकी दसों दिशाएँ और चारों प्रकारके जीव पवित्र हो जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ ! जिस गृहमें तुलसीके मूलकी मिट्टी मौजूद है, वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा कल्याणमय भगवान् श्रीहरि सर्वदा स्थित रहते हैं। ब्रह्मन् ! तुलसी-वनकी छाया जहाँ-जहाँ जाती हो, वहाँ-वहाँ पितरोंकी तृप्तिके लिये तर्पण करना चाहिये।

नारद ! जहाँ तुलसीका समुदाय पड़ा हो, वहाँ किया हुआ पिण्डदान आदि पितरोंके लिये अक्षय होता है। तुलसीकी जड़में ब्रह्मा, मध्यभागमें भगवान् जनार्दन तथा मञ्जरीमें श्रीरुद्रदेवका निवास है; इसीसे वह पावन मानी गयी है। विशेषतः शिवमन्दिरमें यदि तुलसीका वृक्ष लगाया जाय तो उससे जितने बीज तैयार होते हैं, उतने ही युगोंतक मनुष्य स्वर्गलोकमें निवास करता है। जो पार्वण श्राद्धके अवसरपर, श्रावण मासमें तथा संक्रान्तिके दिन तुलसीका पौधा लगाता है, उसके लिये वह अत्यन्त पुण्यदायिनी होती है। जो प्रतिदिन तुलसीदलसे भगवान्‌की पूजा करता है, वह यदि दरिद्र हो तो धनवान् हो जाता है। तुलसीकी मूर्ति सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली होती है; वह श्रीकृष्णकी कीर्ति प्रदान करती है। जहाँ शालग्रामकी शिला होती है, वहाँ श्रीहरिका सांनिध्य बना रहता है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान काशीसे सौगुना अधिक महत्त्वशाली है। शालग्रामकी पूजासे कुरुक्षेत्र, प्रयाग तथा नैमिषारण्यकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जहाँ कहीं शालग्राममयी मुद्रा हो, वहाँ काशीका सारा पुण्य प्राप्त हो जाता है। मनुष्य ब्रह्महत्या आदि जो कुछ पाप करता है, वह सब शालग्रामशिलाकी पूजासे शीघ्र नष्ट हो जाता है।

महादेवजी कहते हैं—नारद ! अब मैं वेदोंमें कही हुई प्रयागतीर्थकी महिमाका वर्णन करूँगा। जो मनुष्य पुण्य-कर्म करनेवाले हैं, वे ही प्रयागमें निवास करते हैं। जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती—तीनों नदियोंका संगम है, वही तीर्थप्रवर प्रयाग है; वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इसके समान तीर्थ तीनों लोकोंमें न कोई हुआ है न होगा। जैसे ग्रहोंमें सूर्य और नक्षत्रोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब तीर्थोंमें प्रयाग नामक तीर्थ उत्तम है। विद्वन् ! जो प्रातःकाल प्रयागमें स्नान करता है, वह महान् पापसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। जो दरिद्रताको दूर करना चाहता हो, उसे प्रयागमें जाकर कुछ दान करना चाहिये। जो मनुष्य प्रयागमें जाकर वहाँ स्नान करता है, वह धनवान् और दीर्घजीवी होता है। वहाँ जाकर मनुष्य अक्षयवटका दर्शन करता है, उसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्याका पाप नष्ट होता है। उसे आदिवट कहा गया है। कल्पान्तमें भी उसका दर्शन होता है। उसके पत्रपर भगवान् विष्णु शयन करते हैं; इसलिये वह अविनाशी माना गया है। विष्णुभक्त मनुष्य प्रयागमें अक्षयवटका पूजन करते हैं। उस वृक्षमें सूत लपेटकर उसकी पूजा करनी चाहिये।

वहाँ 'माधव' नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णु नित्य विराजमान रहते हैं; उनका दर्शन अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष महापापोंसे छुटकारा पा जाता है। देवता, ऋषि और मनुष्य—सभी वहाँ अपने-अपने योग्य स्थानका आश्रय लेकर नित्य निवास करते हैं। गोहत्यारा, चाण्डाल, दुष्ट, दूषितहृदय, बालघाती तथा अज्ञानी मनुष्य भी यदि वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है तो चतुर्भुजरूप धारण करके सदा ही वैकुण्ठ-धाममें निवास करता है। जो मानव प्रयागमें माघ-स्नान करता है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलकी कोई गणना नहीं है। भगवान् नारायण प्रयागमें स्नान करनेवाले पुरुषोंको भोग और

उत्तरखण्ड ] * त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा * ६२१


मोक्ष प्रदान करते हैं। जैसे ग्रहोंमें सूर्य और नक्षत्रोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार महीनोंमें माघ मास श्रेष्ठ है। यह सभी कर्मोंके लिये उत्तम है। विद्वन् ! यह माघ-मकरका योग चराचर त्रिलोकीके लिये दुर्लभ है। जो इसमें यत्नपूर्वक सात, पाँच अथवा तीन दिन भी प्रयाग-स्नान कर लेता है, उसका अभ्युदय होता है। मनुष्य आदि चराचर जीव प्रयाग तीर्थका सेवन करके वैकुण्ठलोकको प्राप्त होते हैं। दिव्यलोकमें रहनेवाले जो वसिष्ठ और सनकादि ऋषि हैं, वे भी प्रयागतीर्थका बारंबार सेवन करते हैं। विष्णु, रुद्र और इन्द्र भी तीर्थप्रवर प्रयागमें निवास करते हैं। प्रयागमें दान और नियमोंके पालनकी प्रशंसा होती है। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे पुनर्जन्म नहीं होता।


★ त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा

नारदजी बोले— भगवन् ! आपकी कृपासे मैंने तुलसीके माहात्म्यका श्रवण किया। अब त्रिरात्र तुलसी-व्रतका वर्णन कीजिये।

महादेवजीने कहा— विद्वन् ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो, सुनो; यह व्रत बहुत पुराना है। इसका श्रवण करके मनुष्य निश्चय ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। नारद ! व्रत करनेवाला पुरुष कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको नियम ग्रहण करे। पृथ्वीपर सोये और इन्द्रियोंको काबूमें रखे। त्रिरात्रव्रत करनेके उद्देश्यसे वह शौच-स्नानसे शुद्ध हो मनको संयममें रखते हुए प्रतिदिन रातको नियमपूर्वक तुलसीवनके समीप शयन करे। मध्याह्न-कालमें नदी आदिके निर्मल जलमें स्नान करके विधि-पूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। इस व्रतमें पूजाके लिये लक्ष्मी और श्रीविष्णुकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये तथा उनके लिये दो वस्त्र भी तैयार करा लेने चाहिये। वस्त्र पीत और श्वेत वर्णके हों। व्रतके आरम्भमें विधिपूर्वक नवग्रह-शान्ति कराये, उसके बाद चरु पकाकर उसके द्वारा श्रीविष्णु देवताकी प्रीतिके लिये हवन करे। द्वादशीके दिन देवदेवेश्वर भगवान्‌की यत्नपूर्वक पूजा करके विधिके अनुसार कलश-स्थापन करे। कलश शुद्ध हो और फूटा-टूटा न हो। उसमें पञ्चरत्न, पञ्चपल्लव तथा ओषधियाँ पड़ी हों। कलशके ऊपर एक पात्र रखे और उसके भीतर लक्ष्मीजीके साथ भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको विराजमान करे। फिर वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए तुलसी-वृक्षके मूलमें भगवत्प्रतिमाकी स्थापना करे। तुलसीकी वाटिकाको केवल जलसे सींचे। फिर देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान्‌को पञ्चामृतसे स्नान कराकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

प्रार्थना-मन्त्र

योजनन्तरूपोऽखिलविश्वरूपो
गर्भोदके लोकविधिं बिभर्ति।
प्रसीदतामेष स देवदेवो
यो मायया विश्वकृदेव रूपी ॥

'जिनके रूपका कहीं अन्त नहीं है, सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो गर्भरूप (आधारभूत) जलमें स्थित होकर लोकसृष्टिका भरण-पोषण करते हैं और मायासे ही रूपवान् होकर समस्त संसारकी सृष्टि करते हैं, वे देवदेव परमेश्वर मुझपर प्रसन्न हों।'

आवाहन-मन्त्र

आगच्छाच्युत देवेश तेजोरराशे जगत्पते।
सदैव तिमिरध्वंसिंस्त्राहि मां भवसागरात् ॥

'हे अच्युत ! हे देवेश्वर ! हे तेजःपुञ्ज जगदीश्वर ! यहाँ पधारिये; आप सदा ही अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले हैं, इस भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये।'

स्नान-मन्त्र

पञ्चामृतेन सुस्नातस्तथा गन्धोदकेन च।
गङ्गादीनां च तोयेन स्नातोऽनन्तः प्रसीदतु ॥

'पञ्चामृत और चन्दनयुक्त जलसे भलीभाँति नहाकर गङ्गा आदि नदियोंके जलसे स्नान किये हुए भगवान् अनन्त मुझपर प्रसन्न हों।'

६२२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ****************************************************************************************

विलेपन-मन्त्र श्रीखण्डागुरुकर्पूरकुङ्कुमादिविलेपनम् ।
भक्त्या दत्तंमयाऽऽघ्रेयं लक्ष्म्या सह गृहाण वै ॥
'भगवन् ! मैंने चन्दन, अरगजा, कपूर और केसर आदिका सुगन्धित अङ्गराग भक्तिपूर्वक अर्पण किया है; आप श्रीलक्ष्मीजीके साथ इसे स्वीकार करें।'

वस्त्र-मन्त्र नारायण नमस्तेऽस्तु नरकार्णवतारण ।
त्रैलोक्याधिपते तुभ्यं ददामि वसनं शुचि ॥
'नरकके समुद्रसे तारनेवाले नारायण ! आपको नमस्कार है। त्रिलोकीनाथ ! मैं आपको पवित्र वस्त्र अर्पण करता हूँ।'

यज्ञोपवीत-मन्त्र दामोदर नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात् ।
ब्रह्मसूत्रं मया दत्तं गृहाण पुरुषोत्तम ॥
'दामोदर ! आपको नमस्कार है, भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। पुरुषोत्तम ! मैंने ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत) अर्पण किया है, आप इसे ग्रहण करें।'

पुष्प-मन्त्र पुष्पाणि च सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो ।
मया दत्तानि देवेश प्रीतितः प्रतिगृह्यताम् ॥
'प्रभो ! मैंने मालती आदिके सुगन्धित पुष्प सेवामें प्रस्तुत किये हैं, देवेश्वर ! आप इन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें।'

नैवेद्य-मन्त्र नैवेद्यं गृह्यतां नाथ भक्ष्यभोज्यैः समन्वितम् ।
सर्वै रसैः सुसम्पन्नं गृहाण परमेश्वर ॥
'नाथ ! भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त नैवेद्य स्वीकार कीजिये; परमेश्वर ! यह सब रसोंसे सम्पन्न है, इसे ग्रहण करें।'

ताम्बूल-मन्त्र पूगानि नागपत्राणि कर्पूरसहितानि च ।
मया दत्तानि देवेश ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
'देवेश्वर ! मैंने सुपारी, पानके पत्ते और कपूर आपकी सेवामें भेंट किये हैं; आप यह बीड़ा स्वीकार करें।'

तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक धूप, अगर तथा घी मिलाया हुआ गुग्गुल—इनकी आहुति देकर भगवान्‌को सुँघाये। इस प्रकार पूजा करनी चाहिये। घीका दीपक जलाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ ! एकाग्रचित्त हो भगवान् श्रीलक्ष्मी-नारायणके सामने तथा तुलसीवनके समीप नाना प्रकारका दीपक सजाना चाहिये। चक्रधारी देवाधिदेव विष्णुको प्रतिदिन अर्घ्य भी देना चाहिये। पुत्र-प्राप्तिके लिये नवमीको नारियलका अर्घ्य देना उत्तम है। धर्म, काम तथा अर्थ—तीनोंकी सिद्धिके लिये दशमीको बिजौरेका अर्घ्य अर्पण करना उचित है तथा एकादशीको अनारसे अर्घ्य देना चाहिये; इससे सदा दरिद्रताका नाश होता है। नारद ! बाँसके पात्रमें सप्तधान्य रखकर उसमें सात फल रखे; फिर तुलसीदल, फूल एवं सुपारी डालकर उस पात्रको वस्त्रसे ढक दे। तत्पश्चात् उसे भगवान्‌के सम्मुख निवेदन करे। विप्रेन्द्र ! अर्घ्य निम्नाङ्कित मन्त्रसे देना चाहिये; इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो—

अर्घ्य-मन्त्र तुलसीसहितो देव सदा शङ्खेन संयुतम् ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं देवदेव नमोऽस्तु ते ॥
'देव ! आप तुलसीजीके साथ मेरे दिये हुए इस शङ्खयुक्त अर्घ्यको ग्रहण करें। देवदेव ! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार लक्ष्मीसहित देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करके व्रतकी पूर्तिके निमित्त उन देवदेवेश्वरसे प्रार्थना करे—
उपोषितोऽहं देवेश कामक्रोधविवर्जितः ।
व्रतेनानेन देवेश त्वमेव शरणं मम ॥
गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यदपूर्णं कृतं मया ।
सर्वं तदस्तु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥
नमः कमलपत्राक्ष नमस्ते जलशायिने ।
इदं व्रतं मया चीर्णं प्रसादात्तव केशव ॥

उत्तरखण्ड ] * अन्नदान, जलदान, तड़ाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा * ६२३


अज्ञानतिमिरध्वंसिन् व्रतेनानेन केशव ।
प्रसादसुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥*

'देवेश्वर ! मैंने काम-क्रोधसे रहित होकर इस व्रतके द्वारा उपवास किया है। देवेश ! आप ही मेरे शरणदाता हैं। देव ! जनार्दन ! इस व्रतको ग्रहण करके मैंने इसके जिस अङ्गकी पूर्ति न की हो, वह सब आपके प्रसादसे पूर्ण हो जाय। कमलनयन ! आपको नमस्कार है। जलशायी नारायण ! आपको प्रणाम है। केशव ! आपके ही प्रसादसे मैंने इस व्रतका अनुष्ठान किया है। अज्ञानान्धकारका विनाश करनेवाले केशव ! आप इस व्रतसे प्रसन्न होकर मुझे ज्ञान-दृष्टि प्रदान करें।'

तदनन्तर रातमें जागरण, गान तथा पुस्तकका स्वाध्याय करे। गानविद्या तथा नृत्यकलामें प्रवीण पुरुषोंद्वारा संगीत और नृत्यकी व्यवस्था करे। अत्यन्त सुन्दर एवं पवित्र उपाख्यानोंके द्वारा रात्रिका समय व्यतीत करे। निशाके अन्तमें प्रभात होनेपर जब सूर्यदेवका उदय हो जाय, तब ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके भक्तिपूर्वक वैष्णव श्राद्ध करे। यज्ञोपवीत, वस्त्र, माला तथा चन्दन देकर वस्त्राभूषण एवं केसरके द्वारा पूजनपूर्वक तीन ब्राह्मण-दम्पतीको भोजन कराये। घृत-मिश्रित खीरके द्वारा यथेष्ट भोजन करानेके पश्चात् दक्षिणासहित पान, फूल और गन्ध आदि दान करे। अपनी शक्तिके अनुसार बाँसके अनेक पात्र बनवाकर उन्हें पके हुए नारियल, पकवान, वस्त्र तथा भाँति-भाँतिके फलोंसे भरे। सपत्नीक आचार्यको वस्त्र पहनाये। दिव्य आभूषण देकर चन्दन और मालासे उनका पूजन करे। फिर उन्हें सब सामग्रियोंसे युक्त दूध देनेवाली गौ दान करे। गौके साथ दक्षिणा, वस्त्र, आभूषण, दोहनपात्र तथा अन्यान्य सामग्री भी दे। श्रीलक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा भी सब सामग्रियोंसहित आचार्यको दे। सब तीर्थोंमें स्नान करनेवाले मनुष्योंको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सब इस व्रतके द्वारा देव-देव विष्णुके प्रसादसे प्राप्त हो जाता है। व्रत करनेवाला पुरुष इस लोकमें मनको प्रिय लगनेवाला सम्पूर्ण पदार्थों और प्रचुर भोगोंका उपभोग करके अन्तमें श्रीविष्णुकी कृपासे भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होता है।


अन्नदान, जलदान, तड़ाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा

नारदजीने पूछा— भगवन्! गुणोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देनेकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य इस लोकमें किन-किन वस्तुओंका दान करे ? यह सब बताइये।

महादेवजी बोले— देवर्षिप्रवर ! सुनो—लोकमें तत्त्वको जानकर सज्जन पुरुष अन्नदानकी ही प्रशंसा करते हैं; क्योंकि सब कुछ अन्नमें ही प्रतिष्ठित है। अतएव साधु महात्मा विशेषरूपसे अन्नका ही दान करना चाहते हैं। अन्नके समान कोई दान न हुआ है न होगा। यह चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। लोकमें अन्न ही बलवर्धक है। अन्नमें ही प्राणोंकी स्थिति है। कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको उचित है कि वह अपने कुटुम्बको कष्ट देकर भी अन्नकी भिक्षा माँगनेवाले महात्मा ब्राह्मणको अवश्य दान दे। नारद ! जो याचना करनेवाले पीड़ित ब्राह्मणको अन्न दे, वही विद्वानोंमें श्रेष्ठ है। यह दान आत्माके पारलौकिक सुखका साधन है। रास्तेका थका-माँदा गृहस्थ ब्राह्मण यदि भोजनके समय घरपर आकर उपस्थित हो जाय तो कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अवश्य उसे अन्न देना चाहिये। अन्नदाता इहलोक और परलोकमें भी सुख उठाता है। थके-माँदे अपरिचित राहगीरको जो बिना क्लेशके अन्न देता है, वह सब धर्मोंका फल प्राप्त करता है। अतिथिकी न तो निन्दा करे और न उससे द्रोह ही रखे। उसे अन्न अर्पण करे। उस दानकी विशेष प्रशंसा है।

महामुने ! जो मनुष्य अन्नसे देवताओं, पितरों,


* उत्तरखण्डके २६वें अध्यायसे उद्धृत।

६२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


ब्राह्मणों तथा अतिथियोंको तृप्त करता है, उसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। महान् पाप करके भी जो याचकको—विशेषतः ब्राह्मणको अन्न-दान करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। ब्राह्मणको दिया हुआ दान अक्षय होता है। शूद्रको भी किया हुआ अन्न-दान महान् फल देनेवाला है। अन्न-दान करते समय याचकसे यह न पूछे कि वह किस गोत्र और किस शाखाका है, तथा उसने कितना अध्ययन किया है ? अन्नका अभिलाषी कोई भी क्यों न हो, उसे दिया हुआ अन्न-दान महान् फल देनेवाला होता है। अतः मनुष्योंको इस पृथ्वीपर विशेष रूपसे अन्नका दान करना चाहिये।

जलका दान भी श्रेष्ठ है; वह सदा सब दानोंमें उत्तम है। इसलिये बावली, कुआँ और पोखरा बनवाना चाहिये। जिसके खोदे हुए जलाशयमें गौ, ब्राह्मण और साधु पुरुष सदा पानी पीते हैं, वह अपने कुलको तार देता है। नारद ! जिसके पोखरेमें गर्मीके समयतक पानी ठहरता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकटका सामना नहीं करता। पोखरा बनवानेवाला पुरुष तीनों लोकोंमें सर्वत्र सम्मानित होता है। मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ और कामका यही फल बतलाते हैं कि देशमें खेतके भीतर उत्तम पोखरा बनवाया जाय, जो प्राणियोंके लिये महान् आश्रय हो। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणी भी जलाशयका आश्रय लेते हैं। जिसके पोखरेमें केवल वर्षा ऋतुमें ही जल रहता है, उसे अग्निहोत्रका फल मिलता है। जिसके तालाबमें हेमन्त और शिशिर कालतक जल ठहरता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। यदि वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुकता हो तो मनीषी पुरुष अतिरात्र और अश्वमेध यज्ञोंका फल बतलाते हैं।

अब वृक्ष लगानेके जो लाभ हैं, उनका वर्णन सुनो। महामुने ! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने भूतकालीन पितरों तथा होनेवाले वंशजोंका भी उद्धार कर देता है। इसलिये वृक्षोंको अवश्य लगाना चाहिये। वह पुरुष परलोकमें जानेपर वहाँ अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है। वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, पत्तोंसे पितरोंका तथा छायासे समस्त अतिथियोंका पूजन करते हैं। किन्नर, यक्ष, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मानव तथा ऋषि भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं। वृक्ष फूल और फलोंसे युक्त होकर इस लोकमें मनुष्योंको तृप्त करते हैं। वे इस लोक और परलोकमें भी धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो पोखरेके किनारे वृक्ष लगाते, यज्ञानुष्ठान करते तथा जो सदा सत्य बोलते हैं, वे कभी स्वर्गसे भ्रष्ट नहीं होते।

सत्य ही परम मोक्ष है, सत्य ही उत्तम शास्त्र है, सत्य देवताओंमें जाग्रत् रहता है तथा सत्य परम पद है। तप, यज्ञ, पुण्यकर्म, देवर्षि-पूजन, आद्यविधि और विद्या—ये सभी सत्यमें प्रतिष्ठित हैं। सत्य ही यज्ञ, दान, मन्त्र और सरस्वती देवी हैं; सत्य ही व्रतचर्या है तथा सत्य ही ॐकार है। सत्यसे ही वायु चलती है, सत्यसे ही सूर्य तपता है, सत्यके प्रभावसे ही आग जलती है तथा सत्यसे ही स्वर्ग टिका हुआ है। लोकमें जो सत्य बोलता है, वह सब देवताओंके पूजन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। एक हजार अश्वमेध यज्ञका पुण्य और सत्य—इन दोनोंको यदि तराजूपर रखकर तौला जाय तो सम्पूर्ण यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा। देवता, पितर और ऋषि सत्यमें ही विश्वास करते हैं। सत्यको ही परम धर्म और सत्यको ही परम पद कहते हैं। * सत्यको


* सत्यमेव परो मोक्षः सत्यमेव परं श्रुतम्। सत्यं देवेषु जागर्ति सत्यं च परमं पदम्॥
तपो यज्ञाश्च पुण्यं च तथा देवर्षिपूजनम्। आद्यो विधिश्च विद्या च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्यं यज्ञस्तथा दानं मन्त्रो देवी सरस्वती। व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च॥
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः। सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्येन तिष्ठति॥
पूजनं सर्वदेवानां सर्वतीर्थावगाहनम्। सत्यं च वदते लोके सर्वमाप्नोत्यसंशयः॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। सर्वेषां सर्वयज्ञानां सत्यमेव विशिष्यते॥
सत्ये देवाः प्रतीयन्ते पितरो ऋषयस्तथा। सत्यमाहुः परं धर्मं सत्यमाहुः परं पदम्॥ (२८। २०—२६)

उत्तरखण्ड ] * अन्नदान, जलदान, तडाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा * ६२५ ****************************************************************************************

परब्रह्मका स्वरूप बताया गया है; इसलिये मैं तुम्हें सत्यका उपदेश करता हूँ। सत्यपरायण मुनि अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके सत्यधर्मका पालन करते हुए इस लोकसे स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। सदा सत्य ही बोलना चाहिये, सत्यसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। सत्यरूपी तीर्थ अगाध, विस्तृत एवं पवित्र ह्रद (कुण्ड) से युक्त है; योगयुक्त पुरुषोंको उसमें मनसे स्नान करना चाहिये। यही स्नान उत्तम माना गया है। जो मनुष्य अपने, पराये अथवा पुत्रके लिये भी असत्य भाषण नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं। ब्राह्मणोंमें वेद, यज्ञ तथा मन्त्र नित्य निवास करते हैं; किन्तु जो ब्राह्मण सत्यका परित्याग कर देते हैं, उनमें वेद आदि शोभा नहीं देते; अतः सत्य-भाषण करना चाहिये।

नारदजीने कहा— भगवन् ! अब मुझे विशेषतः तपस्याका फल बताइये; क्योंकि प्रायः सभी वर्णोंका तथा मुख्यतः ब्राह्मणोंका तपस्या ही बल है।

महादेवजी बोले— नारद ! तपस्याको श्रेष्ठ बताया गया है। तपसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं, वे सदा देवताओंके साथ आनन्द भोगते हैं। तपसे मनुष्य मोक्ष पा लेता है, तपसे 'महत्' पदकी प्राप्ति होती है। मनुष्य अपने मनसे ज्ञान-विज्ञानका खजाना, सौभाग्य और रूप आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे तपस्यासे मिल जाती है। जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे कभी ब्रह्मलोकमें नहीं जाते। पुरुष जिस किसी कार्यका उद्देश्य लेकर तप करता है, वह सब इस लोक और परलोकमें उसे प्राप्त हो जाता है। शराबी, परस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी-जैसा पापी भी तपस्याके बलसे सबसे पार हो जाता है—सब पापोंसे छुटकारा पा लेता है।* तपस्याके प्रभावसे छियासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि स्वर्गमें रहकर देवताओंके साथ आनन्द भोग रहे हैं। तपस्यासे राज्य प्राप्त होता है। इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवता और असुरोंने तपस्यासे ही सदा सबका पालन किया है। तपस्यासे ही वे वृत्तिदाता हुए हैं। सम्पूर्ण लोकोंके हितमें लगे रहनेवाले दोनों देवता सूर्य और चन्द्रमा तपसे ही प्रकाशित होते हैं। नक्षत्र और ग्रह भी तपस्यासे ही कान्तिमान् हुए हैं। तपस्यासे मनुष्य सब कुछ पा लेता है, सब सुखोंका अनुभव करता है।

मुने ! जो जंगलमें फल-मूल खाकर तपस्या करता है तथा जो पहले केवल वेदका अध्ययन ही करता है—वे दोनों समान हैं। वह अध्ययन तपस्याके ही तुल्य है। श्रेष्ठ द्विज वेद पढ़ानेसे जो पुण्य प्राप्त करता है, स्वाध्याय और जपसे इसकी अपेक्षा दूना फल पा जाता है। जो सदा तपस्या करते हुए शास्त्रके अभ्याससे ज्ञानोपार्जन करता है और लोकको उस ज्ञानका बोध कराता है, वह परम पूजनीय गुरु है। पुराणवेत्ता पुरुष दानका सबसे श्रेष्ठ पात्र है। वह पतनसे त्राण करता है, इसलिये पात्र कहलाता है। जो लोग सुपात्रको धन, धान्य, सुवर्ण तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र-दान करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो श्रेष्ठ पात्रको गौ, भैंस, हाथी और सुन्दर-सुन्दर घोड़े दान करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें अश्वमेधके अक्षय फलको प्राप्त होता है। जो सुपात्रको जोती-बोयी एवं फलसे भरी हुई सुन्दर भूमि दान करता है, वह अपने दस पीढ़ी पहलेके पूर्वजों और दस पीढ़ी बादतककी संतानोंको तार देता है तथा दिव्य विमानसे विष्णुलोकको जाता है। देवगण पुस्तक बाँचनेसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें यज्ञोंसे, प्रोक्षण (अभिषेक) से तथा फूलोंद्वारा की हुई पूजाओंसे भी नहीं होता। जो भगवान् विष्णुके मन्दिरमें धर्म-ग्रन्थका पाठ कराता है तथा देवी, शिव, गणेश और सूर्यके


* तपो हि परमं प्रोक्तं तपसा विन्दते फलम्। तपोरता हि ये नित्यं मोदन्ते सह दैवतैः ॥
तपसा मोक्षमाप्नोति तपसा विन्दते महत्। ज्ञानविज्ञानसम्पत्तिः सौभाग्यं रूपमेव च ॥
तपसा लभ्यते सर्वं मनसा यद्यदिच्छति। नातप्ततपसो यान्ति ब्रह्मलोकं कदाचन ॥
यत्कार्यं किञ्चिदास्थाय पुरुषस्तप्यते तपः। तत्सर्वं समवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥
सुरापः परदारी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः। तपसा तरते सर्वं सर्वतश्च विमुच्यते ॥ (२८।३५-३९)