भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 626

पातालखण्ड ] * भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान * ६०९ ********************************************************************************************************

मीठी-मीठी तोतली वाणी साफ समझमें नहीं आती।

भगवान्‌के प्रति दृढ़ अनुराग रखनेवाली सुन्दरी गोपाङ्गनाएँ भी उन्हें प्रेमपूर्ण दृष्टिसे निहारती हुई सब ओरसे घेरकर खड़ी हैं। गोपी, गोप और पशुओंके घेरेसे बाहर भगवान्‌के सामनेकी ओर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि देवताओंका समुदाय खड़ा होकर स्तुति कर रहा है।

तद्वद् दक्षिणतो मुनिकरं दृढधर्मवाञ्छया समाम्नायपरम्।
योगीन्द्रानथ पृष्ठे मुमुक्षमाणान् समाधिना तु सनकाद्यान् ॥

इसी प्रकार उपर्युक्त घेरेसे बाहर भगवान्‌के दक्षिण भागमें सुदृढ़ धर्मकी अभिलाषासे वेदाभ्यासपरायण मुनियोंका समुदाय उपस्थित है तथा पृष्ठभागकी ओर समाधिके द्वारा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले सनकादि योगीश्वर खड़े हैं।

सव्ये सकान्तानथ यक्षसिद्धान्
गन्धर्वविद्याधरचारणांश्च ।
सकिन्नरानप्सरसश्च मुख्याः
कामाथिनीर्नर्तनगीतवाद्यैः ॥

वाम भागमें अपनी स्त्रियोंसहित यक्ष, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण और किन्नर खड़े हैं। साथ ही भगवत्प्रेमकी इच्छा रखनेवाली मुख्य-मुख्य अप्सराएँ भी मौजूद हैं। ये सब लोग नाचने, गाने तथा बजानेके द्वारा भगवान्‌की सेवा कर रहे हैं।

शङ्खेन्दुकुन्दधवलं सकलागमज्ञं
सौदामनीततिपिशङ्गजटाकलापम् ।
तत्पादपङ्कजगतानमलां च भक्तिं
वाञ्छन्तमुज्झिततरान्यसमस्तसङ्गम् ॥
नानाविधश्रुतिगणान्वितसप्तराग-
ग्रामत्रयीगतमनोहरमूर्च्छनाभिः ।
सम्प्रीणयन्तमुदिताभिरपि प्रभक्त्या
संचिन्तयेन्नभसि मां द्रुहिणप्रसूतम् ॥

तत्पश्चात् आकाशमें स्थित मुझ ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारदका चिन्तन करना चाहिये। नारदजीके शरीरका वर्ण शङ्ख, चन्द्रमा तथा कुन्दके समान गौर है; वे सम्पूर्ण आगमोंके ज्ञाता हैं, उनकी जटाएँ बिजलीकी पङ्क्तियोंके समान पीली और चमकीली हैं, वे भगवान्‌के चरण-कमलोंकी निर्मल भक्तिके इच्छुक हैं तथा अन्य सब ओरकी आसक्तियोंका सर्वथा परित्याग कर चुके हैं और संगीतसम्बन्धी नाना प्रकारकी श्रुतियोंसे युक्त सात स्वरों और त्रिविध ग्रामोंकी मनोहर मूर्च्छनाओंको अभिव्यञ्जित करके अत्यन्त भक्तिके साथ भगवान्‌को प्रसन्न कर रहे हैं।

इति ध्यात्वाऽऽत्मानं पटुविशदधीर्नन्दनतनयं
नरो बौद्धैर्घ्यप्रभृतिभिरनिन्द्योपहृतिभिः ।
यजेद् भूयो भक्त्या स्ववपुषि बहिष्ठैश्च विभवै-
रिति प्रोक्तं सर्वं यदभिलषितं भूसुरवराः ॥*

इस प्रकार प्रखर एवं निर्मल बुद्धिवाला पुरुष अपने आत्मस्वरूप भगवान् नन्दनन्दनका ध्यान करके मानसिक अर्घ्य आदि उत्तम उपहारोंसे अपने शरीरके भीतर ही भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे तथा बाह्य उपचारोंसे भी उनकी आराधना करे। ब्राह्मणो ! आपलोगोंकी जैसी अभिलाषा थी, उसके अनुसार भगवान्‌का यह सम्पूर्ण ध्यान मैंने बता दिया।

**सूतजी कहते हैं—**महर्षिगण ! जो इस कथाको सुनाता है, वह भगवान्‌के समान हो जाता है। विप्रो ! यह गुह्यसे भी गुह्य प्रसङ्ग कल्याणमय ज्ञान प्रदान करनेवाला है। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम-पदको प्राप्त होता है।

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॥ पातालखण्ड सम्पूर्ण ॥
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* ये ध्यानसम्बन्धी श्लोक अध्याय १९ से लिये गये हैं।