भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 625

६०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


चारूरुजानुमनुवृत्तमनोज्ञजङ्घं<br>कान्तोन्नतप्रपदनन्दितकूर्मकान्तिम् ।<br>माणिक्यदर्पणलसन्नखराजिराज-<br>द्रक्ताङ्गुलिच्छदनसुन्दरपादपद्मम् ॥<br>दोनों जाँघें और घुटने सुन्दर हैं; पिंडलियोंका भाग गोलाकार एवं मनोहर है; पादाग्रभाग परम कान्तिमान् तथा ऊँचा है और अपनी शोभासे कछुएके पृष्ठभागकी कान्तिको मलिन कर रहा है तथा दोनों चरण-कमल माणिक्य तथा दर्पणके समान स्वच्छ नखपङ्क्तियोंसे सुशोभित लाल-लाल अङ्गुलिदलोंके कारण बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं।थनोंके भारसे लड़खड़ाती हुई मन्द-मन्द गतिसे चलनेवाली गौएँ दाँतोंके अग्रभागमें चबानेसे बचे हुए तिनकोंके अङ्कुर लिये, पूँछ लटकाये भगवान्के मुखकमलमें आँखें गड़ाये उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हैं।
मत्स्याङ्कुशारिदरकेतुयवाब्जवज्रैः<br>संलक्षितारुणकराङ्घ्रितलाभिरामम् ।<br>लावण्यसारसमुदायविनिर्मिताङ्गं<br>सौन्दर्यनिन्दित मनोभवदेहकान्तिम् ॥<br>मत्स्य, अङ्कुश, चक्र, शङ्ख, पताका, जौ, कमल और वज्र आदि चिह्नोंसे चिह्नित लाल-लाल हथेलियों तथा तलवोंसे भगवान् बड़े मनोहर प्रतीत हो रहे हैं। उनका श्रीअङ्ग लावण्यके सार-संग्रहसे निर्मित जान पड़ता है तथा उनके सौन्दर्यके सामने कामदेवके शरीरकी कान्ति फीकी पड़ जाती है।सम्भ्रस्तस्तनविभूषणपूर्णनिश्च-<br>लास्याद् दृढक्षरत्फेनिलदुग्धमुग्धैः ।<br>वेणुप्रवर्तितमनोहरमन्दगीत-<br>दत्तोर्ध्वकर्णयुगलैरपि तर्णकैश्च ॥<br>गौओंके साथ ही छोटे-छोटे बछड़े भी भगवान्को सब ओरसे घेरे हुए हैं और मुरलीसे मन्दस्वरमें जो मनोहर संगीतकी धारा बह रही है, उसे वे कान लगाकर सुन रहे हैं, जिसके कारण उनके दोनों कान खड़े हो गये हैं। गौओंके टपकते हुए थनोंके आभूषणरूप दूधसे भरे हुए उनके मुख स्थिर हैं, जिनसे फेनयुक्त दूध बह रहा है; इससे वे बछड़े बड़े मनोहर प्रतीत हो रहे हैं।
आस्यारविन्दपरिपूरितवेणुरन्ध्र-<br>लोलत्कराङ्गुलिसमीरितदिव्यरागैः ।<br>शश्वद्द्रवैः कृतनविष्टसमस्तजन्तु-<br>सन्तानसंततिमलन्तसुखाम्बुराशिम् ॥<br>भगवान् अपने मुखारविन्दसे मुरली बजा रहे हैं; उस समय मुरलीके छिद्रोंपर उनकी अँगुलियोंके फिरनेसे निरन्तर दिव्य रागोंकी सृष्टि हो रही है, जिनसे प्रभावित हो समस्त जीव-जन्तु जहाँ-के-तहाँ बैठकर भगवान्की ओर मस्तक टेक रहे हैं। भगवान् गोविन्द अनन्त आनन्दके समुद्र हैं।गोपैः समानगुणशीलवयोविलास-<br>वेशैश्च मूर्च्छितकलस्वनवेणुवीणैः ।<br>मन्दोच्चतारपटुगानपरैर्विलोल-<br>दोर्वल्लरीललितलास्यविधानदक्षैः ॥<br>भगवान्के ही समान गुण, शील, अवस्था, विलास तथा वेष-भूषावाले गोप भी, जो अपनी चञ्चल भुजाओंको सुन्दर ढंगसे नचानेमें चतुर हैं, वंशी और वीणाकी मधुर ध्वनिका विस्तार करके मन्द, उच्च और तारस्वरमें कुशलतापूर्वक गान करते हुए भगवान्को सब ओरसे घेरकर खड़े हैं।
गोभिर्मुखाम्बुजविलीनविलोचनाभि-<br>रूधोभरस्खलितमन्थरमन्दगाभिः ।<br>दन्ताग्रदष्टपरिशिष्टतृणाङ्कुराभि-<br>रालम्बिवालधिलताभिरथाभिवीतम् ॥जङ्घान्तपीवरकटीरतटीनिवद्ध-<br>व्यालोलकिङ्किणिघटारणितैरटद्भिः ।<br>मुग्धैस्तरक्षुनखकल्पितकान्तभूषै-<br>रव्यक्तमञ्जुवचनैः पृथुकैः परीतम् ॥<br>छोटे-छोटे ग्वाल-बाल भी भगवान्के चारों ओर घूम रहे हैं; जाँघसे ऊपर उनके मोटे कटिभागमें करधनी पहनायी गयी है, जिसकी क्षुद्रघण्टिकाओंकी मधुर झनकार सुनायी पड़ती है। वे भोले-भाले बालक बघनखोंके सुन्दर आभूषण पहने हुए हैं। उनकी