भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * अश्वका गात्र-स्तम्भ तथा एक ब्राह्मणका राक्षसयोनिसे उद्धार * ५०१


डाला जाता है और वे वीर्य पीकर ही रहते हैं। जो लोग चोर, आग लगानेवाले, दुष्ट, जहर देनेवाले और गाँवोंको लूटनेवाले हैं, वे महापातकी जीव 'सारमेयादन' नरकमें गिराये जाते हैं। जो पापराशिका संचय करनेवाला पुरुष झूठी गवाही देता या बलपूर्वक दूसरोंका धन छीन लेता है, वह पापी 'अवीचि' नामक नरकमें नीचे सिर करके डाल दिया जाता है। उसमें महान् दुःख भोगनेके पश्चात् वह पुनः अत्यन्त पापमयी योनिमें जन्म लेता है। जो मूढ सुरापान करता है, उसे धर्मराजके दूत गरम-गरम लोहेका रस पिलाते हैं। जो। अपनी विद्या और आचारके घमंडमें आकर गुरुजनोंका अनादर करता है, वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् 'क्षार' नरकमें नीचे मुँह करके गिराया जाता है। जो लोग धर्मसे बहिष्कृत होकर विश्वासघात करते हैं, उन्हें अत्यन्त यातनापूर्ण 'शूलप्रोत' नरकमें डाला जाता है। जो चुगली करके सब लोगोंको अपने वचनसे उद्वेगमें डाला करता है, वह 'दंदशूक' नामक नरकमें पड़कर दंदशूकों (सर्पों) द्वारा डँसा जाता है। राजन् ! इस प्रकार पापियोंके लिये अनेकों नरक हैं; पाप करके वे उन्हींमें जाते और अत्यन्त भयङ्कर यातना भोगते हैं। जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी कथा नहीं सुनी है तथा दूसरोंका उपकार नहीं किया है, उनको नरकके भीतर सब तरहके दुःख भोगने पड़ते हैं। इस लोकमें भी जिसको अधिक सुख प्राप्त है, उसके लिये वह स्वर्ग कहलाता है तथा जो रोगी और दुःखी हैं, वे नरकमें ही हैं।

दान-पुण्यमें लगे रहने, तीर्थ आदिका सेवन करने, श्रीरघुनाथजीकी लीलाओंको सुनने अथवा तपस्या करनेसे पापोंका नाश होता है। हरिकीर्तनरूपी नदी ही मनुष्योंके लिये सब उपायोंसे श्रेष्ठ है। वह पापियोंके सारे पाप-पङ्कको धो डालती है। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।* जो भगवान्का अपमान करता है, उसे गङ्गा भी नहीं पवित्र कर सकती। पवित्रोंसे पवित्र तीर्थ भी उसे पावन बनानेकी शक्ति नहीं रखते। जो ज्ञानहीन होनेके कारण भगवान्के लीला-कीर्तनका उपहास करता है, उसको कल्पके अन्ततक भी नरकसे छुटकारा नहीं मिलता। राजन् ! अब तुम जाओ और घोड़ेको संकटसे छुड़ानेके लिये सेवकोंसहित भगवान्का चरित्र सुनाओ, जिससे अश्वमें पुनः चलने-फिरनेकी शक्ति आ जाय।

शेषजी कहते हैं—शौनकजीकी उपर्युक्त बात सुनकर शत्रुघ्नको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे मुनिको प्रणाम और परिक्रमा करके सेवकोंसहित चले गये। वहाँ जाकर हनुमान्जीने घोड़ेके पास श्रीरघुनाथजीके चरित्रका वर्णन किया, जो बड़ी-से-बड़ी दुर्गतिका नाश करनेवाला है। अन्तमें उन्होंने कहा—'देव ! आप श्रीरामचन्द्रजीके कीर्तनके पुण्यसे अपने विमानपर सवार होइये और स्वेच्छानुसार अपने लोकमें विचरण कीजिये। इस कुत्सित योनिसे अब आपका छुटकारा हो जाय।' यह वाक्य सुनकर देवताने कहा—'राजन् ! मैं श्रीरामचन्द्रजीका कीर्तन सुननेसे पवित्र हो गया। महामते ! अब मैं अपने लोकको जा रहा हूँ; आप मुझे आज्ञा दीजिये।' यह कहकर देवता विमानपर बैठे हुए स्वर्ग चले गये। उस समय यह दृश्य देखकर शत्रुघ्न और उनके सेवकोंको बड़ा विस्मय हुआ। तदनन्तर, वह अश्व गात्रस्तम्भसे मुक्त होकर पक्षियोंसे भरे हुए उस उद्यानमें सब ओर भ्रमण करने लगा।


* दानपुण्यप्रसंगेन तीर्थादिक्रियया तथा। रामचारित्रसंश्रुत्या तपसा वा क्षयं व्रजेत्॥
सर्वेषामप्युपायानां हरिकीर्तिधुनी नृणाम्। क्षालयेत् पा पिनों पङ्कं नात्र कार्या विचारणा॥ (४८ । ६५-६६)