पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 519, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें५०२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
राजा सुरथके द्वारा अश्वका पकड़ा जाना, राजाकी भक्ति और उनके प्रभावका वर्णन, अङ्गदका दूत बनकर राजाके यहाँ जाना और राजाका युद्धके लिये तैयार होना
शेषजी कहते हैं—उस श्रेष्ठ अश्वको अनेकों राजाओंसे भरे हुए भारतवर्षमें लीलापूर्वक भ्रमण करते सात महीने व्यतीत हो गये। उसने हिमालयके निकट बहुत-से देशोंमें विचरण किया, किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके बलका स्मरण करके कोई उसे पकड़ न सका। अङ्ग, बङ्ग और कलिङ्ग-देशके राजाओंने तो उस अश्वका भलीभाँति स्तवन किया। वहाँसे आगे बढ़नेपर वह राजा सुरथके मनोहर नगरमें पहुँचा, जो अदितिका कुण्डल गिरनेके कारण कुण्डलकके ही नामसे प्रसिद्ध था। वहाँके लोग कभी धर्मका उल्लङ्घन नहीं करते थे। वहाँकी जनता प्रतिदिन प्रेमपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण किया करती थी। उस नगरके मनुष्य नित्यप्रति अश्वत्थ और तुलसीकी पूजा करते थे। वे सब-के-सब श्रीरघुनाथजीके सेवक थे। पापसे कोसों दूर रहते थे। वहाँके सुन्दर देवालयोंमें श्रीरघुनाथजीकी प्रतिमा शोभा पाती थी तथा कपटरहित शुद्ध चित्तवाले नगर-निवासी प्रतिदिन वहाँ जाकर भगवान्की पूजा करते थे। उनकी जिह्वापर केवल भगवान्का नाम शोभा पाता था, झगड़े-फसादकी चर्चा नहीं। उनके हृदयमें भगवान्का ही ध्यान होता; कामना या फलकी स्मृति नहीं होती थी। वहाँके सभी देहधारी पवित्र थे। श्रीरामचन्द्रजीकी कथा-वार्तासे ही उनका मनबहलाव होता था। वे सब प्रकारके दुर्व्यसनोंसे रहित थे; अतः कभी भी जुआ नहीं खेलते थे। उस नगरमें धर्मात्मा, सत्यवादी एवं महाबली राजा सुरथ निवास करते थे, जिनका चित्त श्रीरघुनाथजीके चरणोंका स्मरण करके सदा आनन्दमग्न रहा करता था। वे भगवद्-प्रेममें मस्त रहते थे। राम-भक्त राजा सुरथकी महिमाका मैं क्या वर्णन करूँ? उनके समस्त गुण भूमण्डलमें विस्तृत होकर सबके पापोंका परिमार्जन कर रहे हैं।
एक समय राजाके कुछ सेवक टहल रहे थे। उन्होंने देखा, चन्दनसे चर्चित अश्वमेधका अश्व आ रहा है। निकटसे देखनेपर उन्हें मालूम हुआ कि यह नेत्र और मनको मोहनेवाला अश्व श्रीरामचन्द्रजीका छोड़ा हुआ है। यह जानकर वे बड़े प्रसन्न हुए और उत्सुक-भावसे राजसभामें जा वहाँ बैठे हुए महाराजको सूचना देते हुए बोले—'स्वामिन्! अयोध्या-नगरीके स्वामी जो श्रीरघुनाथजी हैं, उनका छोड़ा हुआ अश्वमेधयोग्य अश्व सर्वत्र भ्रमण कर रहा है। वह अनुचरोंसहित आपके नगरके निकट आ पहुँचा है। महाराज ! वह अश्व अत्यन्त मनोहर है, आप उसे पकड़ें।'
सुरथ बोले—हम सेवकोंसहित धन्य हैं; क्योंकि हमें श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रका दर्शन होगा। करोड़ों योद्धाओंसे घिरे हुए उस अश्वको आज मैं पकड़ूँगा और तभी छोड़ूँगा जब श्रीरघुनाथजी चिरकालसे अपना चिन्तन करनेवाले मुझ भक्तपर कृपा करनेके लिये स्वयं यहाँ पदार्पण करें।
शेषजी कहते हैं—ऐसा कहकर राजाने सेवकोंको आज्ञा दी—'जाओ, अश्वको बलपूर्वक पकड़ लाओ। सामने पड़ जानेपर उसे कदापि न छोड़ना। मुझे ऐसा विश्वास है कि इससे अपना महान् लाभ होगा। ब्रह्मा और इन्द्रके लिये भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, उन्हीं श्रीराम-चरणोंकी झाँकी हमारे लिये सुलभ होगी। वही स्वजन, पुत्र, बान्धव, पशु अथवा वाहन धन्य है, जिससे श्रीरामचन्द्रजीकी प्राप्ति सम्भव हो; अतः जो स्वर्णपत्रसे शोभा पा रहा है, इच्छानुसार वेगसे चलता है तथा देखनेमें अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है, उस यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको पकड़कर घुड़सालमें बाँध दो।' महाराजके ऐसा कहनेपर सेवकोंने जाकर श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर अश्वको पकड़ लिया और दरबारमें लाकर उन्हें अर्पण कर दिया। वात्स्यायनजी ! आप एकाग्रचित्त होकर सुनें। राजा सुरथके राज्यमें कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं था, जो परायी स्त्रीसे अनुराग रखता हो। दूसरोंके धन लेनेवाले तथा कामलम्पट पुरुषका वहाँ सर्वथा अभाव था। जिह्वासे श्रीरघुनाथजीका कीर्तन करनेके