पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 520, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंपातालखण्ड ] * राजा सुरथके द्वारा अश्वका पकड़ा जाना और राजाका युद्धके लिये तैयार * ५०३
सिवा दूसरी कोई अनुचित बात किसीके मुँहसे नहीं निकलती थी। वहाँ सभी एकपत्नीव्रतका पालन करनेवाले थे। दूसरोंपर झूठा कलङ्क लगानेवाला और वेदविरुद्ध पथपर चलनेवाला उस राज्यमें एक भी मनुष्य नहीं था। राजाके सभी सैनिक प्रतिदिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते रहते थे। उनके देशमें पापिष्ठ नहीं थे, किसीके मनमें भी पापका विचार नहीं उठता था। भगवान्का ध्यान करनेसे सबके समस्त पाप नष्ट हो गये थे। सभी आनन्दमग्न रहते थे।
उस देशके राजा जब इस प्रकार धर्मपरायण हो गये तो उनके राज्यमें रहनेवाले सभी मनुष्य मरनेके बाद शान्ति प्राप्त करने लगे। सुरथके नगरमें यमदूतोंका प्रवेश नहीं होने पाता था। जब ऐसी अवस्था हो गयी, तो एक दिन यमराज मुनिका रूप धारण करके राजाके पास गये। उनके शरीरपर वल्कल-वस्त्र और मस्तकपर जटा शोभा पा रही थी। राजसभामें पहुँचकर वे भगवद्भक्त महाराज सुरथसे मिले। उनके मस्तकपर तुलसी और जिह्वापर भगवान्का उत्तम नाम था। वे अपने सैनिकोंको धर्म-कर्मकी बात सुना रहे थे। राजाने भी मुनिको देखा; वे तपस्याके साक्षात् विग्रह-से जान पड़ते थे। उन्होंने मुनिके चरणोंमें प्रणाम करके उन्हें अर्घ्य, पाद्य आदि निवेदन किया। तत्पश्चात् जब वे सुखपूर्वक आसनपर विराजमान हो विश्राम कर चुके, तब राजाओंमें अग्रगण्य सुरथने उनसे कहा—'मुनिवर! आज मेरा जीवन धन्य है! आज मेरा घर धन्य हो गया!! आप मुझे श्रीरघुनाथजीकी उत्तम कथाएँ सुनाइये। जिन्हें सुननेवाले मनुष्योंका पद-पदपर पाप नाश होता है।' राजाका ऐसा वचन सुनकर मुनि अपने दाँत दिखाते हुए जोर-जोरसे हँसने और ताली पीटने लगे। राजाने पूछा—'मुने! आपके हँसनेका क्या कारण है? कृपा करके बताइये, जिससे मनको सुख मिले।' तब मुनि बोले—'राजन्! बुद्धि लगाकर मेरी बात सुनो, मैं तुम्हें अपने हँसनेका उत्तम कारण बताता हूँ। तुमने अभी कहा है कि 'मेरे सामने भगवान्की कीर्तिका वर्णन कीजिये।' मगर मैं पूछता हूँ—भगवान् हैं कौन? वे किसके हैं और उनकी कीर्ति क्या है? संसारके सभी मनुष्य अपने कर्मोंके अधीन हैं। कर्मसे ही स्वर्ग मिलता है, कर्मसे ही नरकमें जाना पड़ता है तथा कर्मसे ही पुत्र, पौत्र आदि सभी वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। इन्द्रने सौ यज्ञ करके स्वर्गका उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया तथा ब्रह्माजीको भी कर्मसे ही सत्य नामक अद्भुत लोक उपलब्ध हुआ। कर्मसे बहुतोंको सिद्धि प्राप्त हुई है। मरुत् आदि कर्मसे ही लोकेश्वर-पदको प्राप्त हुए हैं; इसलिये तुम भी यज्ञ-कर्मोंमें लगो, देवताओंका पूजन करो। इससे सम्पूर्ण भूमण्डलमें तुम्हारी उज्ज्वल कीर्तिका विस्तार होगा।'
राजा सुरथका मन एकमात्र श्रीरघुनाथजीमें लगा हुआ था; अतः मुनिके उपर्युक्त वचन सुनकर उनका हृदय क्रोधसे क्षुब्ध हो उठा और वे कर्मविशारद ब्राह्मण-देवतासे इस प्रकार बोले—'ब्राह्मणाधम! यहाँ नश्वर फल देनेवाले कर्मकी बात न करो। तुम लोकमें निन्दाके पात्र हो, इसलिये मेरे नगर और प्रान्तसे बाहर चले जाओ [इन्द्र और ब्रह्माका दृष्टान्त क्या दे रहे हो?] इन्द्र शीघ्र ही अपने पदसे भ्रष्ट होंगे, किन्तु श्रीरामचन्द्रजीकी सेवा करनेवाले मनुष्य कभी नीचे नहीं गिरेंगे। ध्रुव,