भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 521

५०४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


प्रह्लाद और विभीषणको देखो तथा अन्य रामभक्तोंपर भी दृष्टिपात करो; वे कभी अपनी स्थितिसे भ्रष्ट नहीं होते। जो दुष्ट श्रीरामकी निन्दा करते हैं, उन्हें यमराजके दूत कालपाशसे बाँधकर लोहेके मुद्गरोंसे पीटते हैं। तुम ब्राह्मण हो, इसलिये तुम्हें शारीरिक दण्ड नहीं दे सकता। मेरे सामनेसे जाओ, चले जाओ; नहीं तो तुम्हारी ताड़ना करूँगा।' महाराज सुरथके ऐसा कहनेपर उनके सेवक मुनिको हाथसे पकड़कर निकाल देनेको उद्यत हुए। तब यमराजने अपना विश्ववन्दित रूप धारण करके राजासे कहा—'श्रीरामभक्त ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो। सुव्रत! मैंने बहुत-सी बातें बनाकर तुम्हें प्रलोभनमें डालनेका प्रयत्न किया, किन्तु तुम श्रीरामचन्द्रजीकी सेवासे विचलित नहीं हुए। क्यों न हो, तुमने साधु पुरुषोंका सेवन—महात्माओंका सत्सङ्ग किया है।' यमराजको संतुष्ट देखकर राजा सुरथने कहा—'धर्मराज ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह उत्तम वर प्रदान कीजिये—जबतक मुझे श्रीराम न मिलें, तबतक मेरी मृत्यु न हो। आपसे मुझे कभी भय न हो।' तब यमराजने कहा—'राजन् ! तुम्हारा यह कार्य सिद्ध होगा। श्रीरघुनाथजी तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण करेंगे।' यों कहकर धर्मराजने हरिभक्तिपरायण राजाकी प्रशंसा की और वहाँसे अदृश्य होकर वे अपने लोकको चले गये।

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगे रहनेवाले धर्मात्मा राजाने अत्यन्त हर्षमें भरकर अपने सेवकोंसे कहा—'मैंने महाराज श्रीरामचन्द्रजीके अश्वको पकड़ा है; इसलिये तुम सब लोग युद्धके लिये तैयार हो जाओ। मैं जानता हूँ, तुमने युद्ध-कलामें पूरी प्रवीणता प्राप्त की है।' महाराजकी ऐसी आज्ञा पाकर उनके सभी महाबली योद्धा थोड़ी ही देरमें तैयार हो गये और शीघ्रतापूर्वक दरबारके सामने उपस्थित हुए। राजाके दस वीर पुत्र थे, जिनके नाम थे—चम्पक, मोहक, रिपुञ्जय, दुर्वार, प्रतापी, बलमोदक, हर्यक्ष, सहदेव, भूरिदेव तथा असुतापन। ये सभी अत्यन्त उत्साहपूर्वक तैयार हो युद्धक्षेत्रमें जानेकी इच्छा प्रकट करने लगे।

इधर शत्रुघ्नने शीघ्रताके साथ आकर अपने सेवकोंसे पूछा—'यज्ञ-सम्बन्धी अश्व कहाँ है?' वे बोले—'महाराज ! हमलोग पहचानते तो नहीं, परन्तु कुछ योद्धा आये थे, जो हमें हटाकर घोड़ेको साथ ले इस नगरमें गये हैं।' उनकी बात सुनकर शत्रुघ्नने सुमतिसे कहा—'मन्त्रिवर ! यह किसका नगर है? कौन इसका स्वामी है, जिसने मेरे अश्वका अपहरण किया है?' मन्त्री बोले—'राजन् ! यह परम मनोहर नगर कुण्डलपुरके नामसे प्रसिद्ध है। इसमें महाबली धर्मात्मा राजा सुरथ निवास करते हैं। वे सदा धर्ममें लगे रहते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके युगल चरणोंके उपासक हैं। श्रीहनुमान्‌जीकी भाँति ये भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान्‌की सेवामें ही तत्पर रहते हैं।'

शत्रुघ्न बोले—यदि इन्होंने ही श्रीरघुनाथजीके अश्वका अपहरण किया हो तो इनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये?

सुमतिने कहा—महाराज ! राजा सुरथके पास कोई बातचीत करनेमें कुशल दूत भेजना चाहिये।

यह सुनकर शत्रुघ्नने अङ्गदसे विनययुक्त वचन कहा—'बालिकुमार ! यहाँसे पास ही जो राजा सुरथका विशाल नगर है, वहाँ दूत बनकर जाओ और राजासे कहो कि आपने जानकर या अनजानमें यदि श्रीरामचन्द्रजीके अश्वको पकड़ लिया हो तो उसे लौटा दें अथवा वीरोंसे भरे हुए युद्धक्षेत्रमें पधारें।' अङ्गदने 'बहुत अच्छा' कहकर शत्रुघ्नकी आज्ञा स्वीकार की और राजसभामें गये। वहाँ उन्होंने राजा सुरथको देखा, जो वीरोंके समूहसे घिरे हुए थे। उनके मस्तकपर तुलसीकी मञ्जरी थी और जिह्वासे श्रीरामचन्द्रजीका नाम लेते हुए वे अपने सेवकोंको उन्हींकी कथा सुना रहे थे। राजा भी मनोहर शरीरधारी वानरको देखकर समझ गये कि ये शत्रुघ्नके दूत हैं; तथापि बालिकुमारसे इस प्रकार बोले—'वानरराज ! बताओ, तुम किसलिये और कैसे यहाँ आये हो ! तुम्हारे आनेका सारा कारण जानकर मैं उसके अनुसार कार्य करूँगा।' यह सुनकर वानरराज अङ्गद मन-ही-मन बहुत विस्मित हुए और श्रीरामचन्द्रजीकी उपासनामें लगे रहनेवाले उन नरेशसे