पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातालखण्ड ] * सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी मूर्च्छा; वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म * ५२५
देख लक्ष्मणजी पुनः दुःखमें डूब गये और वस्त्रके अग्रभागसे पंखा झलने लगे। जब होशमें आयीं, तब उन्हें प्रणाम करके वे बोले—'देवि ! अब मैं श्रीरामके पास जाता हूँ, वहाँ जाकर मैं आपका सब संदेश कहूँगा। आपके समीप ही महर्षि वाल्मीकिका बहुत बड़ा आश्रम है।' यों कहकर लक्ष्मणने उनकी परिक्रमा की और दुःखमग्न हो आँसू बहाते हुए वे महाराज श्रीरामके पास चल दिये। जानकीजीने जाते हुए देवरकी ओर विस्मित दृष्टिसे देखा। वे सोचने लगीं—'महाभाग लक्ष्मण मेरे देवर हैं, शायद परिहास करते हों; भला, श्रीरघुनाथजी अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मुझ पापरहित पत्नीको कैसे त्याग सकते हैं।' यही विचार करती हुई वे निर्निमेष नेत्रोंसे उनकी ओर देखती रहीं; किन्तु जब वे गङ्गाके उस पार चले गये, तब उन्हें सर्वथा विश्वास हो गया कि सचमुच ही मैं त्याग दी गयी। अब मेरे प्राण बचेंगे या नहीं, इस संशयमें पड़कर वे पृथ्वीपर गिर पड़ीं और तत्काल उन्हें मूर्च्छाने आ दबाया।
उस समय हंस अपने पंखोंसे जल लाकर सीताके शरीरपर सब ओरसे छिड़कने लगे। फूलोंकी सुगन्ध लिये मन्द-मन्द वायु चलने लगी तथा हाथी भी अपनी सूँड़ोंमें जल लिये सब ओरसे वहाँ आकर खड़े हो गये, मानो धूलिसे भरे हुए सीताके शरीरको धोनेके लिये आये हों। इसी समय सती सीता होशमें आयीं और बारम्बार राम-रामकी रट लगाती हुई बड़े दुःखसे विलाप करने लगीं—'हा राम ! हा दीनबन्धो !! हा करुणानिधे !!! बिना अपराधके ही क्यों मुझे इस वनमें त्याग रहे हो।' इस प्रकारकी बहुत-सी बातें कहती हुई वे बार-बार विलाप करती और इधर-उधर देखती हुई रह-रहकर मूर्च्छित हो जाती थीं। उस समय भगवान् वाल्मीकि शिष्योंके साथ वनमें गये थे। वहाँ उन्हें करुणाजनक स्वरमें विलाप और रोदन सुनायी पड़ा। वे शिष्योंसे बोले—'वनके भीतर जाकर देखो तो सही, इस महाघोर जंगलमें कौन रो रहा है ? उसका स्वर दुःखसे पूर्ण जान पड़ता है।' मुनिके भेजनेसे वे उस स्थानपर गये, जहाँ जानकी राम-रामकी पुकार मचाती हुई आँसुओंमें डूब रही थीं। उन्हें देखकर वे शिष्य उत्कण्ठावश वाल्मीकि मुनिके पास लौट गये। उनकी बातें सुनकर मुनि स्वयं ही उस स्थानपर गये। पतिव्रता जानकीने देखा एक महर्षि