पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
आ रहे हैं, जो तपस्याके पुञ्ज जान पड़ते हैं। उन्हें देख सीताजीने हाथ जोड़कर कहा—'व्रतके सागर और वेदोंके साक्षात् स्वरूप महर्षिको नमस्कार है।' उनके यों कहनेपर महर्षिने आशीर्वादके द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा—'बेटी ! तुम अपने पतिके साथ चिरकालतक जीवित रहो। तुम्हें दो सुन्दर पुत्र प्राप्त हों। बताओ, तुम कौन हो ? इस भयङ्कर वनमें क्यों आयी हो तथा क्यों ऐसी हो रही हो ? सब कुछ बताओ, जिससे मैं तुम्हारे दुःखका कारण जान सकूँ।' तब श्रीरघुनाथजीकी पत्नी सीताजी एक दीर्घ निःश्वास ले काँपती हुई करुणामयी वाणीमें बोलीं—'महर्षे ! मुझे श्रीरघुनाथजीकी सेविका समझिये। मैं बिना अपराधके ही त्याग दी गयी हूँ। इसका कारण क्या है, यह मैं बिलकुल नहीं जानती। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मण मुझे यहाँ छोड़ गये हैं।'
वाल्मीकिजी बोले— विदेहकुमारी ! मुझे अपने पिताका गुरु समझो, मेरा नाम वाल्मीकि है। अब तुम दुःख न करो, मेरे आश्रमपर आओ। पतिव्रते ! तुम यही जानो कि दूसरे स्थानपर बना हुआ मेरे पिताका ही यह घर है।
सती सीताका मुख शोकके आँसुओंसे भीगा था। मुनिका सान्त्वनापूर्ण वचन सुनकर उन्हें कुछ सुख मिला। उनके नेत्रोंमें इस समय भी दुःखके आँसू छलक रहे थे। वाल्मीकिजी उन्हें आश्वासन देकर तापसी स्त्रियोंसे भरे हुए अपने पवित्र आश्रमपर ले गये। सीता महर्षिके पीछे-पीछे गयीं और वे मुनिसमुदायसे भरे हुए अपने आश्रमपर पहुँचकर तापसियोंसे बोले—'अपने आश्रमपर जानकी आयी हैं [उनका स्वागत करो]। महामना सीताने सब तपस्विनियोंको प्रणाम किया और उन्होंने भी प्रसन्न होकर उन्हें छातीसे लगाया। तपोनिधि वाल्मीकिने अपने शिष्योंसे कहा—'तुम जानकीके लिये एक सुन्दर पर्णशाला तैयार करो।' आज्ञा पाकर उन्होंने पत्तों और लकड़ियोंके द्वारा एक सुन्दर कुटी निर्माण की। पतिव्रता जानकी उसीमें निवास करने लगीं। वे वाल्मीकि मुनिकी टहल बजाती हुई फलाहार करके रहती थीं तथा मन और वाणीसे निरन्तर राम-मंत्रका