पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * एकादशीके जया आदि भेद, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन * ६४५
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन् ! पुण्यमयी एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई ? इस संसारमें क्यों पवित्र मानी गयी ? तथा देवताओंको कैसे प्रिय हुई ?
श्रीभगवान् बोले— कुन्तीनन्दन ! प्राचीन समयकी बात है, सत्ययुगमें मुर नामक दानव रहता था। वह बड़ा ही अद्भुत, अत्यन्त रौद्र तथा सम्पूर्ण देवताओंके लिये भयङ्कर था। उस कालरूपधारी दुरात्मा महासुरने इन्द्रको भी जीत लिया था। सम्पूर्ण देवता उससे परास्त होकर स्वर्गसे निकाले जा चुके थे और शंकित तथा भयभीत होकर पृथ्वीपर विचरा करते थे। एक दिन सब देवता महादेवजीके पास गये। वहाँ इन्द्रने भगवान् शिवके आगे सारा हाल कह सुनाया।
इन्द्र बोले— महेश्वर ! ये देवता स्वर्गलोकसे भ्रष्ट होकर पृथ्वीपर विचर रहे हैं। मनुष्योंमें रहकर इनकी शोभा नहीं होती। देव ! कोई उपाय बतलाइये। देवता किसका सहारा लें ?
महादेवजीने कहा— देवराज ! जहाँ सबको शरण देनेवाले, सबकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले जगत्के स्वामी भगवान् गरुड़ध्वज विराजमान हैं, वहाँ जाओ। वे तुमलोगोंकी रक्षा करेंगे।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! महादेवजीकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके साथ वहाँ गये। भगवान् गदाधर क्षीरसागरके जलमें सो रहे थे। उनका दर्शन करके इन्द्रने हाथ जोड़कर स्तुति आरम्भ की।
इन्द्र बोले— देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। देवता और दानव दोनों ही आपकी वन्दना करते हैं। पुण्डरीकाक्ष ! आप दैत्योंके शत्रु हैं। मधुसूदन ! हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। जगन्नाथ ! सम्पूर्ण देवता मुर नामक दानवसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं।
भक्तवत्सल ! हमें बचाइये। देवदेवेश्वर ! हमें बचाइये। जनार्दन ! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। दानवोंका विनाश करनेवाले कमलनयन ! हमारी रक्षा कीजिये। प्रभो ! हम सब लोग आपके समीप आये हैं। आपकी ही शरणमें आ पड़े हैं। भगवन् ! शरणमें आये हुए देवताओंकी सहायता कीजिये। देव ! आप ही पति, आप ही मति, आप ही कर्ता और आप ही कारण हैं। आप ही सब लोगोंकी माता और आप ही इस जगत्के पिता हैं। भगवन् ! देवदेवेश्वर ! शरणागतवत्सल ! देवता भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं। प्रभो ! अत्यन्त उग्र स्वभाववाले महाबली मुर नामक दैत्यने सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर. इन्हें स्वर्गसे निकाल दिया है।*
* ॐ नमो देवदेवेश देवदानववन्दित। दैत्यारे पुण्डरीकाक्ष त्राहि नो मधुसूदन ॥
सुराः सर्वे समायाता भयभीताश्च दानवात्। शरणं त्वां जगन्नाथ त्राहि नो भक्तवत्सल ॥
त्राहि नो देवदेवेश त्राहि त्राहि जनार्दन। त्राहि वै पुण्डरीकाक्ष दानवानां विनाशक ॥
त्वत्समीपं गताः सर्वे त्वामेव शरणं प्रभो। शरणागतदेवानां साहाय्यं कुरु वै प्रभो ॥
त्वं पतिस्त्वं मतिर्देव त्वं कर्ता त्वं च कारणम्। त्वं माता सर्वलोकानां त्वमेव जगतः पिता ॥
भगवन् देवदेवेश शरणागतवत्सल। शरणं तव चायाता भयभीताश्च देवताः ॥
देवता निर्जिताः सर्वाः स्वर्गभ्रष्टाः कृता विभो। अत्युग्रेण हि दैत्येन मुरनाम्ना महौजसा ॥ (४०। ५७—६३)