पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 663, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें६४६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
इन्द्रकी बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले— 'देवराज ! वह दानव कैसा है ? उसका रूप और बल कैसा है तथा उस दुष्टके रहनेका स्थान कहाँ है ?'
इन्द्र बोले—देवेश्वर ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीके वंशमें तालजङ्घ नामक एक महान् असुर उत्पन्न हुआ था, जो अत्यन्त भयङ्कर था। उसका पुत्र मुर दानवके नामसे विख्यात हुआ। वह भी अत्यन्त उत्कट, महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयङ्कर है। चन्द्रावती नामसे प्रसिद्ध एक नगरी है, उसीमें स्थान बनाकर वह निवास करता है। उस दैत्यने समस्त देवताओंको परास्त करके स्वर्गलोकसे बाहर कर दिया है। उसने एक दूसरे ही इन्द्रको स्वर्गके सिंहासनपर बैठाया है। अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, वायु तथा वरुण भी उसने दूसरे ही बनाये हैं। जनार्दन ! मैं सच्ची बात बता रहा हूँ। उसने सब कोई दूसरे ही कर लिये हैं। देवताओंको तो उसने प्रत्येक स्थानसे वञ्चित कर दिया है।
इन्द्रका कथन सुनकर भगवान् जनार्दनको बड़ा क्रोध हुआ। वे देवताओंको साथ लेकर चन्द्रावतीपुरीमें गये। देवताओंने देखा, दैत्यराज बारम्बार गर्जना कर रहा है; उससे परास्त होकर सम्पूर्ण देवता दसों दिशाओंमें भाग गये। अब वह दानव भगवान् विष्णुको देखकर बोला, 'खड़ा रह, खड़ा रह ।' उसकी ललकार सुनकर भगवान्के नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे बोले—'अरे दुराचारी दानव ! मेरी इन भुजाओंको देख।' यह कहकर श्रीविष्णुने अपने दिव्य बाणोंसे सामने आये हुए दुष्ट दानवोंको मारना आरम्भ किया। दानव भयसे विह्वल हो उठे। पाण्डुनन्दन ! तत्पश्चात् श्रीविष्णुने दैत्य-सेनापर चक्रका प्रहार किया। उससे छिन्न-भिन्न होकर सैकड़ों योद्धा मौतके मुखमें चले गये। इसके बाद भगवान् मधुसूदन बद्रिकाश्रमको चले गये। वहाँ सिंहावती नामकी गुफा थी, जो बारह योजन लम्बी थी। पाण्डु-नन्दन ! उस गुफामें एक ही दरवाजा था। भगवान् विष्णु उसीमें सो रहे। दानव मुर भगवान्को मार डालनेके उद्योगमें लगा था। वह उनके पीछे लगा रहा। वहाँ पहुँचकर उसने भी उसी गुहामें प्रवेश किया। वहाँ भगवान्को सोते देख उसे बड़ा हर्ष हुआ। उसने सोचा, 'यह दानवोंको भय देनेवाला देवता है। अतः निस्सन्देह इसे मार डालूँगा।' युधिष्ठिर ! दानवके इस प्रकार विचार