भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 672, कुल 1018 में से

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उत्तरखण्ड ] * फाल्गुन मासकी 'विजया' तथा 'आमलकी' एकादशीका माहात्म्य * ६५५


करे। कलशके सामने बैठकर वह सारा दिन उत्तम कथा-वार्ता आदिके द्वारा व्यतीत करे तथा रातमें भी वहाँ जागरण करे। अखण्ड व्रतकी सिद्धिके लिये घीका दीपक जलाये। फिर द्वादशीके दिन सूर्योदय होनेपर उस कलशको किसी जलाशयके समीप—नदी, झरने या पोखरेके तटपर ले जाकर स्थापित करे और उसकी विधिवत् पूजा करके देव-प्रतिमासहित उस कलशको वेदवेत्ता ब्राह्मणके लिये दान कर दे। महाराज ! कलशके साथ ही और भी बड़े-बड़े दान देने चाहिये। श्रीराम ! आप अपने यूथपतियोंके साथ इसी विधिसे प्रयत्नपूर्वक 'विजया' का व्रत कीजिये। इससे आपकी विजय होगी।

ब्रह्माजी कहते हैं— नारद ! यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनिके कथनानुसार उस समय 'विजया' एकादशीका व्रत किया। उस व्रतके करनेसे श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राममें रावणको मारा, लङ्कापर विजय पायी और सीताको प्राप्त किया। बेटा ! जो मनुष्य इस विधिसे व्रत करते हैं, उन्हें इस लोकमें विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! इस कारण 'विजया' का व्रत करना चाहिये। इस प्रसङ्गको पढ़ने और सुननेसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है।

युधिष्ठिरने कहा— श्रीकृष्ण ! मैंने विजया एकादशीका माहात्म्य, जो महान् फल देनेवाला है, सुन लिया। अब फाल्गुन शुक्लपक्षकी एकादशीका नाम और माहात्म्य बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाभाग धर्मनन्दन ! सुनो—तुम्हें इस समय वह प्रसङ्ग सुनाता हूँ, जिसे राजा मान्धाताके पूछनेपर महात्मा वसिष्ठने कहा था। फाल्गुन शुक्लपक्षकी एकादशीका नाम 'आमलकी' है। इसका पवित्र व्रत विष्णुलोककी प्राप्ति करानेवाला है।

मान्धाताने पूछा— द्विजश्रेष्ठ ! यह 'आमलकी' कब उत्पन्न हुई, मुझे बताइये।

वसिष्ठजीने कहा— महाभाग ! सुनो—पृथ्वीपर 'आमलकी' की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह बताता हूँ। आमलकी महान् वृक्ष है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भगवान् विष्णुके थूकनेपर उनके मुखसे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एक बिन्दु प्रकट हुआ। वह बिन्दु पृथ्वीपर गिरा। उसीसे आमलकी (आँवले) का महान् वृक्ष उत्पन्न हुआ। यह सभी वृक्षोंका आदिभूत कहलाता है। इसी समय समस्त प्रजाकी सृष्टि करनेके लिये भगवान्‌ने ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। उन्हींसे इन प्रजाओंकी सृष्टि हुई। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अन्तःकरणवाले महर्षियोंको ब्रह्माजीने जन्म दिया। उनमेंसे देवता और ऋषि उस स्थानपर आये, जहाँ विष्णुप्रिया आमलकीका वृक्ष था। महाभाग ! उसे देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे एक-दूसरेपर दृष्टिपात करते हुए उत्कण्ठापूर्वक उस वृक्षकी ओर देखने लगे और खड़े-खड़े सोचने लगे कि प्लक्ष (पाकर) आदि वृक्ष तो पूर्व कल्पकी ही भाँति हैं, जो सब-के-सब हमारे परिचित हैं, किन्तु इस वृक्षको हम नहीं जानते। उन्हें इस प्रकार चिन्ता करते देख आकाशवाणी हुई—'महर्षियो ! यह सर्वश्रेष्ठ आमलकीका वृक्ष है, जो विष्णुको प्रिय है। इसके स्मरणमात्रसे गोदानका फल मिलता है। स्पर्श करनेसे इससे दूना और फल भक्षण करनेसे तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिये सदा प्रयत्नपूर्वक आमलकीका सेवन करना चाहिये। यह सब पापोंको हरनेवाला वैष्णव वृक्ष बताया गया है। इसके मूलमें विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्धमें परमेश्वर भगवान् रुद्र, शाखाओंमें मुनि, टहनियोंमें देवता, पत्तोंमें वसु, फूलोंमें मरुद्गण तथा फलोंमें समस्त प्रजापति वास करते हैं। आमलकी सर्वदेवमयी बतायी गयी है।* अतः विष्णुभक्त पुरुषोंके लिये यह परम पूज्य है।'

ऋषि बोले— [ अव्यक्त स्वरूपसे बोलनेवाले महापुरुष ! ] हमलोग आपको क्या समझें—आप कौन


* तस्या मूले स्थितो विष्णुस्तदूर्ध्वं च पितामहः। स्कन्धे च भगवान् रुद्रः संस्थितः परमेश्वरः ॥
शाखासु मुनयः सर्वे प्रशाखासु च देवताः। पर्णेषु वसवो देवाः पुष्पेषु मरुतस्तथा ॥

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