पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
हैं? देवता हैं या कोई और? हमें ठीक-ठीक बताइये।
आकाशवाणी हुई—जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्ता और समस्त भुवनोंके स्रष्टा हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुष भी कठिनतासे देख पाते हैं, वही सनातन विष्णु मैं हूँ।
देवाधिदेव भगवान् विष्णुका कथन सुनकर उन ब्रह्मकुमार महर्षियोंके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। वे आदि-अन्तरहित भगवान्की स्तुति करने लगे।
ऋषि बोले—सम्पूर्ण भूतोंके आत्मभूत, आत्मा एवं परमात्माको नमस्कार है। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले अच्युतको नित्य प्रणाम है। अन्तरहित परमेश्वरको बारम्बार प्रणाम है। दामोदर, कवि (सर्वज्ञ) और यज्ञेश्वरको नमस्कार है। मायापते ! आपको प्रणाम है। आप विश्वके स्वामी हैं; आपको नमस्कार है।
ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि संतुष्ट हुए और बोले—महर्षियो ! तुम्हें कौन-सा अभीष्ट वरदान दूँ?'
ऋषि बोले—भगवन्! यदि आप संतुष्ट हैं तो हमलोगोंके हितके लिये कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो स्वर्ग और मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला हो।
श्रीविष्णु बोले—महर्षियो ! फाल्गुन शुक्लपक्षमें यदि पुष्य नक्षत्रसे युक्त द्वादशी हो तो वह महान् पुण्य देनेवाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। द्विजवरो ! उसमें जो विशेष कर्तव्य है, उसको सुनो। आमलकी एकादशीमें आँवलेके वृक्षके पास जाकर वहाँ रात्रिमें जागरण करना चाहिये। इससे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता और सहस्र गोदानोंका फल प्राप्त करता है। विप्रगण ! यह व्रतोंमें उत्तम व्रत है, जिसे मैंने तुमलोगोंको बताया है।
ऋषि बोले—भगवन्! इस व्रतकी विधि बतलाइये। यह कैसे पूर्ण होता है? इसके देवता, नमस्कार और मन्त्र कौन-से बताये गये हैं? उस समय स्नान और दान कैसे किया जाता है? पूजनकी कौन-सी विधि है तथा उसके लिये मन्त्र क्या है? इन सब बातोंका यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।
भगवान् विष्णुने कहा—द्विजवरो ! इस व्रतकी जो उत्तम विधि है, उसको श्रवण करो! एकादशीको प्रातःकाल दन्तधावन करके यह सङ्कल्प करे कि 'हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरणमें रखें।' ऐसा नियम लेनेके बाद पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, मर्यादा भंग करनेवाले तथा गुरुपत्नीगामी, मनुष्योंसे वार्तालाप न करे। अपने मनको वशमें रखते हुए नदीमें, पोखरेमें, कुएँपर अथवा घरमें ही स्नान करे। स्नानके पहले शरीरमें मिट्टी लगाये।
मृत्तिका लगानेका मन्त्र अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम् ॥ (४७।४३)
'वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन अवतारके समय भगवान् विष्णुने भी तुम्हें अपने पैरोंसे नापा था। मृत्तिके ! मैंने करोड़ों जन्मोंमें जो पाप किये हैं, मेरे उन सब पापोंको हर लो।'
स्नान-मन्त्र त्वं मात: सर्वभूतानां जीवनं तत्तू रक्षकम्। स्वेदजोद्भिज्जजातीनां रसानां पतये नमः ॥ स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु हृदप्रस्रवणेषु च। नदीषु देवखातेषु इदं स्नानं तु मे भवेत् ॥ (४७।४४-४५)
'जलकी अधिष्ठात्री देवी! मात:! तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये जीवन हो। वही जीवन, जो स्वेदज और उद्भिज्ज जातिके जीवोंका भी रक्षक है। तुम रसोंकी स्वामिनी हो। तुम्हें नमस्कार है। आज मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों, नदियों और देवसम्बन्धी सरोवरोंमें स्नान कर चुका। मेरा यह स्नान उक्त सभी स्नानोंका फल देनेवाला हो।'
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह परशुरामजीकी सोनेकी प्रतिमा बनवाये। प्रतिमा अपनी शक्ति और
प्रजानां पतयः सर्वे फलेष्वेव व्यवस्थिताः। सर्वदेवमयी ह्येषा धात्री च कथिता मया ॥ (४७।२०-२३)