पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ******************************************************************************************************
दिन काँसका बर्तन, उड़द, मसूर, तेल, असत्य-भाषण, व्यायाम, परदेशगमन, दो बार भोजन, मैथुन, बैलकी पीठपर सवारी, पराया अन्न तथा साग—इन बारह वस्तुओंका त्याग करे। राजन्! जिन्होंने इस विधिसे 'कामदा' एकादशीका व्रत किया और रात्रिमें जागरण करके श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा की है, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम गतिको प्राप्त होते हैं। इसके पढ़ने और सुननेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है।
चातुर्मास्य व्रतकी विधि और उद्यापन
नारदजीने पूछा— महेश्वर! पृथ्वीपर चातुर्मास्य व्रतके जो प्रसिद्ध नियम हैं, उन्हें मैं सुनना चाहता हूँ; आप उनका वर्णन कीजिये।
महादेवजी बोले— देवर्षे! सुनो, मैं तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। आषाढ़के शुक्लपक्षमें एकादशीको उपवास करके भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रतके नियम ग्रहण करे। श्रीहरिके योगनिद्रामें प्रवृत्त हो जानेपर मनुष्य चार मास अर्थात् कार्तिककी पूर्णिमातक भूमिपर शयन करे। इस बीचमें न तो घर या मन्दिर आदिकी प्रतिष्ठा होती है और न यज्ञादि कार्य ही सम्पन्न होते हैं, विवाह, यज्ञोपवीत, अन्यान्य माङ्गलिक कर्म, राजाओंकी यात्रा तथा नाना प्रकारकी दूसरी-दूसरी क्रियाएँ भी नहीं होतीं। मनुष्य एक हजार अश्वमेध यज्ञ करनेसे जिस फलको पाता है, वही चातुर्मास्य व्रतके अनुष्ठानसे प्राप्त कर लेता है। जब सूर्य मिथुन राशिपर हों, तब भगवान् मधुसूदनको शयन कराये और तुला राशिके सूर्य होनेपर पुनः श्रीहरिको शयनसे उठाये। यदि मलमास आ जाय तो निम्नलिखित विधिक अनुष्ठान करे। भगवान् विष्णुकी प्रतिमा स्थापित करे, जो शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाली हो, जिसे पीताम्बर पहनाया गया हो तथा जो सौम्य आकारवाली हो। नारद! उसे शुद्ध एवं सुन्दर पलंगपर, जिसके ऊपर सफेद चादर बिछी हो और तकिया रखी हो, स्थापित करे। फिर दही, दूध, मधु, लावा और घीसे नहलाकर उत्तम चन्दनका लेप करे। तत्पश्चात् धूप दिखाकर मनोहर पुष्पोंसे श्रृङ्गार करे। इस प्रकार उसकी पूजा करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे प्रार्थना करे—
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥
(६६। १५)
'जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सारा जगत् सो जाता है तथा आपके जाग्रत् होनेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् जाग उठता है।'
नारद! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको स्थापित करके उसीके आगे स्वयं वाणीसे कहकर चातुर्मास्य व्रतके नियम ग्रहण करे। स्त्री हो या पुरुष, जो भगवान्का भक्त हो, उसे हरिबोधिनी एकादशीतक चार महीनोंके लिये नियम अवश्य ग्रहण करने चाहिये। जितात्मा पुरुष निर्मल प्रभातकालमें दन्तधावनपूर्वक उपवास करके नित्यकर्मका अनुष्ठान करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके समक्ष जिन नियमोंको ग्रहण करता है, उनका तथा उनके पालन करनेवालोंका फल पृथक्-पृथक् बतलाता हूँ।
विद्वन्! चातुर्मास्यमें गुड़का त्याग करनेसे मनुष्यको मधुरताकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार तेलको त्याग देनेसे दीर्घायु संतान और सुगन्धित तेलके त्यागसे अनुपम सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। योगाभ्यासी मनुष्य ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। ताम्बूलका त्याग करनेसे मनुष्य भोग-सामग्रीसे सम्पन्न होता और उसका कण्ठ सुरीला होता है। घीके त्यागसे लावण्यकी प्राप्ति होती और शरीर चिकना होता है। विप्रवर! फलका त्याग करनेवालेको बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। जो चौमासेभर पलाशके पत्तेमें भोजन करता है, वह रूपवान् और भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दही-दूध छोड़नेवाले मनुष्यको गोलोक मिलता है। जो मौनव्रत धारण करता है, उसकी आज्ञा भंग नहीं होती। जो स्थालीपाक (बटलोईमें भोजन बनाकर खाने) का त्याग करता है, वह इन्द्रका सिंहासन प्राप्त करता है। नारद! इस प्रकारके त्यागसे धर्मकी सिद्धि होती है। इसके साथ 'नमो नारायणाय' का जप