पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * चातुर्मास्य व्रतकी विधि और उद्यापन * ६८१
करनेसे सौगुने फलकी प्राप्ति होती है। चौमासेका व्रत करनेवाला पुरुष पोखरेमें स्नान करनेमात्रसे गङ्गा-स्नानका फल पाता है। जो सदा पृथ्वीपर भोजन करता है, वह पृथ्वीका स्वामी होता है। श्रीविष्णुकी चरण-वन्दना करनेसे गोदानका फल मिलता है। उनके चरण-कमलोंका स्पर्श करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। प्रतिदिन एक समय भोजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञका फलभागी होता है। जो श्रीविष्णुकी एक सौ आठ बार परिक्रमा करता है, वह दिव्य विमानपर बैठकर यात्रा करता है। विद्वन्! पञ्चगव्य खानेवाले मनुष्यको चान्द्रायणका फल मिलता है। जो प्रतिदिन भगवान् विष्णुके आगे शास्त्रविनोदके द्वारा लोगोंको ज्ञान देता है, वह व्यासरूप विद्वान् श्रीविष्णुधामको प्राप्त होता है। तुलसीदलसे भगवान्की पूजा करके मानव वैकुण्ठ-धाममें जाता है। गर्म जलका त्याग कर देनेसे पुष्कर तीर्थमें स्नान करनेका फल होता है। जो पत्तोंमें भोजन करता है, उसे कुरुक्षेत्रका फल मिलता है। जो प्रतिदिन पत्थरकी शिलापर भोजन करता है, उसे प्रयाग-तीर्थका पुण्य प्राप्त होता है।
चौमासेमें काँसीके बरतनोंका त्याग करके अन्यान्य धातुओंके पात्रोंका उपयोग करे। अन्य किसी प्रकारका पात्र न मिलनेपर मिट्टीका ही पात्र उत्तम है। अथवा स्वयं ही पलाशके पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनावे और उनसे भोजन-पात्रका काम ले। जो पूरे एक वर्षतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है और जो वनमें रहकर केवल पत्तोंमें भोजन करता है, उन दोनोंको समान फल मिलता है। पलाशके पत्तोंमें किया हुआ भोजन चान्द्रायणके समान माना गया है। पलाशके पत्तोंमें एक-एक बारका भोजन त्रिरात्र-व्रतके समान पुण्यदायक और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला बताया गया है। एकादशीके व्रतका जो पुण्य है, वही पलाशके पत्तेमें भोजन करनेका भी बतलाया गया है। उससे मनुष्य सब प्रकारके दानों तथा समस्त तीर्थोंका फल पा लेता है। कमलके पत्तोंमें भोजन करनेसे कभी नरक नहीं देखना पड़ता। ब्राह्मण उसमें भोजन करनेसे वैकुण्ठमें जाता है। ब्रह्माजीका महान् वृक्ष—पलाश पापोंका नाशक और सम्पूर्ण कामनाओंका दाता है। नारद ! इसका बिचला पत्ता शूद्र जातिके लिये निषिद्ध है। यदि शूद्र पलाशके बिचले पत्रमें भोजन करता है तो उसे चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त नरकमें रहना पड़ता है; अतः वह बिचले पत्रको त्याग दे और शेष पत्रोंमें भोजन किया करे। ब्रह्मन् ! जो शूद्र बिचले पत्रमें भोजन करता है, वह ब्राह्मणको कपिला गौ दान करनेसे ही शुद्ध होता है, अन्यथा नहीं।
यदि शूद्र अपने घरमें कपिला गौका दोहन करे तो वह दस हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर पशुयोनिमें जन्म लेता है। जो शूद्र कपिल जातिके बैलको गाड़ीमें जोतकर हाँकता है, वह उस बैलके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक कुम्भीपाकमें पकाया जाता है; यदि शूद्र पानी लानेके लिये किसी ब्राह्मणको घरमें भेजे तो वह जल मदिराके तुल्य होता है और उसे पीनेवाला नरकमें जाता है। जो शूद्र बुलानेपर ब्राह्मणोंके घर भोजन करता है, उसके लिये वह अन्न अमृतके समान होता है और उसे खाकर वह मोक्ष प्राप्त करता है। जो शूद्र लोभवश दूसरेका, विशेषतः ब्राह्मणोंका सोना या चाँदी ले लेता है, वह नरकमें जाता है। शूद्रको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंको दान दे और उनमें विशेषरूपसे भक्तिभाव करे। विशेषतः चौमासेमें जैसे भगवान् विष्णु आराधनीय हैं, वैसे ही ब्राह्मण भी। नारद! ब्राह्मणोंकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। भाद्रपद मास आनेपर उनकी महापूजा होती है। चौमासेमें भूमिपर शयन करनेवाला मनुष्य विमान प्राप्त करता है। दस हजार वर्षोंतक उसे रोग नहीं सताते। वह मनुष्य बहुत-से पुत्र और धनसे युक्त होता है। उसे कभी कोढ़की बीमारी नहीं होती। बिना माँगे स्वतः प्राप्त हुए अन्नका भोजन करनेसे बावली और कुआँ बनवानेका फल होता है। जो प्राणियोंकी हिंसासे मुँह मोड़कर द्रोहका त्याग कर देता है, वह भी पूर्वोक्त पुण्यका भागी होता है। वेदोंमें बताया गया है कि 'अहिंसा श्रेष्ठ धर्म है।' दान, दया और दम—ये भी उत्तम धर्म हैं, यह बात मैंने सर्वत्र ही सुनी है; अतः बड़े लोगोंको भी