पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * यमराजकी आराधना और गोपीचन्दनका माहात्म्य * ६८५
चाहिये, जो भगवान् विष्णुको संतोष प्रदान करनेवाला है। द्वादशीको श्रद्धा और भक्तिके साथ श्रीगोविन्दकी पूजा करके इस प्रकार कहे—'देव ! स्वप्नमें इन्द्रियोंकी विकलताके कारण यदि भोजन और मैथुनकी क्रिया बन जाय तो आप मुझपर कृपा करके क्षमा कीजिये।' इस प्रकार नियम करके मिट्टी, गोमय और तिल लेकर मध्याह्नमें तीर्थ (जलाशय) के पास जाय और व्रतकी पूर्तिके लिये निम्नाङ्कित मन्त्रसे विधिपूर्वक स्नान करे—
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे ॥
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम् ।
त्वया हृतेन पापेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
काश्यां चैव तु संभूतास्तिला वै विष्णुरूपिणः।
तिलस्नानेन गोविन्दः सर्वपापं व्यपोहति ॥
विष्णुदेहोद्भवे देवि महापापापहारिणि ।
सर्वपापं हर त्वं वै सर्वौषधि नमोऽस्तु ते ॥
(६८ । ३४—३७)
'वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन अवतारके समय भगवान् विष्णुने भी तुम्हें अपने चरणोंसे नापा था। मृत्तिके ! मैंने पूर्वजन्ममें जो पाप सञ्चित किया है, मेरा वह सारा पाप तुम हर लो। तुम्हारे द्वारा पापका नाश हो जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तिल काशीमें उत्पन्न हुए हैं तथा वे भगवान् विष्णुके स्वरूप हैं। तिलमिश्रित जलके द्वारा स्नान करनेपर भगवान् गोविन्द सब पापोंका नाश कर देते हैं। देवी सर्वौषधि ! तुम भगवान् विष्णुके देहसे प्रकट हुई तथा महान् पापोंका अपहरण करनेवाली हो। तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे सारे पाप हर लो।'
इस प्रकार मृत्तिका आदिके द्वारा स्नान करके सिरपर तुलसीदल धारण कर तुलसीका नाम लेते हुए स्नान करे। यह स्नान ऋषियोंद्वारा बताया गया है। इसे विधिपूर्वक करना चाहिये। इस तरह स्नान करनेके पश्चात् जलसे बाहर निकलकर दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। फिर देवताओं और पितरोंका तर्पण करके श्रीविष्णुका पूजन करे। उसकी विधि इस प्रकार है। पहले एक कलशकी, जो फूटा-टूटा न हो, स्थापना करे। उसमें पञ्चपल्लव और पञ्चरत्न डाल दे। फिर दिव्य माला पहनाकर उस कलशको गन्धसे सुवासित करे। कलशमें जल भर दे और उसमें द्रव्य डालकर उसके ऊपर ताँबेका पात्र रख दे। इसके बाद उस पात्रमें देवाधिदेव तपोनिधि भगवान् श्रीधरकी स्थापना करके पूर्वोक्त विधिसे पूजा करे। फिर मिट्टी और गोबर आदिसे सुन्दर मण्डल बनावे। सफेद और धुले हुए चावलोंको पानीमें पीसकर उसके द्वारा मण्डलका संस्कार करे। तत्पश्चात् हाथ-पैर आदि अङ्गोंसे युक्त धर्मराजका स्वरूप बनावे और उसके आगे ताँबेकी वैतरणी नदी स्थापित करके उसकी पूजा करे। उसके बाद पृथक् आवाहन आदि करके यमराजकी विधिवत् पूजा करे।
पहले भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना करे—महाभाग केशव ! मैं विश्वरूपी देवेश्वर यमका आवाहन करता हूँ। आप यहाँ पधारें और समीपमें निवास करें। लक्ष्मीकान्त ! हरे ! यह आसनसहित पाद्य आपकी सेवामें समर्पित है। प्रभो ! विश्वका प्राणि-समुदाय आपका स्वरूप है। आपको नमस्कार है। आप प्रतिदिन मुझपर कृपा कीजिये।' इस प्रकार प्रार्थना करके 'भूतिदाय नमः' इस मन्त्रके द्वारा भगवान् विष्णुके चरणोंका, 'अशोकाय नमः' से घुटनोंका, 'शिवाय नमः' से जाँघोंका, 'विष्णुमूर्तये नमः' से कटिभागका, 'कन्दर्पाय नमः' से लिङ्गका, 'आदित्याय नमः' से अण्डकोषका, 'दामोदराय नमः' से उदरका, 'वासुदेवाय नमः' से स्तनोंका, 'श्रीधराय नमः' से मुखका, 'केशवाय नमः' से केशोंका, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठका, 'वरदाय नमः' से पुनः चरणोंका, 'शङ्खपाणये नमः', चक्रपाणये नमः', 'असिपाणये नमः', 'गदापाणये नमः' और 'परशुपाणये नमः'—इन नाममन्त्रोंद्वारा क्रमशः शङ्ख, चक्र, खड्ग, गदा तथा परशुका तथा 'सर्वात्मने नमः' इस मन्त्रके द्वारा मस्तकका ध्यान करे। इसके बाद यों कहे—'मैं समस्त पापोंकी राशिका नाश करनेके लिये मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध तथा कल्किका पूजन करता हूँ; भगवन् ! इन अवतारोंके रूपमें आपको