पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
-नमस्कार है। बारम्बार नमस्कार है।' इन सभी मन्त्रोंके द्वारा श्रीविष्णुका ध्यान करके उनका पूजन करे।*
तत्पश्चात् निम्नाङ्कित नाममन्त्रोंके द्वारा भगवान् धर्मराजका पूजन करना चाहिये—
धर्मराज नमस्तेऽस्तु धर्मराज नमोऽस्तु ते।
दक्षिणाशाय ते तुभ्यं नमो महिषवाहन ॥
चित्रगुप्त नमस्तुभ्यं विचित्राय नमो नमः।
नरकार्तिप्रशान्त्यर्थं कामान् यच्छ ममेप्सितान् ॥
यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥
वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।
नीलाय चैव दध्नाय नित्यं कुर्यान्नमो नमः ॥
(६८ । ५३—५६)
'धर्मराज ! आपको बारम्बार नमस्कार है। दक्षिण दिशाके स्वामी ! आपको नमस्कार है। महिषपर चलनेवाले देवता ! आपको नमस्कार है। चित्रगुप्त ! आपको नमस्कार है। नरककी पीड़ा शान्त करनेके लिये विचित्र नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। आप मेरी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण करें। यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूत-क्षय, वृकोदर, चित्र, चित्रगुप्त, नील और दध्नको नित्य नमस्कार करना चाहिये।'
तदनन्तर वैतरणीकी प्रतिमाको अर्घ्य देते हुए इस प्रकार कहे— 'वैतरणी ! तुम्हें पार करना अत्यन्त कठिन है। तुम पापोंका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हो। महाभागे ! यहाँ आओ और मेरे दिये हुए अर्घ्यको ग्रहण करो। यमद्वारके भयङ्कर मार्गमें वैतरणी नदी विख्यात है। उससे उद्धार पानेके लिये मैं यह अर्घ्य दे रहा हूँ। जो जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थासे परे है, पापी पुरुषोंके लिये जिसको पार करना अत्यन्त कठिन है, जो समस्त प्राणियोंके भयका निवारण करनेवाली है तथा यातनामें पड़े हुए प्राणी भयके मारे जिसमें डूब जाते हैं, उस भयङ्कर वैतरणी नदीको पार करनेके लिये मैंने यह पूजन किया है। वैतरणी देवी ! तुम्हारी जय हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। जिसमें देवता वास करते हैं, वही वैतरणी नदी है। मैंने भगवान् केशवकी प्रसन्नताके लिये भक्तिपूर्वक उस नदीका पूजन किया है। पापोंका नाश करनेवाली सिन्धु-रूपिणी वैतरणी नदीकी पूजा सम्पन्न हुई। मैं उसे पार करने तथा सब पापोंसे छुटकारा पानेके लिये इस वैतरणी-प्रतिमाका दान करता हूँ।'
इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर भगवान्से प्रार्थना करे—
कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ संसारादुद्धरस्य माम् ॥
नामग्रहणमात्रेण सर्वपापं हरस्व मे।
(६८ । ६४-६५)
'कृष्ण ! कृष्ण ! जगदीश्वर ! आप संसारसे मेरा उद्धार कीजिये। अपने नामोंके कीर्तनमात्रसे मेरा सारा पाप हर लीजिये।'
फिर क्रमशः यज्ञोपवीत आदि समर्पण करे। यज्ञोपवीतका मन्त्र इस प्रकार है—
यज्ञोपवीतं परमं कारितं नवतन्तुभिः ॥
प्रतिगृहीष्व देवेश प्रीतो यच्छ ममेप्सितम्।
(६८ । ६५-६६)
'देवेश्वर ! मैंने नौ तन्तुओंसे इस उत्तम
* आवाहयामि देवेशं यमं वै विश्वरूपिणम्। इहाभ्येहि महाभाग सांनिध्यं कुरु केशव ॥
इदं पाद्यं श्रियः कान्त सोपविष्टं हरे प्रभो। विशोधाय नमो नित्यं कृपां कुरु ममोपरि ॥
भूतिदाय नमः पादौ अशोकाय च जानुनी। ऊरू नमः शिवायैति विश्वमूर्ते नमः कटिम् ॥
कन्दर्पाय नमो मेढ्रमादित्याय फलं तथा। दामोदराय जठरं वासुदेवाय वै स्तनौ ॥
श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति वै नमः। पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति चरणौ वरदाय च ॥
स्वनाम्ना शङ्खचक्रासिगदापरशुपाणये। सर्वात्मने नमस्तुभ्यं शिर इत्यभिधीयते ॥
मत्स्यं कूर्मं च वाराहं नारसिंहं च वामनम्। रामं रामं च कृष्णं च बुद्धं कल्किं नमोऽस्तु ते ॥
सर्वपापौघनाशार्थं पूजयामि नमो नमः। एभिश्च सर्वशो मन्त्रैर्विष्णुं ध्यात्वा प्रपूजयेत् ॥ (६८ । ४५—५२)